आज की दुनिया में, एक अच्छी शिक्षा का मतलब है एक अच्छी, ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी। हम सब इसी दौड़ में शामिल हैं, मानते हैं कि हमारी डिग्री ही हमारी सफलता का टिकट है। लेकिन क्या हो अगर शिक्षा का असली मकसद कुछ और हो? क्या हो अगर हमारी सबसे कीमती डिग्रियां और लाखों के पैकेज आध्यात्मिक नज़रिए से लगभग बेकार हों?
यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन 1966 के एक मुरली में ज्ञान और शिक्षा पर एक ऐसा दृष्टिकोण पेश किया गया है जो आज की सोच को पूरी तरह से चुनौती देता है। यह लेख उसी गहरे चिंतन से निकले 5 सबसे चौंकाने वाले और ज़रूरी विचारों को आपके सामने रखेगा, जो आपको शिक्षा के वास्तविक मूल्य पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर देंगे।
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हम मानते हैं कि उच्च शिक्षा हमें आत्मनिर्भर बनाती है। एक सुप्रीम जज, एक प्रधानमंत्री—ये पद सफलता और स्वतंत्रता के शिखर माने जाते हैं। लेकिन मुरली एक बिल्कुल विपरीत विचार प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार, यह दुनियावी पढ़ाई आपको वास्तव में ‘अधीन’ बनाती है, ‘स्वाधीन’ नहीं।
एक सुप्रीम जज देश का सर्वोच्च न्यायाधीश होता है, लेकिन वह भी राष्ट्रपति के अधीन है। अगर वह किसी को फाँसी की सज़ा सुनाता है, तो राष्ट्रपति उस सज़ा को माफ़ कर सकता है, जिससे जज की प्रतिष्ठा खंडित होती है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी अपने मंत्रियों की सहमति पर निर्भर है, और राष्ट्रपति भी तब तक कोई आदेश पारित नहीं कर सकता जब तक उसके मंत्री उस पर हस्ताक्षर न कर दें। हर कोई किसी न किसी व्यवस्था या व्यक्ति के नीचे काम कर रहा है।
इसके विपरीत, ईश्वर (बाबा) द्वारा दिया गया ज्ञान व्यक्ति को “अनेक जन्मों का राजा” बनाता है, जो वास्तव में स्वाधीन होता है। यह एक चौंकाने वाली बात है कि जिस करियर को हम स्वतंत्रता का मार्ग समझते हैं, उसे यहाँ निर्भरता का एक रूप बताया गया है।
आपकी मेहनत की कमाई, आपका लाखों का सैलरी पैकेज—आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी कीमत ‘कौड़ियों’ के बराबर बताई गई है। यह एक कठोर मूल्यांकन है, जिसके पीछे दो मुख्य कारण दिए गए हैं:
मुरली एक शक्तिशाली उदाहरण इस बात को और स्पष्ट करता है:
अगर कोई कहे, “हमारे पास तो पाँच करोड़ हैं”। तो बाबा कहते हैं, “तुम्हारे पास पाँच कौड़ियाँ हैं”।
आध्यात्मिक अध्ययन में चार मुख्य विषय बताए गए हैं: ज्ञान, योग, धारणा और सेवा। आमतौर पर ज्ञान को पहला और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन शिवबाबा की मुरली ‘सेवा’ (खिदमत) को सबसे ऊँचा दर्जा देता है।
तर्क यह है कि सच्ची सेवा में अन्य तीनों विषय अपने आप समा जाते हैं। जब कोई व्यक्ति सेवा में लग जाता है, तो ईश्वर का स्मरण (योग) स्वतः ही पक्का हो जाता है। सेवा करने वाले की बुद्धि सूक्ष्म हो जाती है, जिससे वह ज्ञान की गहरी बातों को आसानी से समझ पाता है। और जब आप दूसरों को दैवी गुण धारण करने की शिक्षा देते हैं, तो वे गुण (धारणा) आपके जीवन में भी स्वाभाविक रूप से आने लगते हैं। इस तरह, सेवा ही संपूर्ण आध्यात्मिक अभ्यास का सार बन जाती है।
मुरली में ‘कुमारियों’ (अविवाहित युवतियों) को दुनियावी पढ़ाई न करने के लिए एक बहुत गहरा आध्यात्मिक कारण बताया गया है। यह केवल एक आदेश नहीं, बल्कि उनके अद्वितीय उद्देश्य की पहचान है। इसके पीछे का तर्क यह है:
कुमारियों में “जन्म से ही पवित्रता के संस्कार” होते हैं। यही पवित्रता की शक्ति है जिससे दुनिया के सबसे बड़े कार्य सिद्ध होते हैं। स्रोत बताता है कि अन्य धर्म-पिताओं ने भी पवित्र होकर ही जन्म लिया, लेकिन पुरुष तन में आने के कारण (जिन्हें ‘दुर्योधन-दुशासन’ कहा गया है) वे दुनिया को स्वर्ग नहीं बना सके। ईश्वरीय कार्य के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता है, वह कन्याओं की इसी जन्मजात पवित्रता में निहित है।
इसलिए, उनके सामने चुनाव केवल शिक्षकों का नहीं, बल्कि अपने जीवन के उद्देश्य का है। एक तरफ दुनियावी पढ़ाई है जो “एक जन्म के पेट भरने का धंधा” है, और दूसरी तरफ उनकी अद्वितीय आध्यात्मिक भूमिका है, जिसके द्वारा वे ज्ञान-अमृत बाँटकर दुनिया को स्वर्ग बनाती हैं। जब “ऊँचे ते ऊँच भगवान” खुद पढ़ाने के लिए आए हैं, तो “पापी मनुष्यों” से पढ़कर अपने सर्वोच्च उद्देश्य से भटकने की क्या ज़रूरत है?
हालांकि, बाबा केवल उन कन्याओं को दुनियावी पढ़ाई की अनुमति देते हैं, जिनके बारे में उन्हें संदेह होता है कि वे इस मार्ग पर चल पाएंगी या नहीं, ताकि उनका मन व्यस्त रहे।
अंत में, शिक्षा के चुनाव को एक गहरे आध्यात्मिक निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विचार यह है कि आप जिससे सीखते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। स्रोत के अनुसार, यह चुनाव दो स्पष्ट रास्तों के बीच है:
मुरली इस बात को भारतीय संदर्भ में और भी स्पष्ट करता है: “ईश्वर को राम कहा जाता है। और जो उसका विरोध करता है, उसे क्या कहते हैं? रावण। तो शैतान का मतलब है रावण।” इस तरह, आप किससे शिक्षा ले रहे हैं, यह केवल करियर का नहीं, बल्कि आपके चरित्र और आपकी अंतिम गति का निर्धारक है।
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हमें दुनियावी शिक्षा और करियर की चमक-दमक से परे देखने के लिए चुनौती देता है। यह हमें याद दिलाता है कि जो ज्ञान एक जन्म के लिए है और जो ज्ञान अनेक जन्मों को सँवारता है, उसमें बहुत बड़ा अंतर है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम जिसे ‘कमाई’ समझ रहे हैं, क्या वह वाकई में कोई मूल्य रखती है।
इस भाग-दौड़ भरी दुनिया में, आप अपनी आत्मा के लिए कौन सी ‘सच्ची कमाई’ (true income) जमा कर रहे हैं?
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