आखिर क्यों पढ़े एडवांस भगवद्गीता ? -Adhyatmikgyan (AIVV)
- एडवांस श्रीमद्भगवद्गीता
- 18 May 2023
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After all why read advance Bhagavad Gita?
भूमिका
‘ श्रीमद् भगवद्गीता’ सम्पूर्ण विश्व में मानवजाति के लिए भगवान का वर्बली दिया हुआ भारतीय अमूल्य उपहार है। भगवद्गीता ही एक ऐसा शास्त्र है जिसको ‘सर्वशास्त्र शिरोमणि’ कहा गया है। ऐसी विलक्षण रचना है, जिसको ही ‘भगवानुवाच’ की मान्यता प्राप्त है। जो महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखी गई है। गीता (18/75) में बताया है- “व्यासप्रसादात्” अर्थात् व्यास की प्रसन्नता से यह गीता ज्ञान हमको मिला है। यह शास्त्र अन्य शास्त्रों की तरह सिर्फ धर्म उपदेश का साधन नहीं; अपितु इसमें अध्यात्म के साथ-2 राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान भी है। अर्जुन जो महाभारत युद्ध के महानायक हैं, युद्ध के मैदान में समस्याओं से भयभीत होकर जीवन और क्षत्रिय धर्म से निराश हो गए। उसी प्रकार हम सभी नं. वार अर्जुन की भाँति जीवन की समस्याओं में उलझे हुए हैं; क्योंकि यह कलियुगांत का जीवन भी एक युद्ध क्षेत्र है। इसलिए आज सामान्य मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं से उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है अर्थात् क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए- इस संबंध में ही बुद्ध बन जाता है और जीवन की समस्याओं से लड़ने की बजाए, उनसे भागने लगता है। लेकिन समस्याओं से भागना समस्या का समाधान नहीं है। उन समस्याओं के समाधान के लिए ही भगवान अर्जुन के माध्यम से समस्त सृष्टि की मानवजाति के लिए ही गीता-ज्ञान अभी वर्तमान समय में दे रहे हैं, जिस गीता-ज्ञान के लिए यह समझा जाता है- भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर के अंत में यह गीता-ज्ञान दिया है। परन्तु गीता में एक भी ऐसा श्लोक नहीं है जिसमें बताया हो कि गीता ज्ञान द्वापर में दिया है। जबकि गीता (18/66) में बोला है- “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।” अर्थात् मठ-पंथ-सम्प्रदायादि दैहिक दिखावे वाले हिन्दू-मुस्लिमादि सब धर्मों का परित्याग करके, मुझ निराकारी स्टेज वाले शिवबाबा की शरण में जा। देखा जाए तो सभी धर्म द्वापर में मौजूद भी नहीं थे, अभी कलियुग के वर्तमान समय में अनेक धर्म-मठ-पंथ-सम्प्रदाय मौजूद हैं।
” ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।” (गी. 4/7) अर्थात् जब धर्म की स्लानि होती है, अधर्म या विधर्म बढ़ता है, तब मैं आता हूँ। धर्म की ग्लानि अर्थात् एकव्यापी भगवान को सर्वव्यापी बता देते हैं। जैन और वैदिक प्रक्रिया के अनुसार कलियुग के अंत में हो धर्म की ग्लानि होती है; क्योंकि कलियुग अंत तक अनेक धर्म स्थापित हो जाते हैं और सब धर्म चौथे युग की चौथी अवस्था में तमोप्रधान बन जाते हैं; क्योंकि सृष्टि रूपी मकान या वृक्ष की हर चीज़ चतुर्युगी की तरह सत्त्व प्रधान, सत्त्व सामान्य, रजो और तामसी इन अवस्थाओं से अवश्य गुजरती है।
“सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।” (गीता 7 / 27) अर्थात् सब प्राणी कल्पान्त काल चतुर्युगांत में सम्पूर्ण महता को पहुँच जाते हैं। “मयाध्यक्षेण… जगद्विपरिवर्तते” (गीता 9/10) अर्थात् मेरो एकमात्र अध्यक्षता के कारण यह संसार विपरीत गति अर्थात् कलियुगान्त से आदि सनातन सतयुगी उर्ध्वलोक की दिशा में विपरीत गति से परिवर्तित होता है। अगर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर में आकर गीता ज्ञान दिया है तो संसार का परिवर्तन होना चाहिए; परन्तु संसार का तो परिवर्तन हुआ नहीं, प्रमाणित मानवीय इतिहास में मनुष्य और ही अधर्मी, कामी, पाखंडी, अभिमानी, क्रोधी, अहंकारी, पशुओं के समान हिंसा का आचरण करने वाले हो गए, जबकि 16 कला सतयुग, 14 कला त्रेता और 8 कला द्वापर से भी नीचे गिरकर आज तक पूरा ही कलाहीन पापी कलियुग बन गया।
वास्तव में यह सामने खड़े सन्नद्ध चतुर्थ विश्वयुद्ध वाले मौसलिक मिसाइल्स के और तृतीय विश्वयुद्ध वाले महाभारत युद्ध के आसार वर्तमान समय की बात है। भगवान ने आकर कोई स्थूल हिंसा करना नहीं सिखाया। लड़ाई-झगड़ा या मारा- मारी करना- ये सर्वथा बर्बर बनें ताड़कासुर जैसे राक्षसों के संस्कार हैं। भगवान तो आकर सतयुगादि का 16 कला सं. देवी अहिंसक राज्य स्थापन करते हैं, देवता लड़ते नहीं हैं। जो कौरव और पाण्डवों का युद्ध बताया है, वे अभी मौजूद हैं; क्योंकि शास्त्रों में जो भी नाम हैं, सभी काम के आधार पर हैं। जैसे अच्छे या बुरे काम किए हैं वैसे नाम पड़ गए हैं; क्योंकि कलियुगी दुनियाँ नाम को स्मरण करती है। जैसे ‘राम’ नाम पड़ा है- रम्यते योगिनो यस्मिन् इति रामः । अर्थात् योगी लोग जिसमें रमण करते हैं, उसका नाम है ‘राम’। ऐसे ही ‘रावण’-रावयते लोकान् इति रावणः । अर्थात् जो लोगों को रुलाता है, वो रावण है। उसी प्रकार कौरव सम्प्रदाय धृतराष्ट्र और उसके कुकर्मा पुत्र दुर्योधन- दुःशासनादि जो सत्य धर्म के नाशक हैं और उनको समर्थन देने वाले बड़े-2 विद्वान गुरु द्रोणाचार्य, भीष्मपितामह-जैसे संन्यासी हैं जो आज भी धर्म के विपरीत, सत्य का सर्वथा विरोध करने वाले हैं; जबकि सत्य धर्म के स्थापक बेहद के पंडा शिव सुप्रीम सोल ‘पांडु’ रूप सर्वोच्च पंडा बाप के पांडव बच्चे युधिष्ठिर-अर्जुन आदि भी मौजूद हैं, जो साक्षात् भगवान का आश्रय लेने वाले हैं। यह कोई एक-एक व्यक्तित्व की बात नहीं है, अपितु ऐसे आचरण करने वाले नं. वार मनुष्यों की बात है। आखिर-क्यों-पढें-एडवांस-भगवद्गीता-आध्यत्मिक-ज्ञान
इसी समय ऐसे पूँजीवादी धृतराष्ट्र (जिन्होंने अन्याय पूर्वक सारे भारत राष्ट्र की धन-सम्पत्ति हड़प ली) भ्रष्टाचारी आसुरी गवर्मेण्ट के ऐसे-2 नुमाइन्दे बनकर बैठे हैं, जो धार्मिक-आध्यात्मिक संस्थाओं पर भी लाखों का प्रॉपर्टी टैक्स लगवाते हैं। जिनको समाज का रक्षक होना चाहिए, वो ही पुलिस आदि विभागों के अधिकारी ‘भक्षक’ बनकर जनता को प्रताड़ित कर रहे हैं। प्रायः समूची न्याय व्यवस्था दीर्घसूत्री अन्याय में बदल गई। पहले राजाओं के राज्य में धर्म के अनुसार न्याय किया जाता था, बिना किसी वकील की सहायता के तुरंत निर्णय भी मिलता था; लेकिन आज विदेशियों के द्वारा बनाए गए कोर्ट के न्याय की अपेक्षा करते-2 प्राण भी चले जाएँ, तो भी न्याय नहीं मिलता। इसलिए आज प्रायः सच्चे लोग जेल में पड़े हैं और गुण्डाराज के अपराधी जेलों में भी जेलर्स आदि रिश्वती अधिकारियों के ऊपर गद्दीनशीन बनकर बैठे हैं। जैसे (दुष्ट युद्ध करने वाले) दुर्योधन, दुःशासन अबलाओं पर बाहुबल चलाते हैं, ऐसे खराब काम करते हैं। अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं। कोई एक पारिवारिक द्रौपदी की बात नहीं, अनेकों कुंती-द्रौपदी समान कन्या-माताओं पर रोज़ बलात्कारी अत्याचार किया जाता है। जिस भारतवर्ष में नारियाँ पूजनीय मानी जाती थीं, उसी भारत में आज नारियों पर पशुओं के समान अत्याचार किया जाता है। हिजड़ाई कानून की कोई रोकथाम नहीं । भ्रष्ट इन्द्रियों का दुराचरण कराने वाली गवर्मेण्ट को सहयोग देने वाले और बदले में मान-मर्तबा लेने वाले द्रोणाचार्य और भीष्मपितामह-जैसे बड़े- 2 वेतन भोगी कृपाचार्य जैसे विद्वान भी हैं और संन्यासी भी हैं, जो अपने को ही शिवोऽहम् कहते हैं, जबकि वास्तविक God is one अर्थात् असली भगवान सदाशिव ज्योति से बेमुख करा देते हैं। स्वयं की पूजा कराते हैं, अपने को श्री-2,1008 या 108 की श्रेष्ठतम संगठन रूपी माला के जगतगुरु शिव सुप्रीम सोल का टाइटल लेकर, एकव्यापी भगवान को सर्वव्यापी बताकर सबसे बड़ा अधर्म करते हैं और जनता को भ्रमित किए हुए हैं। इन सब अधर्मियों और इनके द्वारा फैलाए अधर्म का नाश करने के लिए ही भगवान गुप्त साधारण भेष में इस कलियुगांत की सृष्टि पर आए हैं और गीता ज्ञान भीष्मपितामह जैसे संन्यासियों को अथवा विद्वान पंडितों द्रोण-कृपाचार्यों जैसे वेतनभोगियों को नहीं, बल्कि अर्जुन-जैसे गृहस्थियों को देते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी हैं, जो सफ़ेद पोश धर्म के धुरंधर बने बैठे हैं & लगातार सत्य को दबाने के लिए करोड़ों रुपये सरकारी अफसरों, तांत्रिकों और मीडिया वालों को दे रहे हैं और अपना अल्पकालीन मान मर्तबा बनाए रखना चाहते हैं। उनके इन्हीं छद्म भेष में किए गए कर्मों के कारण, जिन ब्रह्मा बाबा (दादा लेखराज) को भगवान मानते हैं, उनकी ही बेअदबी करते हैं और उनके बताए रास्ते पर न चलकर, उनका ही मुँह बंद कर देते हैं और ब्रह्मा बाबा भी मौन रहकर ठीक उसी तरह समर्थन कर देते हैं, जैसे धृतराष्ट्र ने दुर्योधन दुःशासन का किया था। इसी कारण आज संसार में ब्रह्मा के न मंदिर हैं, न मूर्ति और न ही लोग याद करते हैं। इन्हीं कौरव संप्रदाय का मुकाबला 5 उँगलियों पर गिनने योग्य मुट्ठी भर पाण्डव, आज भारत में प्रैक्टिकली प्रत्यक्ष रूप से कर रहे हैं। जिस आध्यात्मिक विश्वविद्यालय (AIVV) के सक्रिय सहयोगियों को समाप्त करने के लिए सन् 1976 से ही विरोधी लोग लगातार प्रयासरत हैं, एक के बाद एक हमले इन छद्म वेशियों द्वारा कराए जा रहे हैं, सरासर कई झूठे आरोप लगवाए जाने पर भी सफलता नहीं मिली, तो गरीब लोगों के मात्र लाख रुपयों से बने AIVV कम्पिला U.P. के लाखा भवन में सारी पब्लिक के बीच जैसे आग ही लगवा दी। ऐसे ही AIVV दिल्ली-85 में रह रहीं 200-250 कन्या-माताओं के निवास स्थान को दिल्ली नगर निगम वालों के द्वारा 2-2 बार तुड़वाया गया, ताकि वो सभी बेघर हो जाएँ और भाग जाएँ। ऐसे ही id/age प्रूफ दिखाने के बावजूद भी 48 बालिग कन्याओं को सरकारी नुमाइन्दों के बीच मीडियाज़ द्वारा भी नाबालिग घोषित कराके सरकारी तबकों द्वारा हो 4 माह तक भी अज्ञात स्थान में किडनेप कराके बंधक बना लिया गया। ऐसे अनेकों अपराध हैं, जिनको भारतीय प्रजातंत्र के कानून का जामा पहनाया गया है। फिर भी AIVV परिवार युधिष्ठिर जैसा युद्ध में आदि से लेकर अंत तक स्थिर रहा है, छोड़कर भागा नहीं क्योंकि कहावत है- “जाको राखे साईया, मार सके न कोय। बाल न बाँका कर सके, जो जग वैरी होय ।।” गीता में ही बताया- “नासतो विद्यते मावो नाभावो विद्यते सतः।” (2/16) सत्य पाण्डवों की मुट्टी पर शक्ति-सेना का कभी विनाश नहीं होगा और कामचलाऊ झूठी प्रजापरस्त शूद्रों और सफेदपोश दिखावटी बेहद ब्राह्मणों की भ्रष्टाचारी सरकार और भ्रष्टाचारियों की अक्षीहिणियों सेना का अस्तित्व भी नहीं रहेगा। महाभारत युद्ध के अंत में विजय तो पांडवों की ही होती है; क्योंकि गीता (18/78) में भी बताया है- “यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्वरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।” अर्थात् जहाँ साक्षात् भगवान हो और भारत / अर्जुन हो, वहाँ विजय निश्चित है। यह 5000 वर्षीय चतुर्युगी ड्रामा में कलियुगान्त की रिहर्सल चल भी रही है। विलियम शेक्सपियर ने भी कहा- “यह विश्व एक रंगमंच है” और सभी आत्माएँ मित्र-2 पात्र है, उनका ऊर्ध्वलोकीय आत्मलोक में प्रवेश और प्रस्थान होता है। निम्नगामी 4 सीन की चतुर्युगी सृष्टि पर सभी पार्टधारी अपना-2 पार्ट बजा रहे हैं। हम सभी एक्टर्स हैं और डायरेक्टर सदाशिव (ज्योति) सदैव ही परदे के पीछे है, जो इन दैहिक आँखों से दिखाई नहीं देता है। वो ही गीता-ज्ञानदाता है; क्योंकि वो अगर्भा-अभोक्ता और निराकार है, जन्म-मरण से न्यारा है; इसलिए गीता में उसको अजन्मा, अकर्ता, अभोक्ता बताया है। कृष्ण के लिए अजन्मा, अकर्ता, अभोक्ता नहीं कहेंगे; क्योंकि उनका तो माता के गर्भ से जन्म भी होता है, कर्म करते दिखाया भी है, सामान्य मनुष्यों की तरह जीवन के सभी सुखों को भोगते हुए दिखाया है और गीता तो पहले निराकारवादी रचना थी, बाद में कृष्ण उपासकों ने उसमें कृष्ण का नाम डाल दिया है जो बात राधाकृष्णन, कीथ, कीरो आदि अनेक देशी-विदेशी विद्वानों ने भी स्वीकारी है। वो निराकार भगवान (सदाशिव ज्योति) अर्जुन (आदम) के (मुकर्रर शरीर रूपी) रथ में ही आकर प्रवेश करके गीता-ज्ञान देते हैं, कोई स्थूल रथ की बात नहीं है। कठोपनिषद् 1.3.3.4 में बोला है- “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च। बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च । इन्द्रियाणि हयानाहुः आत्मा को रथी समझ और शरीर को रथ समझ, बुद्धि (मानों की बुद्धि शिवज्योति) को सारथी समझ और चतुर्मुखी ब्रह्मा के मन रूपी घोड़ों को लगाम समझ अर्थात् अर्जुन की इन्द्रियों को घोड़े समझ । अर्थात् निराकार ज्योतिबिंदु / ज्योतिर्लिंग गीता-ज्ञानदाता अर्जुन के साकार शरीर रूपी रथ में प्रवेश करते हैं।
गी. 10/2 में है- “न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।” अर्थात् मेरे उत्कृष्ट जन्म को न सतयुगी देव और न द्वापरयुगी महान ऋषिजन ही जानते हैं, जबकि कृष्ण का जन्म और उनकी तिथि तारीख तो सामान्य मनुष्यों को भी ज्ञात है- सामान्य रूप से माता के गर्भ से जन्म हुआ था; परन्तु भगवान तो अगर्भा है; क्योंकि वो परकाया प्रवेश (गी. 11/54 ‘प्रवेष्टुं’) करके ज्ञान का बीज डालते हैं। गी. 14/3 में बोला है-“मम योनिर्महद्धय तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम्।” अर्थात् मेरी योनि रूपी माता महदब्रह्म (पंचानन) संगठित मुखों वाला महान ब्रह्मा है, जिसमें आकर में आत्म-ज्ञान का बीज डालता हूँ, महाविनाश के समय मनुष्य-सृष्टि वृक्ष के बीज / बाप (अर्जुन/आदम) की अपरा प्रकृति/देह रूपा परमब्रह्मा में पड़े उस बीज से सब प्राणियों की नं. वार उत्पत्ति होती है। जिस गर्भ के बारे में अन्य शास्त्रों में ऋषि-मुनि भी उसे सच्चा – 2 ‘हिरण्य गर्भ’ कहते हैं। इस शब्द का प्रथमतः उल्लेख ऋग्वेद में आया है, जो अंडाकार ज्योतिर्लिंग के समान है, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। गी. 9/7 में बोला है- “सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।” अर्थात् हे कुंती पुत्र! कल्पांतकाल में सब प्राणी मेरी निराकारी स्टेज धारण करने वाली इसी प्रकृष्ट शरीर रूपी कृति (शंकर) के निराकारी ज्योतिबिंदु आत्मिक (अव्यक्तमूर्ति) भाव को पाते हैं और कल्प के आदिकाल से मैं उन्हें फिर से सृष्टि के लिए परंब्रह्मलोक से नं. वार छोड़ देता हूँ। गी. 2/17 में बोला है- “अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।।” अर्थात् जिस मनुष्य-सृष्टि तु के बीज-रूप आदम या आदिदेव / शंकर के द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व विस्तार को पाया है, उसको तो अविनाशी जान। इस अव्यय पुरुष शंकर (-आत्मपार्ट) का प्रलयकाल में भी विनाश करने के लिए कोई भी समर्थ नहीं है। जबकि कृष्ण को तो एक बहेलिये ने तीर मारा और उनकी मृत्यु हो गई ।.
गी. 11/32 में बोला है- ‘कालोऽस्मि’ अर्थात् मैं काल हूँ। जो स्वयं कालों का काल महाकाल है, उसको कोई काल खा नहीं सकता है। वो ही एकमात्र महाकाल सबको मन्मनाभव मन्त्र से अपने बुद्धिरूपी पेट में खा जाता है; इसीलिए न उनका जन्म दिखाया है, न ही मृत्यु। वो ही हीरो आत्मा जो सब धर्मों में आदिदेव/आदम / एडम / आदिनाथ आदिश्वर आदि नामों से मानवीय इतिहास के समूचे सृष्टि रंगमंच पर कोई न कोई साकार तन से भी शाधत मौजूद रहती है, जिसको ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ कहा जाता है। जिसके अमोघवीर्य साकार शिवलिंग स्वरूप की पूजा प्रैक्टिकल कामजीते जगत्जीत के प्रतीकात्मक जलाधारी आधार पर खुदाईयों में सार्वभौम रूप में सबसे जास्ती की गई है। देश-विदेश में उसकी ही सर्वाधिक लिंगमूर्तियाँ मिली हैं, सिर्फ नाम अलग दे दिए हैं। हिन्दुओं में ‘आदिदेव’, क्रिश्चियन्स ‘एडम’, मुसलमान ‘आदम’ और जैनियों में ‘आदिनाथ’ कहा जाता है। गी. 4/1 में बताया है- “इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।’ मैंने यह अविनाशी ज्ञान सबसे पहले सूर्य को दिया, जिसको ‘विवस्वत’ कहा है; क्योंकि निराकार सदा शिवज्योति ज्ञान की रोशनी सबसे पहले नर से डायरैक्ट नारायण बनने वाले साकार अर्जुन/आदम (विवस्वत) को देता है, उसके द्वारा फिर समस्त संसार को ये नॉलेज मिलती है; लेकिन उसमें प्रविष्ट परमपिता शिव समान गुप्त पार्टधारी को पहले-पहले उसी हीरा समान हीरो (कौ है नूर हीरा) सिवा कोई पहचान नहीं पाते। गी. 9/11 में बोला है- “अवजानन्ति मां मूढा मानुष तनुमाश्रितम्।” अर्थात् मूर्ख लोग मानवीय शरीर का आधार लेने वाले मुझ ऊँची स्थिति समान काशी-कैलाशीवासी हीरो की अवज्ञा करते हैं। वो मूर्ख प्राणियों के ईश्वर समान स्वरूप को जल्दी नहीं पहचान पाते हैं।
इन सभी तथ्यों पर गौर करेंगे और गीता के श्लोकों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने से आपको यह ज्ञात होगा कि तृतीय विश्वयुद्ध वाला महाभारत युद्ध अभी ही महाभारत प्रसिद्ध मूसल रूपी चतुर्थ मिसाइल्स युद्ध के ठीक पहले इसी कलियुगांत में शुरू होने वाला है और गीता-ज्ञान भी भगवान के द्वारा वर्बली दिया जा रहा है। हर 5000 वर्ष में कलियुग के अंत में उसी मुकर्रर शरीर रूपी रथधारी साकार अर्जुन में प्रवेश करके गीता-ज्ञान दे रहे हैं, और बाद में कलियुग का अंत कराके सतयुग की स्थापना भी करा रहे हैं। यह सृष्टि काल सिर्फ़ 5000 वर्ष का है, परन्तु साधु, संत, पंडित, संन्यासियों ने लाखों वर्ष बता दिया, ताकि उसका कोई हिसाब ही पूछ न सके। महाभारत वनपर्व (188-25,26,29,30), भागवत पु. ( 12-2-31) और हरिवंश पु. (2-8-14) में 1250 वर्षीय कलियुगी आयु के पक्के प्रमाण हैं जो चारों युगों के चारों सीन समान आयु के ही होते हैं।
(11) विश्व विख्यात सबसे पुरानी सभ्यता मोहनजोदड़ो (4600 वर्ष), हड़प्पा (5000 वर्ष), ग्रीस मेसोपोटामिया (3000 before क्राइस्ट) जो 5000 वर्ष से ज़्यादा पुरानी नहीं हैं और जिनकी खुदाई में कोई ऐसी वस्तुएं नहीं मिली जो 5000 वर्ष से ज़्यादा पुरानी हों। क्रिश्चियन्स कहते हैं-3000 years before christ was heaven on earth. अर्थात् वे 16 कला सतयुगादि की बात है जब संगमी कलातीत कृष्ण का राज्य था। क्राइस्ट को 2000 वर्ष हुए और क्रिश्चियन्स के अनुसार 3000 वर्ष पूर्व धरती पर स्वर्ग था अर्थात् कुल सृष्टि की आयु 5000 वर्ष ही है, लाखों करोड़ों वर्षों की बात का तो कोई एक भी प्रमाण नहीं है। अभी सृष्टि की आयु मुसलमानी चौदहवीं सदी के अनुसार भी पूरी हो चुकी है और इस सृष्टि का अंत आ चुका है जिसको महाभारत युद्ध करें या कयामत कलियुग 40,000 वर्ष का बच्चा नहीं अपितु अंतिम बांसों पर है -कल्प (5000 वर्ष) पहले जो महाभारत युद्ध हुआ था अभी फिर से निश्चित रूप से वही समय की परिस्थितियाँ आ गई हैं।
यह सत्य और असत्य की लड़ाई ‘ब्रह्मकुमारी विश्वविद्यालय’ और ‘आध्यात्मिक विश्वविद्यालय’ के बीच अभी रिहर्सल या शूटिंग के रूप में प्रैक्टिकली छोटे रूप में चल रही है। बाद में यही ब्रॉड सृष्टि नाटक के 100 वर्षीय रिहर्सल का भी समय है। जो आत्मा अभी ब्रह्मा के मानसी सृष्टि निर्माण में जैसा पार्ट बजाएगी, वो 4 सीन वाली चतुर्युगी में वैसा ही 5000 वर्ष के ड्रामा में नूँध होगा। युद्ध की शुरूआत में युधिष्ठिर ने कहा था- इस धर्म-अधर्म के युद्ध में सभी अपना देवता या राक्षस बनने का मार्ग चुन सकते हैं, उसी प्रकार अभी स्वयं भगवान आकर बता रहे हैं- चाहे तो कौरवों (तथाकथित ब्रह्माकुमारी) के तरफ जाएँ या भग+वान की छत्रछाया में पाण्डवों (आध्यात्मिक विश्वविद्यालय) के तरफ आ जाएँ; क्योंकि हर आत्मा स्वतंत्र है, जीवात्मा अपना ही मित्र है और अपना ही शत्रु है, अपने कल्याण और अकल्याण का फैसला स्वयं कर सकते हैं। लेकिन उस भगवान के बताए रास्ते पर पूरा चलने वाले युधिष्ठिर-जैसे पाण्डव ही स्वर्ग में जाते हैं। जो धर्मयुद्ध से पीछे नहीं हटते हैं, चाहे सारा संसार ग्लानि करे, फिर भी इस दीये और तूफान की लड़ाई में टक्कर लेते हैं; पर सत्य का मार्ग नहीं छोड़ते हैं, सदा स्वर्ग जाने के अधिकारी बन जाते है -After all, why read advance Bhagavad Gita?
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