Who is god ? | परमपिता परमात्मा शिव और उनके दिव्य कर्तव्य | आध्यात्मिक ज्ञान
- Blogबेसिक कोर्स
- 30 September 2023
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1-Who Is God? भगवान कौन है ?
भगवान कौन हैं?’ यह प्रश्न हमारे मानसिक और आध्यात्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण सवाल है जिसके चारों ओर कई विचार और धारणाएँ हैं। इस पोस्ट में, हम इस गहरे प्रश्न को जानने का प्रयास करेंगे और इसे अधिक समझने का प्रयास करेंगे।
हम इस बड़े प्रश्न को विभिन्न दृष्टिकोण से देखेंगे – ऐतिहासिक, धार्मिक, दार्शनिक, और व्यक्तिगत। हम उसके गुण, विशेषताएँ, और विभिन्न सांस्कृतिक विचारों की चर्चा करेंगे जो इस प्रश्न के आसपास हैं। इसके साथ ही, हम आधुनिक चर्चाओं को भी देखेंगे जो इस विषय पर हो रही हैं।
इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से, हम सभी को एक गहरे और महत्वपूर्ण विचार की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे, जो हमारे मानसिक और आध्यात्मिक जीवन को स्पष्टीकरण देने में मदद कर सकता है।
जब सारी ही आत्माएँ आत्म-लोक से इस सृष्टि पर उतरने को होती हैं तब अन्त काल से कुछ ही पहले परमपिता परमात्मा शिव (Heavenly Father) इस सृष्टि पर आते हैं और आ करके इस सृष्टि-रूपी रंगमंच की जो हीरो-हीरोइन पार्टधारी आत्माएँ हैं, कोई तो होंगी, अच्छे-बुरे पार्टधारी तो होते ही हैं। तो इस सृष्टि-रूपी रंगमंच पर कोई तो सबसे ज्यादा श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले होंगे। उनको अंग्रेजों में कहा जाता है- ‘एडम और ईव, मुसलमानों में कहा जाता है ‘आदम और हव्वा’ और हिन्दुओं में कहा जाता है “त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः । त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।” (गीता 11/38) वे सृष्टि के आदि है। उनकी शुरुआत किसी ने नहीं बताई कि वे आदिशक्ति और आदिदेव कब से हैं, उनको जन्म देने वाला कौन है। किसी को पता ही नहीं है। हिन्दू परम्परा, में उनको शंकर-पार्वती और जैनियों में ‘आदिनाथ और आदिनाथिनी कहा जाता है। देखिए आप, शब्दों में कितना साम्य है।
2- परमपिता-परमात्मा शिव किसमें प्रवेश करते हैं ?
पहले दुनिया में एक ही धर्म था और एकता थी। वह एकता तभी आ सकती है, ‘वसुधैव कुटुम्बकम् की असली भावना तभी हो सकती है जबकि सारी दुनिया एक ही युगल को अपना मात-पिता मान लें तो ये परमपिता परमात्मा शिव आते है आ करके इस सृष्टि रूपी रंगमंच की हीरो-हीरोइन पार्टधारी आत्माओं (राम-कृष्ण) को उठाते हैं ये 84 के चक्र के आखिरी जन्म में रामकृष्ण के रूप में नहीं होते; क्योंकि 16 कला संपूर्ण कृष्ण / नारायण का राज्य तो सतयुग में था, राम का राज्य त्रेता में था। वही आत्माएँ जन्म-मरण के चक्र में नीचे उतरते-2 हमारे आपके रूप में कहीं-न-कहीं नर रूपों में होती है। उन नर रूपों में परमपिता परमात्मा शिव प्रवेश करते हैं,
जैसे गीता में एक शब्द आया है- ‘प्रवेष्टुम् (गीता 11/54), मैं प्रवेश करने योग्य हूँ। कौन? वे सुप्रीम सोल शिव, जो जन्म-मरण के चक्र से न्यारे हैं। वे प्रवेश करके कृष्ण उर्फ दादा लेखराज के द्वारा पहले माँ का पार्ट बजाते हैं, जिसका नाम अपनी भारतीय परम्परा में रखा जाता है ‘ब्रह्मा’ ‘ब्रह माने बड़ी और ‘माँ’ माने माँ दुनिया में सबसे जास्ती सहन करने वाली माँ होती है। परमपिता परमात्मा भी इस सृष्टि पर आकर पहले माँ का पार्ट प्रत्यक्ष बजाते हैं, जिसके लिए अपनी भारतीय परम्परा में उनकी महिमा के गीत गाए हैं- “त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।” वे इतना प्यार देते हैं, इतना प्यार देते हैं कि जो असुर हैं वे उनसे वरदान लेने के आदी हो जाते हैं। माँ का स्वभाव ऐसा होता है कि कोढ़ी, काना, कुब्जा, घोर, डकैत लुच्चा, लफंगा बच्चा होगा उसको भी अपनी गोद से अलग नहीं करना चाहेगी। बाप कहेगा- ‘हट निकल बाहर; लेकिन माँ गोद से अलग नहीं करेगी। ऐसे ही ब्रह्मा का पार्ट इस सृष्टि पर पहले है।
परमपिता परमात्मा शिव (Heavenly Father) ब्रह्मा में प्रवेश करके जो वाणी चलाते हैं, उस वाणी का नाम पड़ता है मुरली मुरली नाम क्यों पड़ा? आप और हम जानते हैं कि कृष्ण के हाथ में मुरली दिखाई जाती है। तो हमने समझ लिया कि कोई बॉस की मुरली होगी, लेकिन यह तो प्रतीकात्मक, लाक्षणिक और आलंकारिक कवियों की भाषा है, जो उन्होंने भागवत और महाभारत में लिखी हुई है। उसका वास्तविक अर्थ यह है कि परमपिता परमात्मा ब्रह्मा के मुख से माने बच्चा बुद्धि कृष्ण की सोल के द्वारा पहले-2 इस सृष्टि पर आकर कलियुग अंत में जो प्यार देते हैं मीठी वाणी सुनाते हैं, वह वाणी इतनी अच्छी लगती है कि जब लोगों को समझ में आ जाती है कि यह बात क्या है तो उससे ज्यादा बढ़कर मीठी और सुरीली तान सारी दुनियों में और किसी की नहीं लगती। इसलिए उसका नाम रखा गया ‘मधुर गीता गीता अथवा सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ, जो भारत का सर्वोपरि ग्रंथ है ‘सर्वशास्त्र शिरोमणि गीता, उसको मुरली कहा जाता है।
तो परमपिता परमात्मा आकर ब्रह्मा के तन से काठ की मुरली द्वारा यह ज्ञान सुनाते हैं। माँ के रूप में वे ब्राह्मणों को जन्म देते हैं। शास्त्रों में लिखा हुआ है कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण निकले तो हम समझते हैं कि कोई ऐसी कलाकारी मुँह में होगी जो उन्होंने मुँह से ‘हुआ किया और ब्राह्मण निकल पड़े, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। यही पुरानी कलियुगी सृष्टि होती है। इसी पुरानी सृष्टि में परमपिता परमात्मा आकर ब्रह्मा के तन में प्रवेश करके बच्चा बुद्धि मनुष्यों द्वारा समझने योग्य बेसिक ज्ञान सुनाते हैं उस ज्ञान को सुनकर जो अपने जीवन को बनाते हैं. सुधारते हैं, उन्हीं में ब्राह्मणों के संस्कार आ जाते हैं। इस प्रकार ब्राह्मणों की जो ब्रह्मा मुख से उत्पत्ति होती है उनको ‘ब्रह्माकुमार या ब्रह्माकुमारी’ कहा जाता है। यह नई सृष्टि की शुरुआत की बात है जो अभी 5000 वर्ष बाद फिर से पुनरावर्तन हो रही है।
3-परमपिता परमात्मा (Heavenly Father) साधारण तन में आते हैं
माउंट आबू से इस कार्य की शुरुआत हुई। शिव गुप्त रूप में आते हैं, जैसे गीता में कहा है- “साधारण तन में आए हुए मुझ परमपिता परमात्मा को दादा लेखराज ब्रह्मा जैसे मूढमति लोग पहचान नहीं पाते।” तो आपको जो ब्रह्मा का रूप दिखाया, यह व्यक्तित्व प्रैक्टिकल में हो चुका है। माउंट आबू में इनके द्वारा परमपिता परमात्मा शिव ने नीची कुरियों के ब्राह्मणों की स्थापना कराई थी। इनका वास्तविक नाम दादा लेखराज ही था। सिंघ हैदराबाद के रहने वाले ये सिंधी ब्राह्मण थे, जिनके द्वारा यह कार्य सम्पन्न हुआ। अभी तो देश-विदेश में ढेर सारे ब्रह्माकुमारी आश्रम खुले हुए हैं। 70-75 साल के अंदर इतनी ज़बरदस्त स्थापना करना सामान्य आत्मा के बस की बात तो नहीं है।
परमपिता परमात्मा शिव स्वयं ही कृष्ण की सोल उर्फ दादा लेखराज का नाम ‘ब्रह्मा’ रखते हैं और उसके द्वारा जब ब्राह्मण धर्म की स्थापना करते हैं तब ढेर सारे ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ तैयार हो जाते हैं। परमपिता परमात्मा देखते हैं कि इन ब्राह्मण बच्चों में ही दो किस्म के बच्चे पैदा हो गए। एक.रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद भी ब्राह्मण थे और अपने जीवन में गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र ने भी ब्राह्मणत्व अपनाया था। गुरू वशिष्ठ, विश्वामित्र जैसों की संख्या थोड़ी हो जाती है और रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद जैसों की संख्या र सारी हो जाती है। यही बात ब्रह्माकुमारी आश्रम में भी हुई। ब्रह्मा की कोख में रस लेने से पैदा हुए जो कुखवंशावली ब्रह्मा वत्स हैं, उनमें ढेर सारे दुष्ट ब्राह्मण पैदा हो गए और जो ज्ञान योग में ब्रह्मामुख से ज़्यादा रस लेने वाले त्यागी तपस्वी हैं, वे थोड़े रह गए। अतः क्या होता है? परमपिता परमात्मा को वह शरीर छोड़ देना पड़ता है। कृष्ण वाली सोल माना ब्रह्मा की सोल को शरीर छोड़ देना पड़ता है।
4-सन् 69 के बाद परमपिता परमात्मा शिव किसमें प्रवेश कर कार्य पूरा करता है ?
उसके बाद सन् 69 में परमपिता परमात्मा शिव राम वाली सशक्त आत्मा में सर्वथा गुप्त प्रवेश करते हैं, क्योंकि माता का भी प्यार भरा पार्ट शिव का है तो पिता का भी सख्त पार्ट उन्हीं का है। कहावत है- टेढ़ी उँगली किए बगैर भी नहीं निकलता। अब राम वाली सोल कहीं-न-कहीं तो इस सृष्टि पर होगी ना? तो उस व्यक्तित्व में, जो कि पहले से ही ब्रह्माकुमार बनी हुई होती है उसमें वे शिव ही प्रवेश करके अपना कार्य आरम्भ करते हैं। इस कार्य के आरम्भ होने के बाद थोड़े समय के अन्दर ही ब्रह्माकुमारी संस्था में सन् 76 से स्पष्ट विभाजन नजर आता है, जैसे सभी धर्मों में हुआ- बौद्धियों में ‘हीनयान’ (और) ‘महायान’ दो सम्प्रदाय हो गए। जैनियों में श्वेताम्बर और दिगम्बर, दो सम्प्रदाय हो गए मुसलमानों में शिया और सुन्नी, दो सम्प्रदाय हो गए। क्रिश्चियन्स में रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दो सम्प्रदाय हो गए ये दूसरे-2 जो भी धर्म हैं उन सबने उस परमपिता परमात्मा को ही फॉलो किया।
5-सनातन धर्म की स्थापना-
परमपिता परमात्मा आते हैं तो श्रेष्ठ आत्माओं का माला रूपी संगठन तैयार करते हैं -
अब जब परमपिता परमात्मा ने आकर नए सनातन धर्म की स्थापना की तो भी यही प्रक्रिया चली कि ब्रह्मा के शरीर छोड़ने के कुछ समय के बाद उस ब्रह्माकुमारी आश्रम में दो तरह के लोग स्पष्ट नज़र आते है तो आपस में टकराव पैदा होता है। बुद्धिजीवियों की संख्या कम होती जाती है और वे अलग हो जाते है तो संघर्ष तो बढ़ेगा ही हर धर्म में यह संघर्ष बढ़ते-2 धर्मउत्कर्ष रूप पैदा होता है। गुरुओं का जो बड़ा और पुराना रूढिवादी, दकियानूसी वर्ग है वह सच्चाई को नहीं पहचानता, क्योंकि उनको तो गद्दी मिली हुई है। वह माउंट आबू में अभी भी काबिज अधिकार प्राप्त है। वे सच्ची बात को सुनते नहीं * हैं।
आप देखेंगे कि जो कुछ भी ब्रह्मा द्वारा माउंट आबू से मुरली या वाणी सुनाई है, वह वाणी वास्तव में अपनी जगह पर शास्त्रसंगत है; लेकिन ब्रह्माकुमारियाँ आज भी यह बात कह रही हैं कि शास्त्र सब झूठे हैं और हमारे बाबा ने जो कुछ बोला है वही सच्चा है; लेकिन बाबा ने जो कुछ बोला है उसका अर्थ क्या है? वह उन्हें पता ही नहीं है और सुनने के लिए तैयार भी नहीं हैं। हर धर्म में यह स्थिति पैदा होती रही है। इसी तरीके से परमपिता परमात्मा शिव राम वाली आत्मा (जो त्रेतायुग में भी होती है), जो जन्म-मरण के चक्र में आते 2 कलियुग अन्त में साधारण मानव तन में होती है, उसमें प्रवेश करके शंकर के नाम-रूप से संसार में धीरे-2 प्रत्यक्ष होना शुरू होते हैं। शंकर का सख्त पार्ट है। सख्त पार्ट के द्वारा वे ब्राह्मणों के सम्प्रदाय में दो फाड़े कर देते हैं- सच्चे मुखवंशावली ब्राह्मण और झूठे कुखवंशावली ब्राह्मण मुखवंशावली वह जो ब्रह्मा के मुख से चलाई हुई मुरली की ही बात मानते हैं, किसी देहधारी की बात नहीं मानते और कुखवंशावली वह जो ब्रह्मा की कुख अर्थात् गोद के प्यार को विशेष महत्व देते हैं, मुख की चलाई हुई मुरली को महत्व नहीं देते। चुनी हुई कुछ श्रेष्ठ आत्माएँ निकलती है।
आपने देखा होगा कि शंकर जी के बाहों में माला दिखाते हैं। गले में भी कई तरह की मालाएँ पड़ी हुई है। माला संगठन की निशानी होती है। एक स्नेह और दूसरे, ज्ञान के सूत्र में वे मणके रूपी आत्माएँ पिरोई गई हैं। उनका संगठन तैयार किया गया है वह माला रूपी संगठन सारे संसार में हर धर्म में मान्यता प्राप्त करता है। किस रूप में? आप देखेंगे, मुसलमानों में भी माला घुमाई जाती है, किश्चियन्स में भी माला घुमाई जाती है, बौद्धी लोग भी माला घुमाते हैं, सिक्ख लोग भी माला घुमाते हैं। यह माला का इतना महत्व क्या है जो हर धर्म में घुमाई जाती है? यह कोई नहीं जानता। बाबा ने मुरली में बताया है कि “बच्चे, ये माला के जड़ मणके तुम तामसी जड़जड़ीभूत आत्माओं की यादगार है।” जब परमपिता परमात्मा आते हैं तो तुम आत्मा रूपी मणकों को इकट्ठा करते हैं और श्रेष्ठ आत्माओं का जो माला रूपी संगठन तैयार होता है वह सारे संसार में तहलका / खलबली मचाता है। पहले भारतवर्ष में ब्राह्मणों की दुनिया के अन्दर तहलका / खलबली शुरू होती है।
6- दुनिया में आज मुख्य 9 धर्म फैले हुए हैं- ये कहाँ से आये ?
माला के संगठन में 108 मणके होते हैं। आप देखेंगे, दुनिया में आज मुख्य-मुख्य 9 धर्म फैले हुए हैं। हिन्दू धर्म तो बहुत पुराना है। उसमें से दो फाड़े ऐसे हैं- (एक) जो कभी दूसरे धर्म में कनवर्ट नहीं होते और दूसरे ऐसे हैं कि जो कनवर्ट होते ही रहे।
मुसलमान आए तो मुसलमानों में कनवर्ट हो गए, क्रिश्चियन्स आए तो क्रिश्चियन्स में कनवर्ट हो गए, सिक्ख आए तो सिक्ख में कनवर्ट हो गए। तात्पर्य यह है कि सनातन धर्म में दो प्रकार के वर्ग हो गए- एक नॉन कनवर्टेड, जो कभी कनवर्ट नहीं हुए। भले किसी भी तरह की कोई परीक्षा आई; परंतु अपने धर्म को नहीं छोड़ा। दूसरे वह, जो कनवर्ट होते ही रहे, एक से दूसरे धर्म में दूसरे से तीसरे धर्म में, तीसरे से चौथे धर्म में आज से 2500 वर्ष पहले इस्लाम धर्म’ आया, फिर चौथा ‘बौद्ध धर्म आया, (जो) चीन, जापान, बरमा, मलाया में फैला।
पाँचवाँ क्रिश्चियन धर्म’ आया, जो युरोपीय देशों में फैला, अमेरिका में फैल गया। छठा शंकराचार्य का ‘सन्यास धर्म’ (लाल-पीले-काले-सफेद कपड़े पहनकर निकला)। उसके बाद मुहम्मद आए जिन्होंने इस्लाम धर्म के फाड़े करके मूर्तिपूजा बंद करवा दी और मुस्लिम धर्म फैलाया। उसके बाद गुरूनानक आए और उन्होंने मुसलमानों से टक्कर लेने के लिए भारत के ही अच्छे-खासे हट्टे-कट्टे कम बुद्धि वाले, जो सनातन धर्म के लोग थे, उनको कनवर्ट करके सिक्ख बना दिया और वे मुसलमानों से, क्रिश्चियन्स से जबर्दस्त टक्कर लेते रहे।
कुल मिलाकर अन्त में ‘आर्य समाज एक ऐसा धर्म आता है जो सबको आहूत करता है कि तुम सब आ करके भारतवर्ष में इकट्ठे हो जाओ। किसी भी धर्म का हो हम उसे हिन्दू बना देंगे। पक्के हिन्दुओं ने तो कभी विधर्मियों को स्वीकार नहीं किया। आर्यसमाजियों ने अपने देश में सब धर्मों का कचड़ा इकट्ठा कर लिया।
एक धर्म ऐसा है ‘नास्तिकवाद’, जो माला में नम्बर ही नहीं पाता। ईश्वर की जो श्रेष्ठ आत्माओं वाली 108 की माला बनती है, उसमें उनका नम्बर नहीं लगता। वे ये हैं नास्तिक (रशियन्स)। वे न स्वर्ग मानते हैं, न नर्क मानते हैं; न आत्मा को मानते हैं, न परमात्मा को मानते हैं। वे कुछ नहीं मानते। वे अपने नशे में आकर ऐटमिक एनजी तैयार करते हैं कि हम ही सब कुछ हैं। हम चाहेंगे तो दुनिया को नचाएँगे, नहीं तो नष्ट कर देंगे लेकिन वे अपने मक्कड़ जाल में खुद ही फँस जाते हैं। आज तो रूस बिखर गया और उससे ज्यादा ऐटमिक एनर्जी अमेरिका ने धारण कर ली है। इस तरीके से दुनिया के नंव्यार 9 मुख्य आस्तिक धर्म है।
इन 9 धर्मों की चुनी हुई मुख्य-2 बारह-2 (9x 12 = 108) आत्माएँ परमपिता परमात्मा इकट्ठी करते हैं। सारी सृष्टि से चुनकर 12 नेमा 108 मणके तैयार होते हैं।
7- परमपिता परमात्मा शिव कैसे आकर एक तरफ स्थापना और दूसरी तरफ विनाश का कार्य संपन्न करते हैं ?
आज से 70-75 साल पहले भारतवर्ष में इतने भगवान नहीं थे। आचार्य रजनीश भी भगवान, जय गुरुदेव भी भगवान, साँई बाबा भगवान, सतपालजी महाराज भगवान, चंद्रा स्वामीजी भगवान- ये ढेर के ढेर भगवान 75 साल पहले थे ही नहीं। 70-75 साल के अंदर ही ये ढेर के ढेर भगवान पैदा हो गए। अब भगवान एक होगा या ढेर के ढेर होंगे? भगवान तो ज़रूर एक होगा; लेकिन हिसाब क्या है? जब इस सृष्टि पर परमधाम छोड़कर सच्चा हीरा आता है तो उसकी भेंट में ढेर सारे नकली हीरे दुनिया के बाज़ार में तैयार हो जाते हैं। वे नकली हीरे चारों तरफ अपना पॉम्प एण्ड शो, शोर-शराबा फैला देते हैं। जबलपुर में महेशयोगी की एक बड़ी भारी बिल्डिंग बननी थी। सैकड़ों-करोड़ों रुपयों की वह बिल्डिंग तैयार होनी थी। उसमें होना क्या? बस, वही स्वाहा। अब उससे कुछ होता थोड़े ही है।
2500 वर्ष से यह स्वाहा-2 होता चला आया। क्या इससे कोई दुनिया का परिवर्तन होना है? परिवर्तन कुछ भी नहीं होना है। वह एक बात तो सच्ची बता दी कि वातावरण शुद्ध होता है; परन्तु बजाय वातावरण शुद्ध होने के दुनिया और ज्यादा बिगड़ रही है। (एक भाई ने कहा- अमेरिका से वे गोल्ड का स्मगलिंग करते हैं)। चलो वह कुछ भी हो, हमने एक बात बताई कि भगवान ढेर के ढेर है; लेकिन नकली हीरे हैं और उनमें पता नहीं चल रहा है कि असली कौन है? जरूर असली भी है, लेकिन पता नहीं चल रहा है और उसका प्रूफ यह है कि भगवान जब आएँगे तो नई सृष्टि की स्थापना के साथ -2 पुरानी सृष्टि का विनाश का सामान भी तैयार कराएँगे। सत् धर्म की स्थापना के साथ-2 ढेर के ढेर जो दुष्ट धर्म फैले हुए हैं उनका भी विनाश का कार्य करते-कराते हैं। “विनाशाय च दुष्कृताम्।” (गीता 4/8) गीता का यह श्लोक ही बताता है। परमपिता परमात्मा जब इस सृष्टि पर आते है तो यह तैयारी पहले कराते हैं। स्थापना गुप्त करते हैं और विनाश का कार्य प्रत्यक्ष कराते हैं।
रूस और अमेरिका, जिनको अपनी भारतीय परम्परा में महाभारत में यादव कहा गया है। बड़े-2 धनाढ्य होते थे, बहुत शराब पीते थे और ऊँची-2 बिल्डिंगें होती थीं। ऐसे जो यादव ग्रुप है उन्होंने क्या किया? ये थे तो यदुवंशी भगवान कृष्ण के कंट्रोल में, लेकिन उन्होंने क्या किया? उनके बुद्धि-रूपी पेट से जो मिसाइल्स निकले, उन मूसलों से उन्होंने आपस में मिलकर लड़कर अपने सारे कुल का संहार कर दिया और सारी सृष्टि का विनाश कर दिया। लोगों ने स्थूल मूसल समझ लिए। अब यह तो समझने-2 की विडंबना है।
वास्तव में है मिसाइल्स की बात। जैसे पेट में कोई चीज पचाई जाती है ऐसे यह बुद्धि-रूपी पेट है। कहते हैं ना तुम्हारे पेट में बात नहीं पचती। तो क्या यह (स्थूल) पेट है या यह (बुद्धि रूपी) पेट है? इस बुद्धि रूपी पेट में से वे मिसाइल्स निकले। उन लोहे के मूसलों से यह सारी दुनिया नष्ट होती है। 170-75 साल के अंदर भारी तादाद में यह एनर्जी भी तैयार हो गई. सृष्टि पर परमपिता परमात्मा का अवतरण भी हुआ और 70-75 साल पहले भारतवर्ष में महात्मा गांधी के टाइम पर सबसे ज़्यादा जो आवाज लगाई गई थी. है पतित-पावन। आओ वह आवाज़ भी लग रही थी। भारत की 40 करोड जनता गांधीजी के तत्वावधान में ‘रघुपति राघव राजाराम, पतित-पावन सीताराम की आवाज लगा रही थी, लेकिन आवाज लगाने वालों को यह पता नहीं चला कि परमपिता परमात्मा इस सृष्टि पर उस समय से ही आ चुके हैं।
कहने का मतलब यह है कि जब परमपिता परमात्मा आते हैं तो एक तरफ विनाश की बाजी भी तैयार कर देते हैं और दूसरी तरफ स्थापना का कार्य भी गुप्त में चलाते हैं। तो इस समय ये दोनों कार्य सम्पन्न हो रहे हैं- स्थापना का कार्य भी पूरा होता है और ऐटमिक एनर्जी भी तैयार हो जाती है, जिसका प्रथम विस्फोट हीरोशिमा-नागासाकी में हुआ। तब जा करके इस सृष्टि का एक तरफ विनाश होता है और दूसरी तरफ वह माला तैयार हो जाती है जो सारी सृष्टि की धर्मसत्ता और राज्य सत्ता की बागडोर धीरे-2 अपने हाथों में ले लेती है। आपने ज्योतिषियों की कुछ भविष्यवाणियाँ सुनी होंगी, जो अक्सर करके निकलती रहती हैं। 400 / 500 साल पहले के जो ज्योतिषी हुए हैं- कीरो, कीथ और नेस्तरडाम आदि इनकी भविष्यवाणियाँ निकली हुई हैं। सभी ने 2000 को मुद्दा बनाया, लेकिन 2000 के आस-पास का जो भी मुद्दा था, वह सारी सृष्टि के विनाश का मुद्दा नहीं था। वह वास्तव में सिर्फ ब्राह्मणों की दुनिया के अन्दर आधारमूर्त एवं बीजरूप आत्माओं की दुनिया के विनाश का मुद्दा है। यह कोई नहीं जानता। यह दुनिया एकदम ऐसे चुटकी में खत्म हो जाएगी तो परमपिता परमात्मा को कौन पहचानेगा? परमपिता परमात्मा को पहचानने के लिए टाइम तो चाहिए ना। –visit now- https://pbks.info/
वास्तव में, यह जो 2000 साल के बाद का पीरियड है, यह ब्रह्माकुमारी आश्रम में आमूल-चूल परिवर्तन ला देगा। बाहर की दुनिया में भी थोड़ा-2 परिवर्तन होगा, ऐटमिक एनर्जी का भी थोड़ा-2 विस्फोट होगा, लेकिन इतना नहीं होगा कि सारी सृष्टि ख़त्म हो जाए। अभी सिर्फ ब्राह्मणों की पुरानी दुनिया का विनाश होता है, नई दुनिया की स्थापना होती है और सब आत्माएँ पहले बुद्धियोग से वापस परमधाम में जाती हैं। मागे ब्राह्मणों की दुनिया के अन्दर जो विशेष आत्माएँ हैं, वे इस बात को समझ लेती है कि परमपिता परमात्मा का साकार रूप और कार्यकाल क्या है और यह कार्य कैसे चल रहा है।
यहाँ दिखाया गया है कि जैसे हम आत्माएँ ज्योतिबिन्दु है, पैसे परमपिता परमात्मा भी ज्योतिबिन्दु है। ज्योतिबिन्दु का ही बड़ा आकार शिवलिंग बनाया जाता है, जिसे अपनी भारतीय परम्परा में 12 ज्योतिर्लिंगम के नाम से प्रसिद्ध किया गया है। उज्जैन, काशी, रामेश्वरम्, केदारनाथ, बद्रीनाथ ये 12 ज्योतिर्लिंगम बने हैं। 12 ही क्यों, 13 क्यों नहीं? 11 या 10 क्यों नहीं? 9 धर्मों से चुनी हुई 12-12 आत्माओं के 9 ग्रुप्स होते हैं। हर धर्म में श्रेष्ठ आत्माएँ तो होती हैं ना! परमपिता परमात्मा भी जब आते हैं तो सर्वप्रथम हर धर्म से श्रेष्ठ आत्माओं को चुनते हैं और चुनकर उनको पक्का सूर्यवंशी ब्राह्मण बनाते हैं।
आज की दुनिया में वास्तव में कोई ब्राह्मण नहीं रहा। (भाई ने कहा- आप यह क्या कहते हैं? आप तो ब्राह्मणों की अवहेलना करते हैं)। नहीं, तुलसीदास ने यह बात रामायण में आज से 400-500 वर्ष पहले लिखकर छोड़ी है- भये वर्ण संकर सबै सारे ही वर्ण संकर हो गए. कोई ब्राह्मण और कोई शूद नहीं रहा। उन्होंने 400 साल पहले लिखा था, अब तो हालत बहुत खराब हो गई। अब तो बहुत ज्यादा व्यभिचार फैल गया। घर-2 में व्यभिचार फैला हुआ है तो इस समय परमपिता परमात्मा आकर प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा असली ब्राह्मण कुल की स्थापना कर रहे हैं। आपने सुना होगा, ब्राह्मणों की 9 कुरियों गाई जाती है- शांडिल्य गोत्र, भारद्वाज गोत्र कश्यप गोत्र आदि 219 ऋषियों के आधार पर 9 गोत्र गाए जाते हैं। वे 9 ऋषि कोई दूसरे नहीं हैं, 9 धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाली 9 श्रेष्ठ आत्माएँ हैं, जो परमपिता परमात्मा इस सृष्टि से असली ब्राह्मण धर्म में चुनते हैं जो 9 आत्माएँ हैं उनमें से एक सबसे श्रेष्ठ होगा ना? जो सबसे श्रेष्ठ हुआ, उसके जो 12 के ग्रुप है, वे परमपिता परमात्मा शिव से इतना तादात्म्य स्थापित करते हैं कि उनकी शिव जैसी ही स्टेज बन जाती है। इसलिए तो 12 ज्योतिलिंगम् आज भी भारतवर्ष में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं। visit now- https://pbks.info/
कहने का मतलब यह हुआ कि परमपिता परमात्मा शिव भी ज्योतिबिंदु हैं। ऋषियों-महर्षियों ने पूजा के लिए उनका बड़ा आकार बना दिया है। वह निराकारी स्टेज का प्रतीक है। निराकार का मतलब यह है कि उस स्टेज में जो 12 हैं, उनमें से एक शंकर का रूप, जिसे ‘रुद्र अवतार कहा जाता है, ये ऐसी निराकारी स्टेज में रहते हैं कि जैसे कि उनका शरीर रूपी वस्त्र है ही नहीं। नं०वार इस स्टेज में रहना, अपने को सदैव आत्मिक स्टेज में समझना, दूसरों को आत्मा के रूप में देखना- ऐसी प्रैक्टिस पक्की हो जाए, उसको कहेंगे “निराकारी स्टेज’। इंद्रियों जैसे होते हुए भी नहीं हैं। जैसे कहते हैं- देखते हुए भी नहीं देखना, सुनते हुए नहीं सुनना जैसे दुनिया में कितनी भी ग्लानि उड़ रही है, उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ रहा है।visit now- https://pbks.info/
और अधिक जानकारी के लिए निचे दिए गये video को अवश्य देखें.. ॐ शांति
आध्यात्मिक विश्वविद्याल
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