आध्यात्मिक ज्ञान

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मैं कौन हूँ | Who am i | स्वयं को पहचानें ? | आत्मा या शरीर?

मैं कौन हूँ | Who am i | स्वयं को पहचानें ? | आत्मा या शरीर?

आप वास्तव मैं कौन हैं? जब यह सवाल पूछा जाता है, तो हममें से ज़्यादातर लोग जवाब देते हैं, “मैं एक डॉक्टर हूँ,” “मैं एक पुरुष हूँ,” “मैं एक महिला हूँ,” या अपनी उम्र बता देते हैं। लेकिन क्या ये हमारी असली पहचान है? ये सभी लेबल तो हमारे शरीर, उसके व्यवसाय या उसकी अवस्था से जुड़े हैं, जो समय के साथ बदलते रहते हैं। जब आप बच्चे थे, तब भी आप वही थे, और जब आप बूढ़े हो जाएंगे, तब भी आप वही रहेंगे। तो फिर हमारी वह सच्ची, शाश्वत पहचान क्या है जो कभी नहीं बदलती?
यह एक गहरा सवाल है जिसका जवाब हमारी सोच को पूरी तरह बदल सकता है। अक्सर हम जिन आध्यात्मिक सच्चाइयों को सच मानकर चलते हैं, वे अधूरी या गलत भी हो सकती हैं। यह लेख कुछ ऐसे ही चौंकाने वाले रहस्यों को उजागर करेगा जो हमारे अस्तित्व, ईश्वर और इस दुनिया के भविष्य के बारे में हमारी समझ को एक नई दिशा देंगे। आइए, उन पांच सबसे आश्चर्यजनक आध्यात्मिक सच्चाइयों को जानते हैं जो आपकी दुनिया देखने का नजरिया हमेशा के लिए बदल सकती हैं।
 

आप यह शरीर नहीं, एक अमर आत्मा हैं-

 
सबसे पहली और बुनियादी सच्चाई यह है कि हम यह शरीर नहीं हैं, जिसे हम हर दिन शीशे में देखते हैं। हमारी असली पहचान एक ज्योति-बिंदु स्वरूप आत्मा है। सोचिए, जब आप एक बच्चे थे, तब भी आप एक आत्मा थे, और आज जब आप बड़े हो गए हैं, तब भी आप वही आत्मा हैं। शरीर बदल गया, लेकिन आप नहीं बदले।
यह आत्मा अजर (जिस पर उम्र का असर न हो), अमर (जो कभी न मरे) और अविनाशी (जिसका कभी विनाश न हो) है। जैसे हम पुराने कपड़े बदलकर नए पहन लेते हैं, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण कर लेती है। यह ज्ञान सिर्फ एक दर्शन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत परिवर्तन का एक शक्तिशाली साधन है। जब हम खुद को आत्मा समझते हैं, तो देह-भान से पैदा होने वाले बड़े-बड़े विकार खत्म हो जाते हैं। जैसे, स्त्री और पुरुष के बीच आकर्षण शरीर को देखने से ही पैदा होता है, जिससे काम-विकार का जन्म होता है। लेकिन जब बुद्धि में यह ज्ञान हो कि ‘मैं एक ज्योति-बिंदु आत्मा हूँ और सामने वाला भी एक आत्मा है, जो अगले जन्म में पुरुष का शरीर भी ले सकती है,’ तो वह आकर्षण खत्म हो जाता है। इसी तरह, क्रोध और अहंकार भी देह-अभिमान की ही देन हैं। एक राजा एक सफाईकर्मी के अपमानजनक शब्द पर इसलिए क्रोधित होता है क्योंकि वह अपने शरीर को ऊँचा और दूसरे के शरीर को नीचा समझता है। अगर उसे याद रहे कि ‘मैं आत्मा, पिछले जन्म में एक भिखारी हो सकता था और यह सफाईकर्मी की आत्मा एक राजा हो सकती थी,’ तो ऊँच-नीच का भेद और क्रोध तुरंत मिट जाएगा।
आप एक आत्मा हो, जो आत्म-अभिमानी स्तिथि में टिकने वाले हो, इसलिए टीका लगाते हो। आप शरीर नहीं हो।
WHO AM I

आत्मा क्या है? | आत्मा और शरीर का फर्क | Gita Secret Explained

              शरीर अलग चीज़ है , आत्मा अलग चीज़ है और दोनों मिलकर जीवआत्मा अर्थात् जीवित आत्मा बनती है । जीवित आत्मा ‘ का मतलब है शरीर सहित काम करने वाली चैतन्य शक्ति नहीं तो यह आत्मा भी काम नहीं कर सकती और यह शरीर भी नहीं काम कर सकता । इसका मिसाल एक मोटर और ड्राइवर से दिया हुआ है । जैसे मोटर होती है , ड्राइवर उसके अन्दर है तो मोटर चलेगी , ड्राइवर नहीं है तो मोटर नहीं चलेगी । मतलब यह है कि आत्मा , ( एक भाई ने कहा- वायु है ) , वायु नहीं है । पृथ्वी , जल , वायु , अग्नि और आकाश- ये पाँच जड़ तत्व तो अलग हैं जिनसे यह शरीर बना है । इन पंच तत्वों के बने शरीर में से आत्मा निकल जाती है तो शरीर के अन्दर पाँच तत्व रहते हैं उनको जलाया जाता है या मिट्टी में दबाया जाता है । वे तो जड़ तत्व हैं , लेकिन आत्मा उनसे अलग क्या चीज़ है ? वह मन और बुद्धि स्वरूप एक अति सूक्ष्म ज्योतिर्बिन्दु है , जिसको गीता में कहा गया 1370 ” अणोरणीयांसमनुस्मरेत् यः । ” ( गीता अर्थात् अणु भी अणुरूप बताया । अणु है ; लेकिन ज्योतिर्मय है ।

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मन, बुद्धि और संस्कार — आत्मा का सच्चा स्वरूप | “मनरेव आत्मा” का गूढ़ रहस्य | Adhyatmik Gyan

 उस मन – बुद्धि रूपी चैतन्य अणु में जन्मों के 8 / 9 ) अनेक संस्कार भरे हुए हैं । मन – बुद्धि को ही आत्मा कहा जाता है । वेद की एक ऋचा में भी आई है- ‘ मनरेव आत्मा ‘ अर्थात् मन को ही आत्मा कहा जाता है । आदमी जब शरीर छोड़ता है अर्थात् आत्मा शरीर छोड़ती है तो ऐसे थोड़े ही कहा जाता है कि मन बुद्धि रह गई और आत्मा चली गई । सब कुछ है लेकिन मन – बुद्धि की शक्ति चली गई अर्थात् आत्मा चली गई । बात तो मन बुद्धि की जो पावर है वास्तव में उसका ही दूसरा नाम आत्मा है । मन – बुद्धि में इस जन्म के और पूर्व जन्मों के संस्कार भरे हुए हैं । संस्कार का मतलब है- अच्छे – बुरे जो कर्म किए जाते हैं , उन कर्मों का जो प्रभाव बैठ जाता है उसको कहते हैं ‘ संस्कार । जैसे किसी परिवार में कोई बच्चा पैदा हुआ , वह कसाइयों का परिवार है , बचपन से ही वहाँ गाय काटी जाती है , उस बच्चे से , जब बड़ा हो जाए , पूछा जाए कि तुम गाय काटते हो , बड़ा पाप होता है , तो उसकी बुद्धि में बैठेगा ; क्योंकि उसके संस्कार ऐसे पक्के हो चुके हैं । इसी तरीके से ये संस्कार एक तीसरी चीज़ है शक्तियाँ मिल करके आत्मा कही जाती है। 

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भगवान कब और क्यों आते हैं? | आत्मा की रचना और पुनर्जन्म का सच |

        आत्मा पहले है देह बाद में यह कैसे ? बच्चा जब गर्भ में आता है , माँ के पेट में बच्चा आता है ना ! तो पहले देह होती है कि पहले आत्मा आती है ? पहले तो देह होती है । गर्भ पिण्ड निर्जीव तैयार होता है , ( 4-5 माह ) बाद उसमें आत्मा आती है । तो यह बात तो झूठी हो गई । ( किसी ने कहा- आत्मा है जो अपने संकल्पों से अपनी रचना कर रही है । ) हाँ , जो भी मनुष्य शरीर छोड़ता है , शरीर छोड़ने से चार महीने पहले ही उसका गर्भ माँ के पेट में तैयार होता है , मतलब आत्मा के संकल्पो – विकल्पो – वायब्रेशन के आधार पर उसका गर्भ पिण्ड दूसरी माँ के पेट में तैयार होता है । अगर काना पैदा ( होना ) होगा , अंधा पैदा होना होगा तो उसके वायब्रेशन के आधार पर वह बच्चा अंधा पैदा होता है । कोई लूला – लँगड़ा पैदा होता है , कोई कुरूप पैदा होता है , कोई बहुत सुन्दर पैदा होता है । तो जो गर्भ पिण्ड बनता है , वह गर्भ पिण्ड पहले हुआ या पहले आत्मा हुई ? आत्मा पहले । भल चार महीने पहले उस आत्मा को पुराना शरीर भी है ; लेकिन वह शरीर जड़जड़ीभूत हो गया , उस शरीर के साथ , उस पाँच तत्वों के पुतले के साथ आत्मा का हिसाब -किताब पूरा होने वाला है । आत्मा वह शरीर छोड़ देती है और चार महीने से तैयार उस निर्जीव गर्भ पिण्ड में प्रवेश कर जाती।

         तो आत्मा है मुख्य और जड़ शरीर है रचना । आत्मा है रचयिता । यह शरीर रूपी जो वृक्ष है इसका बाप कौन है ? ( इस शरीर रूपी वृक्ष को बनाने वाला कौन है ? आत्मा । ) आत्मा है बीज । कोई कहे कि यह आम का वृक्ष खड़ा हुआ है , इसका बाप कौन है ? आम का बीज । तो बीज है आत्मा और शरीर है उसकी रचना । अब आत्मा के ऊपर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए या रचना के ऊपर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए ? ( किसी ने कहा- आत्मा के ऊपर ) या दोनों के ऊपर ध्यान देना चाहिए ? आज की दुनियाँ किसके ऊपर ज़्यादा ध्यान देती है ? ( सबने कहा- रचना के ऊपर ) कोई से पूछो- आप कौन हैं ? तो कहेंगे- हम मास्टर हैं , डॉक्टर हैं , इंजीनियर हैं , वकील हैं , जज हैं , मिनिस्टर हैं । उनसे पूछें आप जब पैदा हुए थे तब ये थे ? तो यह जो बोला , वह देहभान में आकर बोला या अपन को आत्मा समझकर बोला ? देहभान में आकर बोला । समझते हैं- हम देह हैं । यह प्रियरिटी ( प्राथमिकता ) आज की दुनियाँ देह को देती है ।

              भगवान बाप जब इस सृष्टि को सुधारने के लिए आते हैं , कलियुग को सतयुग बनाने के लिए आते हैं , झूठ खण्ड की दुनियाँ को सच्च खण्ड की दुनिया बनाने के लिए आते हैं , तो बताते हैं- तुम देह नहीं हो । देह तो पाँच ( जड़ ) तत्वों का पुतला है- पृथ्वी , जल , वायु , अग्नि , आकाश और इन पाँच तत्वों से बने पुतले को चलाने वाली आत्मा चैतन्य है और वह चैतन्य आत्मा ज्योतिबिन्दु है , स्टार मिसल है । वे आसमान के स्टार्स जड़ हैं और तुम इस धरती के चैतन्य सितारे हो । तुम जो चैतन्य सितारे हो , तुममें से कोई तो सूर्य के रूप में पार्ट बजाने वाला है , कोई चन्द्रमा के रूप में पार्ट बजाने वाला है , कोई बुद्ध के रूप में पार्ट बजाने वाला है , कोई शुक्र के रूप में , कोई मंगल के रूप में अर्थात् सप्त ऋषियों के रूप में पार्ट बजाने वाली आत्माएँ हैं ; परन्तु तुम अपने ओरिजिनल रूप को भूल गए हो । मैं आ करके तुमको स्मृति दिलाता हूँ कि तुम किस तरह ( की ) पार्टधारी आत्मा हो और तुम्हारा क्या पार्ट है , जो गीता में अर्जुन से कहा- “ हे अर्जुन ! तू अपने जन्मों को नहीं जानता , मैं तेरे को बताता हूँ । 

               बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ 4/5

तो ऐसे नहीं है कि भगवान इस मनुष्य – सृष्टि पर आकर जो भी दुनियाँ की 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएँ हैं , उन सब मनुष्यात्माओं को , एक -2 का अनेक जन्मों का पार्ट बैठ करके बताता है । नहीं ! जैसे गणित होता है बीज गणित होता है , उसमें परिक्रिया बताई जाती है , उस परिक्रिया के आधार पर चलेंगे तो रिज़ल्ट निकल आवेगा । ऐसे ही भगवान इस सृष्टि पर आकर जो मुख्य -2 पार्टधारी हैं , जिनकी संसार में , मनुष्य – सृष्टि में बड़ी शोहरत है , उनके पार्ट बता देता है । कौन – कौन – से मुख्य पार्टधारी हैं ।… आत्मा से सम्बंधित विस्तार में जनने के लिए निचे दिए हुए विडियो को देखें 

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