आध्यात्मिक ज्ञान

त्रिमूर्ति - चित्र का परिचय

त्रिमूर्ति (एडवांस कोर्स) चित्रों का परिचय

शिवबाबा ने संदेशियों के साक्षात्कार के आधार पर चार चित्र बनवाए थे- त्रिमूर्ति, सृष्टि-चक्र, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी-नारायण। यह चित्र शिवबाबा के डायरेक्शन से बने हैं। मु.ता.1.1.75 पृ.1 के मध्य में बाबा ने बोला है- (1.) “बाप के डायरेक्शन से ही यह चित्र आदि बनाए जाते हैं। बाबा दिव्य-दृष्टि से चित्र बनवाते थे। कोई तो चित्र अपनी बुद्धि से भीबनाते रहते हैं।” जिसके लिए इसी मुरली के पृ.3 के मध्य में बाबा ने बोला है- (2.) “तुम्हारे यह चित्र सब अर्थ सहित हैं। अर्थ बिगर कोई चित्र नहीं। जब तक तुम किसको समझाओ नहीं तब तक कोई समझ न सके। समझाने वाला समझदार, नॉलेजफुल एक बाप ही है।” (3.) “यह चित्र भी दिव्य-दृष्टि से सा. कर बैठ बनाए हैं।” (मु.ता. 27.09.71 पृ.1 मध्य) इन चित्रों के चित्रण में भी गुह्य अर्थ है। इन चित्रों में समझाने के लिए लिखत भी दी हुई है। मु.ता. 28.10.72 पृ.1 के मध्य में बोला है- (4.) “चित्र सहित सारी लिखत होनी चाहिए।” मु.ता. 30.4.71 पृ.2 के अंत में बाबा ने बोला है- (5.) “अरे, यह तो बाप नेचित्र बनाए हैं। तुम चित्रों से लिखत निकाल देते हो, तुम तो कोई डैमफुल दिखाई पड़ते हो।” 

      इन महावाक्यों के अनुसार शुरू में जो 4-5 चित्र बनाए गए थे, वो ही सिर्फ बाबा के डायरेक्शन से बने थे, बाद में माया की मत पर अनेक चित्र बनाए गए और अभी भी बन रहे हैं। इन चित्रों में लिखत भी दी गई थी; परन्तु वर्तमान समय में ब्रह्माकुमारियों के द्वारा लिखत हटा दी गई है और चित्रों में भी परिवर्तन कर दिया गया है; इसलिए बाबा ने बोला- तुम इन चित्रों से लिखत निकाल देते हो तो डैमफुल अर्थात् मूर्ख दिखाई पड़ते हो। ये सभी पुराने चित्र लगभग 30X40 साइज़ के थे। 

(6.) “बाबा ने 30X40 वाले झाड़- त्रिमूर्ति बनवाई थी, वो लगाए देनी है। बाबा को चित्रों का बहुत शौक है; क्योंकि हम बनाते हैं अर्थ सहित। बाकी सभी चित्र हैं अर्थ रहित। जैसे सच्ची गीता बनाई है, वैसे सच्चे चित्र भी बनाने हैं।” (मु.ता. 14.3.63 पृ.3 मध्यांत) 

पहले जो चित्र बनाए गए थे, वो यथार्थ नहीं थे। जैसे-2 मुरली की नई व्याख्या निकलती है, उस अनुसार शिवबाबा करेक्शन करते हैं। इसलिए शिवबाबा ने ही बताया- सच्चे चित्र बनाने हैं। जिसके लिए कई मुरली/अव्यक्त-वाणियों के महावाक्यों में बाबा ने स्पष्ट भी किया है- 

(7.) ये तो सारा चित्र हमको चेन्ज करना पड़ता है। आज भी बताया ना कोई चीज़ कि ये तो चित्र फिर चेन्ज करना पड़े, कोई बात बताई थी (किसी ने कहा-फिमेल्स, मेल)। हाँ, चित्रों में रखना चाहिए। उनमें तो रखने में चित्रों में चेन्ज करनी पड़े। (साकार रात्रि मु.ता. 18.6.68) 

(8.) दिव्य दृष्टि दाता तो वह है न! नए-2 चित्र बनवाते रहते हैं। एक बार बनाया, फिर प्वॉइण्ट निकलती है तो करेक्ट करना पड़ता है। (मु.ता. 19.5.73 पृ.3 आदि) 

(9.) तुम जो चित्र बनाते हो, उनकी पहचान देनी है तो मनुष्य समझ जाए। (मु.ता. 16.4.68 पृ.1 मध्यांत) 

(10.) यथार्थ चित्र तो बच्चों को समझाया गया है- शिवबाबा, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। (साकार मु.ता. 27.07.64) (11.) जो अनन्य बच्चे हैं, उनका चित्र रखना चाहिए। (मु.ता.19.1.74 पृ.4 अंत) (12.) अनन्य अर्थात् जो अन्य न कर सकें, वह करके दिखाने वाले। (अ.वा.ता. 10.11.83 पृ.13 अंत) 

   परमपिता+परमात्मा शिव का जो विशेष कार्य है स्थापना, विनाश और पालना का, वो सिर्फ़ इन तीन मूर्तियों के द्वारा होता है। जिससे सृष्टि का चक्र चलता है, जो कार्य दिखाया गया है। और कोई नहीं कर सकता। इसलिए वर्तमान समय में उन्हीं अनन्य आत्माओं को चित्र में दिखाया गया है –

 (13.) बाप तो तीन देवताओं का रचयिता होने के कारण त्रिमूर्ति कहलाते हैं। (अ.वा.ता. 8.6.71 पृ.97 अंत)

 (14.) आर्टिफिशियल कहाँ तक चलेगा। त्रिमूर्ति को हम छिपा नहीं सकते। (मु.ता. 19.11.72 पृ.3 मध्यांत) 

जो वास्तव में चैतन्य आत्माएँ हैं, जिनको छुपा दिया है; लेकिन वो छुप तो नहीं सकते हैं।

 (15.) त्रिमूर्ति चित्र भी रखना चाहिए यहाँ समझाने के लिए, यह कौन हैं तीन, इनका रचने वाला (रचयिता/क्रियेटर) कौन? वो कहाँ चला गया? समझा ना! ब्रह्मा, विष्णु, शंकर; ब्रह्मा का भी तो रचता कहा है ना, सूक्ष्मवतन का नहीं, यहाँ का है प्रजापिता ब्रह्मा (साकार मु.ता. 5.9.63) 

(16.) त्रिमूर्ति दिखाने बिगर समझाना भी मुश्किल है। (मु.ता. 4.11.65/72 पृ.1 मध्य) असल में त्रिमूर्ति है, 

नके परिचय के बिगर समझा भी नहीं सकते।

(17.) जब यादगार के चित्र शुरू होंगे तो पहले-2 तो शिवबाबा का होगा। फिर उनके वो त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, शंकर वगैरह, जो अभी तुम बैठे हो, उनके चित्र अभी निकलेंगे।(साकार मु. ता. 17.1.65) 

(18.) अभी (असली) शिवजयंती आती है, तुमको त्रिमूर्ति शिव का (चैतन्य) चित्र निकालना चाहिए। त्रिमूर्ति ब्र.वि.शं. का एक्युरेट क्यों न निकालें (मु.ता.19.1.75 पृ.3 मध्यादि)

 (19.) जो भी बड़े-2 चित्र हैं, सभी जब करेक्शन होंगी, तो बिगर करेक्शन नहीं जाएगा, वो चेन्ज करना होगा लिखत में या तो डिस्ट्रॉय (नष्ट) कर देना पड़ेगा। (साकार रात्रि मु.ता. 1.12.67) (वी.सी.डी. 2957) 

वास्तव सन् 1960-61 में जो त्रिमूर्ति का चित्र बना था, वो यथार्थ नहीं था। 

(20.) “यह त्रिमूर्ति आदि के चित्र यथार्थ रीति हैं नहीं। यह तो सब अर्थ रहित चित्र हैं।” (मु.ता. 30.1.68 पृ.1 अंत) 

उसमें तो एक ब्रह्मा का मुख ही तीनों मूर्तियों में दिखाया था, जिनमें से पहला मुख सिर्फ़ ब्राह्मण वर्ण की रचना करता था, बाकी दो मुख विष्णु और शंकर के यथार्थ फीचर्स नहीं थे। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, चैतन्य पार्टधारी आत्माओं को रखेंगे तो यथार्थ चित्र होगा; इसलिए अभी उन चित्रों को हटाकर यथार्थ (एक्युरेट) चित्र बनाया गया है। यहाँ चित्र में तीन मूर्तियाँ दिखाई हैं- जो हिन्दू धर्म की मान्यतानुसार शास्त्रों में भी 33 कोटि देवताओं में सर्वोपरि / श्रेष्ठ माने गए हैं, जिनको शास्त्रों में त्रिदेवों की उपाधि दी गई है, वे ग्रंथों के पन्ने के काल्पनिक पात्र नहीं; अपितु चैतन्य में वर्तमान समय में मनुष्य रूप में मौजूद हैं, जिसके लिए मुरली में कहा है

 (21.) “ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी अपना शरीर है।” (मु.ता.14.4.71 पृ.1 मध्य) सिर्फ निराकार सदाशिव ज्योति को छोड़कर सभी आत्माओं को 84 के जन्म-मरण के चक्र में आना पड़ता है। साकार मु.ता. 02.01.1963 में कहा है कि 

(22.) “तुम सब जन्म-मरण में आते हो।” (23.) “आत्मा को सुप्रीम तब कहा जाए जब जन्म-मरण रहित हो।” (मु.ता. 26.07.75 पृ.1 मध्य) (24.) “मैं तो गर्भ में प्रवेश नहीं करता।” (मु.ता. 6.9.70 पृ.2 अंत) 

इसलिए एक सदाशिव की आत्मा को ही सुप्रीम सोल कहा जाता है। यह सृष्टि गुण-दोषमयी है, त्रिगुणरहित एक (परमपिता सदाशिव ज्योति) के अलावा कोई आत्मा नहीं है। प्रकृति निर्मित तीन गुण (सत-रज-तम) से सभी आत्माएँ बँधी हुई हैं। सत्वगुण धारण करने वाले देव-आत्माएँ और तामसगुण धारण करने वाले असुर या राक्षस हैं। सभी पुनर्जन्म में आते हैं। जैसे प्रकृति, जिसको दूसरे धर्म के लोग नेचर या कुदरत कहते हैं, वो इस पंच भूत के शरीर को जल, वायु, अन्न इत्यादि समान रूप से, बिना किसी धर्म के भेदभाव किए देती है, ऐसे ही प्रकृतिकृत बने जन्म-मरण के चक्र में भी सभी आत्माओं को आना ही पड़ता है। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आना निश्चित है, ऐसे ही जन्म लेने वालों की मृत्यु निश्चित है और मरने वालों का जन्म सुनिश्चित है। सर्वशास्त्रमई शिरोमणि श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा है :- 

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः ध्रुवं जन्म मृतस्य च। (2/27 गीता)

क्योंकि जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और {देह द्वारा} मरने वाले का जन्म निश्चित है; {दैहिक स्मृति है तो जन्म-मृत्यु भी रहेगी। 

श्रीभगवानुवाच –

 बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तानि अहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ।। (4/5 गीता) 

अर्जुन! {दिव्यजन्मा प्रवेश योग्य शिवज्योतिरूप} मेरे और तेरे {5000 वर्षीय } असंख्य {कल्पों में असंख्य} जन्म बीते हैं। {कलियुगांत में} {यदा-2 हि धर्मस्य (4/7), “कल्प-2 लगि प्रभु* अवतारा”} उन सब {कल्पों में हुए जन्मों) को {हूबहू पुनरावृत्ति से मैं {त्रिकालज्ञ शिव अजन्मा होने कारण} जानता हूँ, {हे कामादिक} शत्रुओं के तापक कामारि महान देवात्मा}! {अभी अंतिम तामसी जन्म में तू नहीं जानता। {जन्मांतरण में आने से सुख भोग में पूर्वजन्म की बातों को भूल जाता है।} * {हर 5000 वर्ष की चतुर्युगी में ड्रामा हूबहू रिपीट होता है; क्योंकि हरेक स्टार-जैसी आत्मा रूपी रिकॉर्ड में अपना-2 अनादि निश्चित पार्ट भरा हुआ है जो कल्प-2 की चतुर्युगी में बारंबार हूबहू रिपीट होता है।} 

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