आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में, क्या आप भी कभी-कभी जानकारी के बोझ, कभी न खत्म होने वाले कामों और हमेशा कुछ और बेहतर करने के दबाव से अभिभूत महसूस करते हैं? इस अंतहीन दौड़ को, जिसे बीके वेदांती दीदी ‘विस्तार’ कहती हैं, हम सबने महसूस किया है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ हमारा मन हज़ारों दिशाओं में बिखर जाता है और हम अपनी असली शक्ति से दूर हो जाते हैं।
लेकिन क्या हो अगर एक शांत और शक्तिशाली जीवन का रहस्य कुछ नया जोड़ने में नहीं, बल्कि एक अकेली, ज़रूरी सच्चाई की ओर लौटने में छिपा हो? क्या हो अगर जवाब ‘विस्तार’ में नहीं, बल्कि ‘सार’ में हो? इस लेख में, हम एक आध्यात्मिक चर्चा से निकले कुछ गहरे लेकिन सरल सिद्धांतों को जानेंगे जो हमें इस बिखराव से बाहर निकालकर हमारी असली शक्ति से जुड़ने में मदद कर सकते हैं।
बीके वेदांती दीदी ने अपने अनुभव से यह महसूस किया कि जब हम ज्ञान, सेवा या धारणाओं के ‘विस्तार’ में बहुत ज़्यादा खो जाते हैं, तो हमारा मन भटकने लगता है। उन्होंने पाया कि बहुत सारी चीज़ों में उलझ जाने से हमारी एकाग्रता की शक्ति यानी concentration का संस्कार धीरे-धीरे बिखरने लगता है।
इसका समाधान उन्होंने एक सरल लेकिन शक्तिशाली अभ्यास में पाया: पूरे साल के लिए केवल एक संकल्प या एक विचार चुनना। यह अभ्यास विशेष रूप से एकाग्रता के संस्कार को फिर से बनाने और मजबूत करने में मदद करता है। जब हम एक ही विचार पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम उसकी गहराई में उतर पाते हैं और उसकी पूरी शक्ति का अनुभव कर पाते हैं।
“जितना हम विस्तार में जाते भले ज्ञान का विस्तार हो योग का विस्तार हो सेवा का विस्तार हो धारणाओं का विस्तार हो जितने विस्तार में चले जाते तो फिर वो कंसंट्रेशन का जो संस्कार है ना वह थोड़ा विस्तार में चला जाता… सार पकड़ो उसमें बहुत पावर है।”
इस साल के लिए स्पीकर का मुख्य अभ्यास था – “ओरिजिन” यानी अपनी उत्पत्ति या मूल में रहना। यह अभ्यास सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू में अपनी जड़ों से जुड़ने की एक गहरी और आनंददायक यात्रा थी।
अक्सर हम सोचते हैं कि सेवा का मतलब बहुत सारी योजनाएँ बनाना, बोलना या भाग-दौड़ करना है। लेकिन यह सिद्धांत इस धारणा को चुनौती देता है। सच्ची सेवा हमेशा कुछ ‘करने’ के बारे में नहीं होती; यह एक विशेष स्थिति में ‘होने’ के बारे में है।
स्पीकर ने अपनी उड़ान का एक अनुभव साझा किया, जहाँ बिना ज़्यादा कुछ कहे या किए, केवल उनकी मुस्कान और शांत उपस्थिति ने फ़्लाइट क्रू पर एक गहरा सकारात्मक प्रभाव डाला। इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ कहना ही नहीं है। उन्होंने बताया कि जब क्रू के सदस्य खाली होते, तो वे उनके पास जाकर कुछ ज्ञान की बातें सुनातीं और आशीर्वाद देतीं (“जब वो फ्री होते ना तो उनके कॉर्नर में जाके थोड़ा कुछ सुना देती ब्लेसिंग दे देती”)। जब आप अपनी मूल शांति, प्रेम और खुशी की स्थिति में स्थित होते हैं, तो आपकी मौजूदगी ही सबसे बड़ी सेवा बन जाती है, और आपके शब्द उस स्थिति का सहज विस्तार होते हैं।
स्पीकर ने एक बहुत ही सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण अंतर समझाया। एक होता है दुनियावी बातों में ‘खोया हुआ’ रहना। जब हम इस तरह खोए रहते हैं, तो हम भुलक्कड़ और लापरवाह हो जाते हैं। स्पीकर ने मज़ाक में कहा कि ऐसे लोग अपनी चीज़ें यहाँ-वहाँ छोड़ते रहते हैं और फिर उन्हें “लॉस्ट एंड फाउंड प्रॉपर्टी” काउंटर के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इसके विपरीत, दूसरा है परमात्मा (बाबा) की याद में ‘खोया हुआ’ या मगन रहना। जब कोई व्यक्ति इस स्थिति में होता है, तो वह लापरवाह नहीं होता। स्पीकर के अनुसार, यह स्थिति मन को और अधिक सटीक, कुशल और एकाग्र बनाती है। इस अवस्था में गलतियों की कोई गुंजाइश नहीं रहती। जैसा कि उन्होंने कहा, “बाबा की याद में खोया हुआ कभी कोई मिस्टेक नहीं कर सकता है… एक्यूरेट रहता है हर बात।”
यह सबक एक छोटी लेकिन शक्तिशाली कहानी के माध्यम से समझाया गया है। एक बहन को “तनाव मुक्त जीवन” (स्ट्रेस फ्री लिविंग) पर लेक्चर देना था, लेकिन कार्यक्रम से कुछ मिनट पहले वह खुद तनाव में थी क्योंकि प्रोजेक्टर काम नहीं कर रहा था।
स्पीकर ने उसे अद्भुत सलाह दी: “अरे प्रोजेक्टर ना हो तो क्या हो गया तुम प्रोजेक्टर बन जाओ… तुम स्थिति बनाओ।” उन्होंने बात को और आगे बढ़ाते हुए कहा, “अरे ऑडियंस ना हुआ तो क्या हुआ तू दीवार से लेक्चर कर।” यह सलाह अपनी आंतरिक स्थिति को हर बाहरी परिस्थिति से ऊपर रखने का चरम उपदेश है। उन्होंने उस बहन को पहले ध्यान कक्ष में जाने के लिए कहा। जब तक वह 15 मिनट बाद बाहर आई, तब तक दर्शक आ चुके थे और समस्या भी हल हो गई थी।
इस कहानी का सार स्पष्ट है: हमारी आंतरिक स्थिति किसी भी बाहरी उपकरण या परिस्थिति से ज़्यादा शक्तिशाली है। अगर हम अंदर से शांत और स्थिर हैं, तो बाहरी परिस्थितियाँ अपने आप हमारे अनुकूल हो जाती हैं।
इस पूरी चर्चा का केंद्रीय संदेश सादगी, सार और अपनी जड़ों की ओर लौटने में छिपी अपार शक्ति है। विस्तार की दुनिया में भटकने के बजाय, जब हम एक विचार, एक संकल्प पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम अपने जीवन में गहरी शांति और स्पष्टता ला सकते हैं।
यह अभ्यास केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक उपकरण है जो हमें रोज़मर्रा की भाग-दौड़ में दिशा दे सकता है। जैसे नया साल करीब आ रहा है, क्या आपने सोचा है कि आपका वो ‘एक संकल्प’ क्या होगा जो आपके जीवन को सार और दिशा दे सके?
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