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1. प्रस्तावना: एक गहरी जिज्ञासा मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह
हम सब हर वर्ष गीता जयंती का उत्सव मनाते हैं, पर क्या हमने कभी यह सोचा है कि ‘जयंती’ तो किसी चैतन्य प्राणी की होती है, उसके जन्म का उत्सव होता है। तो क्या गीता केवल कागज़ और स्याही से बनी एक जड़ किताब है, या फिर इसके पीछे कोई गहरा, जीवंत रहस्य छिपा है? गीता केवल कुछ श्लोकों का संग्रह नहीं, बल्कि एक ऐसा ज्ञान है जो सीधे परमात्मा से जुड़ा है। आइए, आज हम गीता से जुड़े उन पाँच अनसुने और चौंकाने वाले रहस्यों को जानते हैं जो ज्ञान के उन दरवाजों को खोलते हैं जिन्हें हमने कभी खटखटाया ही नहीं।
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हम गीता को अक्सर एक पवित्र पुस्तक मानते हैं, लेकिन यह रहस्य इससे कहीं गहरा है। गीता केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक चैतन्य सत्ता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि हम इसकी ‘जयंती’ मनाते हैं, और जन्म तो किसी जीवित सत्ता का ही होता है, जड़ वस्तु का नहीं।
यह रहस्य तब और गहरा हो जाता है जब हम ‘शास्त्र’ शब्द के अर्थ को समझते हैं। शास्त्र का अर्थ है ‘शासन करने का विधान’, और ऐसा विधान कोई जड़ किताब नहीं, बल्कि कोई चैतन्य सत्ता ही बना सकती है। इसीलिए गीता को सभी धर्म ग्रंथों की ‘माई-बाप’ कहा गया है, यानी सभी शास्त्रों की जन्मदाता। इसी कारण हम इसे ‘गीता माता’ कहकर पुकारते हैं।
गीता केवल एक ग्रंथ नहीं अपितु एक जीता जागता व्यक्तित्व… गीता माई बाप है।
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आमतौर पर यह माना जाता है कि श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने दिया था। लेकिन गीता के श्लोकों में झाँकने पर एक अद्भुत सत्य सामने आता है। गीता का वक्ता स्वयं को ‘अजन्मा’ (जिसका जन्म न हुआ हो), ‘अकर्ता’ (जो कर्मों के बंधन से परे हो), और ‘निराकार’ (जिसका कोई भौतिक स्वरूप न हो) बताता है।
यदि हम विचार करें, तो श्रीकृष्ण ने तो माता-पिता से जन्म लिया था, उनका एक साकार रूप था और उनकी 16,108 रानियाँ थीं, जो उनके सांसारिक संबंधों को दर्शाती हैं। इसके विपरीत, ‘अजन्मा’, ‘अकर्ता’ और ‘निराकार’ जैसे गुण परमपिता शिव के हैं। शिव का अकर्ता-भाव इतना शक्तिशाली है कि उन्हें युगों-युगों तक कितनी ही गालियाँ क्यों न दी जाएँ, वे निर्लिप्त रहते हैं और अपने बच्चों को भी यही सिखाते हैं: “कुत्ते कुत्तों को भौंकने दो, तुम कुछ भी ना करो।” ऐसा वैराग्य और सहनशीलता केवल शिव में ही संभव है। इससे यह सिद्ध होता है कि गीता का मूल ज्ञान निराकार शिव का है, जो किसी साधारण मनुष्य के तन में प्रवेश करके इस ज्ञान को सुनाते हैं।
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हमें सिखाया गया है कि वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं, किंतु सबसे बड़ा रहस्य तो यह है कि गीता का ज्ञान वेदों से भी पहले का है। गीता को “सर्व शास्त्र शिरोमणि” यानी सभी शास्त्रों के सिर का ताज कहा गया है। यदि यह सभी शास्त्रों में श्रेष्ठ है, तो इसकी रचना भी सबसे पहले होनी चाहिए।
परंपरागत रूप से हमें बताया जाता है कि पहले वेद आए, फिर वेदों की व्याख्या से आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथ निकले, उनकी व्याख्या से उपनिषद और फिर पुराणों का जन्म हुआ। लेकिन यह पूरी श्रृंखला उस एक मूल से निकली है जिसे गीता कहा जाता है। ‘वेद’ का अर्थ है ‘जानकारी’, लेकिन ‘गीता’ एक शास्त्र है, जिसका अर्थ है ‘शासन करने का विधान’। पहले शासन करने का विधान आता है, उसके बाद उस पर आधारित जानकारी का विस्तार होता है। इसलिए, गीता ही वह मूल माई-बाप है जिससे बाद में वेद और अन्य सभी शास्त्र जन्मे।
वेदों और शास्त्रों से पहले गीता की रचना होना चाहिए थी। गीता को माई बाप कहा जाता है… वेद कोई शास्त्र नहीं है… गीता शासन करने का विधान है।
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गीता का पहला ही श्लोक “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे” से शुरू होता है, जिसे हम द्वापर युग का एक ऐतिहासिक युद्ध मैदान समझते हैं। लेकिन इसका गहरा आध्यात्मिक रहस्य आज के समय से जुड़ा है। यह ‘धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र’ कोई बीता हुआ मैदान नहीं, बल्कि कलियुग के अंत का यह वर्तमान विश्व है, जहाँ दुनिया के सभी धर्म आपस में टकरा रहे हैं।
यह युद्ध केवल विचारों का नहीं, बल्कि कर्मकांडों का भी है। कोई शरीर छोड़ता है तो ईसाई और मुस्लिम उसे दफ़नाते हैं, हिंदू उसे जलाते हैं, और पारसी उसे पक्षियों के लिए छोड़ देते हैं। हर धर्म अपनी रीति को श्रेष्ठ मानता है, जिससे समाज में एक अदृश्य, मौन युद्ध निरंतर चल रहा है। यह टकराव केवल बाहरी नहीं, बल्कि हर मनुष्य के मन के भीतर भी है। इसलिए, गीता का ज्ञान किसी अतीत की कहानी नहीं, बल्कि आज के इस वैश्विक महायुद्ध में रास्ता दिखाने वाला प्रकाश है।
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हम जो गीता जयंती एक निश्चित तारीख को मनाते हैं, वह केवल एक प्रतीक है। असली ‘गीता जयंती’ एक भविष्य की घटना है, जिसका संबंध ‘महाशिवरात्रि’ से है। यहाँ महाशिवरात्रि का अर्थ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि वह समय है जब यह पूरी दुनिया घोर अज्ञान और आध्यात्मिक अंधकार की रात्रि में डूब जाएगी।
जब पाप और अज्ञान अपनी चरम सीमा पर होंगे, तब परमपिता शिव स्वयं अवतरित होकर उस सच्चे, आदि ज्ञान को प्रत्यक्ष करेंगे, जिसे ‘गीता’ कहा जाता है। उस दिन उस ज्ञान के प्रकाश से समस्त अंधकार मिट जाएगा और पूरी दुनिया में एक स्वर में गीता माता की ‘जय-जयकार’ होगी। वही दिन गीता के सच्चे ज्ञान के प्रकट होने का, यानी उसकी असली ‘जयंती’ का दिन होगा।
जब महाशिवरात्रि होगी इस दुनिया में घोर अज्ञान की… उस समय किसकी जयंती? शिव जयंती सो गीता जयंती।
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गीता केवल एक ऐतिहासिक संवाद या दार्शिनिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह स्वयं परमात्मा द्वारा प्रकट किया गया एक जीवंत और शाश्वत ज्ञान है। यह हमें सिखाती है कि धर्म, युद्ध और ज्ञान की हमारी समझ कितनी सीमित है। यह एक ऐसा रहस्य है जो समय के साथ खुलता है।
इन रहस्यों को जानने के बाद, क्या आप गीता को उसी पुरानी दृष्टि से देख पाएंगे?
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{आध्यात्मिक ज्ञान }
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