जब भी हमारे किसी प्रियजन की मृत्यु होती है, तो सांत्वना के लिए अक्सर एक बात कही जाती है – “भगवान ने दिया था, उसी ने ही ले लिया।” यह एक गहरी और सदियों पुरानी मान्यता है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही ईश्वर के हाथ में हैं। लेकिन क्या यह सच है? क्या दुर्घटना, बीमारी या किसी अन्य कारण से होने वाली हर भौतिक मृत्यु के लिए वास्तव में भगवान ज़िम्मेदार हैं? आज दुनिया में फैले मौत के बाजार और असमय होती मृत्यु को देखकर यह सवाल और भी गहरा हो जाता है। यह लेख इसी गहरे सवाल की पड़ताल करता है और एक अलग दृष्टिकोण सामने रखता है।
भगवान जीवन देते हैं और वही छीन लेते हैं: क्या यह सच है?
जब कोई अपना हमें छोड़कर चला जाता है, तो गहरे मोह और आसक्ति के कारण हम अक्सर यह मान लेते हैं कि भगवान ने हमारे प्रिय को हमसे “छीन लिया”। यह भावना हमारे दुःख से निकलती है, लेकिन यह ईश्वर के स्वभाव के ठीक विपरीत है। आध्यात्मिक ग्रंथ इस धारणा को चुनौती देते हैं। जैसा कि भगवद गीता हमें याद दिलाती है:
भगवद गीता के अनुसार, जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु तो मनुष्य जीवन के दुःख हैं जिनसे भगवान हमें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं, न कि वे दुःख हमें देते हैं।
अगर भगवान इन मौतों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं, तो फिर कौन है? अगर हम गहराई से देखें, तो आध्यात्मिक ज्ञान हमें इन त्रासदियों के स्रोत की ओर इशारा करता है – और वह स्रोत हम स्वयं हैं।
हर दुखद घटना के लिए भगवान को ज़िम्मेदार ठहराना असल में “भगवान को दोष देना” है। जब हम यह समझते हैं कि दुर्घटना, बीमारी और तनाव जैसी चीज़ें हमारे अपने कर्मों का परिणाम हैं, तो हम दोष देने की बजाय ज़िम्मेदारी लेना सीखते हैं। यह समझ हमें अपने कार्यों और उनके परिणामों के प्रति अधिक सचेत बनाती है। यह समझ हमें पीड़ित की भूमिका से निकालकर अपने जीवन और समाज के एक ज़िम्मेदार निर्माता की भूमिका में स्थापित करती है।
इस पूरी चर्चा से एक बात साफ़ होती है: हमने अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ ईश्वर के कन्धों पर डाल दिया है। दुर्घटना से लेकर बीमारी तक, कई घटनाओं की जड़ें हमारे अपने कर्मों में हैं, न कि किसी दिव्य विधान में। चाहे वह हमारी अपनी गलती हो, प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ हो, या हमारे कर्मों का बोझ हो, ज़िम्मेदारी अंततः हमारी ही है।
तो अगर भगवान इन मौतों के लिए ज़िम्मेवार नहीं हैं, तो विनाश या संहार का उनका असली कर्तव्य क्या है?
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