आध्यात्मिक ज्ञान

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क्या आप भी देहधारियों के मोह में हैं? संगम युग में 'रोना-प्रूफ' बनने के 5 अनमोल रहस्य

1. प्रस्तावना: एक गहरी जिज्ञासा

मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अनित्य वस्तुओं में नित्यता खोजते हैं। जब हमारा कोई प्रिय इस नश्वर संसार को छोड़कर जाता है, तो हमारी आँखों से बहने वाले आंसू केवल वियोग का प्रमाण नहीं, बल्कि हमारी आंतरिक रिक्तता और देह-अभिमान की गहरी पैठ का संकेत हैं। क्या आपने कभी विचार किया है कि आध्यात्मिक पथ पर चलने के बाद भी मन विचलित क्यों होता है? सत्य यह है कि वास्तविक हर्ष और स्थिरता बाहरी परिस्थितियों के अधीन नहीं, बल्कि हमारी ‘याद’ की दिशा पर निर्भर करती है। यह लेख आपको उस चेतना की ओर ले जाएगा जहाँ दुःख का कोई स्थान नहीं है।

2. मोह का त्याग: मम्मा कहाँ गईं?

जब यज्ञ की आधारस्तंभ ‘मम्मा’ (जगदम्बा) ने अपना पार्थिव शरीर छोड़ा, तो कई बच्चों की आँखों में आंसू आ गए। शिव बाबा ने इस पर एक गहरा सत्य उद्घाटित किया। मम्मा का शरीर तो अब ‘पांच तत्वों में विलीन’ हो चुका है—अर्थात जिसका अस्तित्व ही समाप्त हो गया, उसके लिए विलाप करना देह-अभिमान की पराकाष्ठा है। मम्मा तो केवल अपनी सेवा का स्थान बदलकर ‘सर्विस’ पर गई हैं।

एक दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो हमें केवल उस ‘अकाल’ सत्ता को याद करना है जिसका अस्तित्व सदा कायम रहता है। यदि हमारी बुद्धि किसी देहधारी में ‘लटक’ जाती है, तो पीड़ा अनिवार्य है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि पहले हमें मुक्तिधाम (आत्माओं के बाप के पास) जाना है और फिर जीवनमुक्ति धाम में उस शिव बाबा के पास आना है जो इस सृष्टि पर सदा कायम है।

“तुम रोती तब हो जब शिव बाबा को याद नहीं करती हो… देहधारियों में बुद्धि लटक गई है इसलिए तुम रोती हो।”

3. संगम युग का अभ्यास: ‘रोना-प्रूफ’ (Rona-Proof) बनें

संगम युग ‘मौज का युग’ है, यह शोक मनाने का समय नहीं है। वर्तमान समय पूरे 5000 वर्ष के नाटक की ‘शूटिंग’ या रिहर्सल का समय है। यदि इस अल्पकाल के संगम युग में हम उदास होते हैं या रोते हैं, तो हम अपने भीतर दुःख के ऐसे संस्कार (प्रोग्रामिंग) भर रहे हैं जो पूरे कल्प में हमारे पार्ट को प्रभावित करेंगे।

  • अविनाशी प्रैक्टिस: यहाँ की गई दृढ़ता अविनाशी बन जाती है। ‘रोना-प्रूफ’ बनने का अर्थ है—इंद्रियजीत बनना। चाहे कोई शरीर छोड़े, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल हों, आँखों से आंसू बाहर नहीं आने चाहिए। स्वर्ग की प्राप्ति के लिए अभ्यास अभी संगम युग में ही करना है। यदि यहाँ ‘अटल निश्चय’ है, तभी भविष्य में अखंड सुख सुनिश्चित है।

4. सागर और नदियाँ: आध्यात्मिक रिफ्रेशमेंट का रहस्य

आध्यात्मिक यात्रा में स्वयं को ऊर्जित रखने के लिए ‘ज्ञान के सागर’ और ‘ज्ञान की नदियों’ के अंतर को समझना अनिवार्य है।

  • ज्ञान के सागर (मधुबन/बाबा): सागर वह है जहाँ निरंतर मंथन से ‘नित नए’ ज्ञान रत्न निकलते हैं। सेवा के मैदान में (नदियों के पास) रहते हुए जब आत्मा प्रश्न-उत्तर या परिस्थितियों के कारण ‘खाली’ हो जाती है, तो उसे ‘बादल’ बनकर पुनः सागर के पास रिफ्रेश होने के लिए आना पड़ता है।
  • ज्ञान की नदियाँ (सेंटर्स/पाठशाला): ये सेवा का माध्यम हैं, जहाँ अक्सर पुरानी बातों का ही दोहराव (पानी बिलोना) होता है। जिस प्रकार बादल बरसने के बाद खाली हो जाते हैं, वैसे ही सेवा के बाद अपनी ऊर्जा को पुनः संचित करने के लिए सीधे सागर से जुड़ना एक आध्यात्मिक आवश्यकता है।

5. याद की पावर: 5000 वर्ष का फिक्स डिपॉजिट

परमात्मा की याद कोई तात्कालिक राहत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक ‘फिक्स डिपॉजिट’ है। संगम युग में हम जितनी गहनता से ‘मनमनाभव’ (बाबा के संकल्पों में अपने संकल्प विलीन करना) का अभ्यास करते हैं, उतनी ही शक्ति हमारी आत्मा में 5000 वर्ष के लिए भर जाती है।

जिनकी ‘याद की पावर’ यहाँ शक्तिशाली और अखंड होगी, वे आत्माएं जन्म-जन्मांतर सुखी रहेंगी। कलयुग के घोर अंधकार और आपदाओं के समय भी संगम युग में जमा की गई यह शक्ति काम आती रहेगी, जिससे वे आत्माएं कभी उदास नहीं होंगी।

“जितना जास्ती याद करेंगे उतना आत्मा में पावर 5000 वर्ष के लिए भर जाएगी।”

6. असली श्रृंगार और आंतरिक स्थिरता

आत्मा का वास्तविक श्रृंगार गहने नहीं, बल्कि ‘ज्ञान और गुणों के रत्न’ हैं। दिलवाड़ा मंदिर का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ महारथियों को हाथियों पर और शक्तियों को सिंह पर सवार दिखाया गया है। यह हमारी आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। यदि हम याद छोड़ देते हैं, तो ‘माया रूपी मगरमच्छ’ (माया-ग्राह) हमें निगल जाता है।

अज्ञान के झटकों का समाधान: यदि जीवन में कोई समस्या आए या अज्ञान के झटके लगें, तो सुबह उठकर अपने लक्ष्य—लक्ष्मी-नारायण के चित्र या त्रिमूर्ति को निहारें। यह चित्र स्पष्ट करता है कि शिव बाबा (दाता), ब्रह्मा के माध्यम से हमें विष्णु पद (स्वर्ग की विरासत) दे रहे हैं।

  • अटल स्थिति का उदाहरण: एक सच्चे पुरुषार्थी की स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि यदि उसका धन, मकान, दुकान या कारखाना सरकार द्वारा लूट लिया जाए या आग में जल जाए, तो भी उसकी ‘खुशी का पारा’ नीचे नहीं गिरना चाहिए। क्योंकि उसे ज्ञान है कि यह सब विनाश होने वाला है और उसका अविनाशी खजाना सुरक्षित है।

7. निष्कर्ष: एक भविष्योन्मुखी विचार

विनाश के द्वार पर खड़ी इस दुनिया में केवल वही सुरक्षित है जिसकी बुद्धि में ‘अविनाशी ज्ञान’ की पढ़ाई रची-बसी है। ‘मनमनाभव’ होकर रहना ही एकमात्र सुरक्षा कवच है। जब पुरानी दुनिया का विनाश सामने हो, तब रोने के बजाय ‘हर्षित’ रहना ही आपकी सफलता का प्रमाण है। यह याद रहे कि हम पुराने नाटक को पूरा कर अब अपने घर (मुक्तिधाम) जा रहे हैं।

अंतिम प्रश्न: जब पूरी दुनिया विनाश और हाहाकार की ओर बढ़ रही हो, क्या आपकी बुद्धि में वह ‘अविनाशी खजाना’ इतना पुख्ता है कि भौतिक संपदा के राख होने पर भी आप ‘हर्षित’ रह सकें?

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