आध्यात्मिक ज्ञान

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आध्यात्मिक विश्वविद्यालय- एक ईश्वरीय परिवार है, जिसका लक्ष्य है- परमपिता परमात्मा शिव द्वारा दिए जा रहे ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग के द्वारा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओतप्रोत एक नए विश्व की स्थापना करना । लगभग 10 व्यक्तियों के साथ प्रारंभ हुए इस परिवार में आज दुनियाभर के 25 हजार से अधिक सदस्य हैं । ‘आध्यात्मिक’ शब्द दो शब्दों से बना हुआ है अधि और आत्मिक अधि माना अन्दर और आत्मिक माना रूह , आत्मा या चेतना शक्ति जिसकी असलियत स्वयं त्रिकालदर्शी परमपिता शिव ही माउण्ट आबू से ब्रह्मा मुख द्वारा बता रहे हैं । विश्वविद्यालय माना यह एक ऐसा विद्यालय है जो कि विश्व की सभी मनुष्यात्माओं के लिए खुला है । इसलिए इसका नाम ‘ आध्यात्मिक विश्वविद्यालय है । इस विश्वविद्यालय के सदस्य आत्मिक स्मृति के आधार पर जात – पात , लिंग , पद , भाषा और धर्मों की सीमाओं को लाँघते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् की स्थापना में प्रैक्टिकली सहयोगी बनते हैं । यह एक ही ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ व्यक्ति अपने सच्चे स्वरूप को पहचान सकता है और जिसके माध्यम से वह स्वयं को सशक्त व निर्विकारी बना सकता है । यहाँ जिज्ञासुओं को ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग का साप्ताहिक कोर्स निःशुल्क प्रदान किया जाता है तथा जिज्ञासुओं से ज्ञान योग भट्ठी के दौरान निवास व खान – पान का भी कोई मूल्य नहीं लिया जाता है । इस ईश्वरीय परिवार के सदस्य रुहानी सोशल वर्कर्स हैं । वे रुहानी सेवा यानी रूह की सेवा करते हैं , जो कि मानवीय शरीर को चलाने वाली अति सूक्ष्म ज्योतिबिंदु रूप अदृश्य शक्ति है । विश्वभर में किए जाने वाले अनेक प्रयासों के बावजूद भी व्यक्तिगत और दुनियावी स्तर पर पाप , अत्याचार , व्यभिचार , दुःख और अशांति बढ़ ही रही है , क्योंकि मनुष्य आध्यात्मिकता को पूर्णतः भूल चुके हैं ।
आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के सेवाकेंद्र भारत के प्रत्येक कोने में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मिनी मधुबनों , गीता पाठशालाओं , शक्ति – भवनों और पांडव – भवनों के रूप में फैले हुए हैं । परमपिता शिव ने दादा लेखराज द्वारा सुनाई गई ज्ञान – मुरलियों में इन उक्त सेवाकेन्द्रों को आध्यात्मिक केन्द्र , गीता – पाठशाला , रुहानी हॉस्पिटल कम यूनिवर्सिटी अथवा रुहानी विश्वविद्यालय की संज्ञा दी है । आध्यात्मिक विश्वविद्यालय एक संस्था नहीं अपितु प्राचीन भारत की गुरुकुल व्यवस्था पर आधारित एक ईश्वरीय परिवार है । जिस प्रकार प्राचीन भारत में समाज के विभिन्न वर्गों के बच्चे गुरुकुल में किसी गुरु तथा उनकी धर्मपत्नी की पालना में अपना संपूर्ण बाल्यकाल विभिन्न प्रकार की विद्याएँ प्राप्त करने में बिता देते थे और इस अवधि में अपने गुरुजी और उनकी धर्मपत्नी को भी माता – पिता का सम्मान देते थे । गुरुज उनकी धर्मपत्नी भी अपने शिष्यों को अपनी संतान के समान ही पालना देते थे । गुरुकुल में चाहे कोई शिष्य राजकुमार हो या गरीब ब्राह्मण की संतान , दोनों को ही सादगी भरा जीवन व्यतीत करना पड़ता था । इस प्रकार आ.वि.वि. का हर सदस्य अलग -2 व्यक्तित्व होते हुए भी एक परिवार का ही सदस्य है ।                  त्वमेव माता च पिता त्वमेव यह जो भगवान का गायन है इसे वर्तमान समय यहाँ प्रैक्टिकल में अपनाया जाता है ; क्योंकि इसी परिवार से स्वयं ईश्वर समग्र संसार के सामने शीघ्र ही ‘ जगतं पितरं वन्दे पार्वती परमेश्वरौ अर्थात् जगतपिता जगतमाता आदिदेव आदिदेवी , एडम ईव , आदम हव्वा आदिनाथ आदिनायिनी के नाम रूप से प्रत्यक्ष होने वाला है । 
आध्यात्मिक विश्वविद्यालय एक गैर सरकारी धार्मिक , स्वायत्त , शैक्षणिक , आध्यात्मिक , ईश्वरीय परिवार है । इस परिवार के लगभग 60 से 70 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ ( कन्याएँ और माताएँ ) हैं । सभी मनुष्य गुरुओं ने कन्याओं माताओं को ठुकराया , उनको नीचे गिराने के निमित्त बने ; परंतु जब भगवान प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा इस सृष्टि पर अवतरित होते हैं तो वे कन्याओं माताओं को शिवशक्ति के रूप में ऊपर उठाते हैं । सभी के मन में प्रश्न उठता है कि आ.वि.वि. में कन्याओं माताओं की संख्या ज़्यादा क्यों है ? इसके सम्बन्ध में ईश्वरीय संविधान ( अव्यक्त वाणी 11.05.83 , 2.12.85 29.11.78 ) के प्रमाणित महावाक्य इस प्रकार हैं…. • माताओं को किसी ने भी नामी – ग्रामी नहीं बनाया और बाप ने पहले माता का सिलसिला स्थापन किया । लोग कहते हैं- 2/4 माताएँ भी एक साथ इकट्ठी नहीं रह सकती और अभी माताएँ सारे विश्व में एकता स्थापन करने के निमित्त हैं ।…. माताओं को सेवा के मैदान पर आना चाहिए । एक – एक माता एक – एक सेवाकेन्द्र सम्भाले । ( अव्यक्त वाणी 11.5.83 पृ .201 आदि )  • कुमारियों का संगमयुग पर विशेष पार्ट है , विशेषता है ( विश्व ) सेवाधारी बनना अगर अभी यह चांस नहीं लिया तो सारे कल्प में नहीं मिलेगा ( अव्यक्त वाणी 2.12.85 पृ . 74 अंत )  • कुमारियों पर बहुत बड़ी जिम्मेवारी है । एक अनेकों के कल्याण प्रति निमित्त बन सकती है । ( अव्यक्त वाणी 29.11.78.86 आदि )  • गायन भी है शिव भगवानुवाच माताएँ स्वर्ग का द्वार खोलती हैं और शंकराचार्य उवाच नारी नर्क का द्वार खोलती है । तुम ब्राह्मणियाँ बन सभी को स्वर्ग का द्वार दिखाती हो , समझाती हो । इसलिए वंदेमातरम् गाया जाता है ।… बाप माताओं की महिमा को बढ़ाते हैं । मुरली तारीख 10.06.69 पृ .2 अंत ) 
आध्यात्मिक विश्वविद्यालय के स्थापना के तार ब्रह्माकुमारी संस्था के साथ जुड़े हुए हैं तथा यह विश्वविद्यालय ब्रहमाकुमारी संस्था के समानांतर / पैरलल कार्य कर रहा है । परमपिता परमात्मा शिव ने इस विश्वविद्यालय के संस्थापक दादा लेखराज ( उर्फ ब्रहमा ) द्वारा 1951 से 1969 तक माउण्ट आबू ( राजस्थान ) से ईश्वरीय ज्ञान सुनाया , जो कि ब्रहमाकुमारी संस्था द्वारा प्रमाणिक रूप से ज्ञान मुरलियों के रूप में प्रकाशित किया जाता रहा है । यही ज्ञान – मुरलियाँ और अव्यक्त ब्रहमा की बी.के. गुलज़ार मोहिनी द्वारा चलाई गई अव्यक्त – वाणियाँ ही हमारा ईश्वरीय संविधान और प्रूफ प्रमाण हैं । यही हमारे प्रत्येक संकल्प , वाणी और कर्म का आधार है । ब्रहमाकुमारी संस्था की अपनी मान्यता है कि 18 जनवरी , 1969 में दादा लेखराज के देहावसान के पश्चात् निराकार परमपिता शिव वापस अपने धाम परमधाम चले गए हैं और हर वर्ष पूर्वनिर्धारित दिनों एवं समय पर बी.के. गुलज़ार में प्रवेश कर माउंट आबू में ज्ञान सुनाते हैं , जो कि ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा अव्यक्त वाणियों के रूप में हर वर्ष प्रकाशित किया जाता है ।         इस परिवार की उत्पत्ति सन् 1936 में ‘ ओम मंडली के नाम से सिन्ध – हैदराबाद में हुई और फिर सन् 1951/52 में इसका नाम ‘ ब्रहमाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय पड़ा । आखरीन सन् 1976/77 में ईश्वरीय संविधान के आधार पर इसका नाम ‘ आध्यात्मिक विश्वविद्यालय पड़ गया । जिसके सम्बन्ध में ब्रह्मा मुख से निकली वेदवाणी / मुरली का ईश्वरीय संविधान इस प्रकार है…   • गॉड फादर को स्प्रिचुअल नॉलेजफुल कहा जाता है । तो तुम ‘ स्प्रिचुअल यूनिवर्सिटी नाम लिखेंगे , इसमें कोई एतराज़ नहीं उठावेंगे । फिर बोर्ड में भी वह ( प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ) अक्षर हटाकर यह स्प्रिचुअल यूनिवर्सिटी लिख देंगे । ट्राई करके देखो लिखो ‘ गॉड फादरली स्प्रिचुअल यूनिवर्सिटी इनकी एम ऑब्जेक्ट यह है । दिन – प्रतिदिन तुम्हारे म्युज़ियम , चित्रों आदि में भी चेन्ज होती जावेगी । फिर सब सेंटर्स पर लिखना पड़ेगा ‘ गॉड फादरली स्प्रिचुअल यूनिवर्सिटी ( मुरली तारीख 20.3.74 पृ .4 अंत )           ब्रह्माकुमारी संस्था में हमें बेसिक ज्ञान यानी आत्मा और परमात्मा के ज्योतिबिंदु रूप का ज्ञान मिला और आ.वि.वि. में हमें बेसिक ज्ञान के साथ 2 आत्मा का ऊँचा ( एडवांस ) ज्ञान अर्थात् आत्माओं के अनेक जन्मों की जानकारी तथा परमपिता परमात्मा शिव के प्रैक्टिकल नाम , रूप , देश , काल और उनके दिव्य कर्तव्यों का भी ज्ञान मिलता है । आ.वि.वि. के 80 % जिज्ञासु पहले ब्रहमाकुमारी संस्था के सदस्य थे और उनकी बेसिक पढ़ाई पूरी होने पर आ.वि.वि. से जुड़ गए ।
AIVV की शिक्षाओं के चार मुख्य सब्जेक्ट्स हैं : ज्ञान , योग ( ध्यान ) , धारणा और सेवा ज्ञान -हमारी जानकारी का स्त्रोत ही है ज्ञान – मुरलियाँ , जिनमें निम्नलिखित विषयों का सम्पूर्ण राज़ हुआ है । साप्ताहिक कोर्स के माध्यम से इन विषयों को समझाया जाता है –   – मैं कौन हूँ और कहाँ से आया हूँ ?   – मेरा पिता कौन है , कहाँ का रहने वाला है और कब इस सृष्टि पर अवतरित होता है ?  – परमपिता परमात्मा शिव के तीन मुख्य कर्तव्य क्या हैं और उन तीन कर्तव्यों का वहन वह वर्तमान समय किनके द्वारा व किस प्रकार से कर रहे हैं ?  – इस सृष्टि का वास्तविक इतिहास और भूगोल क्या है ? यह सृष्टि एक रंगमंच है , कैसे ? हम आत्माएँ पार्टधारी हैं , कैसे ? पार्टधारियों के जन्म , सृष्टि के रचयिता और रचना का आदि – मध्य – अंत ( भूत , वर्तमान , भविष्य ) क्या है ?  – हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है ? आने वाली नई दुनिया किस तरह की होगी ? नई दुनिया कब और कैसे आएगी और किसके मार्गदर्शन से आएगी ? हम अपने आप को और इस विश्व को पुराने ( तमो अर्थात् दुःखी ) से नया ( सतो अर्थात् सुखी ) कैसे बनाते हैं ?   – इस मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का रहस्य क्या है और इसका चैतन्य बीज कौन है ? विभिन्न धर्मों की – उत्पत्ति का फाउंडेशन कब और कैसे पड़ा ? – समस्त मनुष्य सृष्टि के पूर्वज कौन हैं ?  – हम आत्माएँ मूल स्वरूप में कैसे पवित्र , दिव्य व सुखदायी थीं , फिर कैसे अपवित्र , अनैतिक , अशांत , दुःखदायी बन गईं , फिर कैसे और कब मूल स्वरूप को फिर से प्राप्त करेंगी ?  योग -योग का अर्थ है ‘ मेल ‘ या ‘ कनेक्शन ‘ । इसका अर्थ ही है आत्मा का परमात्मा से प्यार और सम्बन्ध के तार को जोड़ना । यह मन बुद्धि की आंतरिक यात्रा है , जिसमें पहले हम स्वयं को जानते हैं , उसके बाद परमपिता परमात्मा से जुड़ते हैं और फिर आत्मा रूपी बैटरी को परमात्म पावर हाउस से चार्ज करने के बाद सारे संसार में शक्तिशाली वायब्रेशन फैलाते हैं । योग की मुख्य विधि है अपने मन के सात्विक संकल्पों को एक परमपिता परमात्मा में एकाग्र करना जिससे आत्मा में सहज शांति एवं विल पावर बढ़ती है अर्थात् सुखदायी व्यक्तित्व बनता है । धारणा  -यह प्रयोगात्मक ज्ञान है इसलिए हम इस ज्ञान का न केवल श्रवण और लेन – देन करते हैं , बल्कि इसके मूल्यों को अपने जीवन में धारण कर अपने को गुणवान सुखदायी बनाने का भी लक्ष्य रखते हैं । सेवा – जैसे कि ऊपर भी बताया गया है , आ.वि.वि. के सभी सदस्य रुहानी सोशल वर्कर्स हैं , जो कि आत्माओं को सशक्त व निर्विकारी बनाने के लिए ईश्वरीय ज्ञान का प्रचार प्रसार समस्त विश्व में करते हैं , जिससे उन्हें सुख और शांति से भरे जीवन की राह दिखा सकें । हम लोगों की न केवल व्यक्तिगत सेवा करते हैं , बल्कि शांतियुक्त और पावरफुल वायब्रेशन सारे विश्व में प्रसारित भी करते हैं ।      AIVV के सदस्य स्वयं ही अपने हाथों से विद्यालय के समर्पित सदस्यों के लिए कपड़े सिलाई करते हैं । आ.वि.वि. आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को मान्यता देता है व आ.वि.वि. के सदस्यों की विभिन्न बीमारियों का उपचार घरेलू आयुर्वेदिक दवाइयों द्वारा किया जाता है , जिन दवाइयों को आ.वि.वि. की समर्पित सदस्याएँ वैद्य / डॉक्टर के निर्देशानुसार स्वयं ही तैयार करते हैं । खेतों में केमिकल्स खाद से उत्पन्न होने वाली गंभीर समस्याओं को नष्ट करने के लिए आ.वि.वि. के सदस्य जैविक खेती को प्राथमिकता देते हुए स्वयं ही अपने तन – मन – धन की शक्ति लगाकर जैविक खेती करते हैं और दुग्ध उत्पादन व गोबर की खाद के उत्पादन के लिए आ.वि.वि. के सदस्य स्वयं ही अपने तन – धन की शक्ति लगाते हुए गौशालाओं का निर्माण एवं संचालन भी करते हैं । आ.वि.वि. के सदस्यों ने सहयोग की शक्ति , आत्मनिर्भरता व स्वावलंबन का उदाहरण दुनिया के सामने प्रस्तुत करते हुए आ.वि.वि. के विजयविहार ( दिल्ली ) , कम्पिल ( उ.प्र . ) स्थित सेवाकेन्द्रों का निर्माण कार्य स्वयं ही , किसी बाहरी मज़दूरों का सहयोग लिए बगैर सम्पन्न किया है ।   
1. इस राजयोग की पढ़ाई में जीवनशैली से जुड़े हुए कुछ अनुशासन हैं; – मन , वचन और कर्म में पवित्रता का पालन करना तथा स्वयं को देह समझने के कारण उत्पन्न होने वाले विकारों ; जैसे काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार इत्यादि का परित्याग करने का अभ्यास करना ।  – भगवान की याद तथा आत्मिक स्थिति में पकाए गए सात्विक और शाकाहारी भोजन का सेवन शराब , तम्बाकू , पान , नशीले पदार्थ , जो कि तन और मन में अशुद्धि / अपवित्रता लाते हैं , उनका सेवन वर्जित है । ईश्वरीय संविधान के अनुसार , हम ऐसी किसी भी चीज़ का सेवन नहीं करते जो कि मन्दिरों में देवताओं को भोग के रूप में नहीं चढ़ाई जाती । कहते भी हैं- ‘ जैसा अन्न वैसा मन शुद्ध भोजन का सेवन करने के साथ – ही – साथ हम अपनी संगति का भी विशेष ख्याल रखते हैं ; क्योंकि हम जैसा संग करते हैं वैसा ही हमें रंग लगता है ।  – सादगी भरा ; किन्तु उच्च आदर्शों वाला जीवन व्यतीत करें । खान – पान , रहन – सहन , पहनावा इत्यादि सादा हो तथा व्यवहार श्रेष्ठ हो ।  – पहनावा आज पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर हम भी अपने देवत्व को भूलकर उनका ही अनुसरण कर रहे हैं । अभी हम अपने मूल दैवी स्वरूप को फिर से जानकर अपनी जीवनशैली को उसी के अनुसार ढाल रहे हैं । पिंक साड़ी पहनने से हमारे अंदर एक ही परमधामी परिवार के सदस्य होने की भासना आती है । यूनिफ़ॉर्म के लिए हम सात्विक रंग वाले सफेद कपड़े पहनना पसन्द करते हैं ।  – गृहस्थ में रहते ब्रह्मचर्य का पालन करना अर्थात् कीचड़ में रहते हुए भी उससे उपराम रहने की निशानी कमल पुष्प समान जीवन व्यतीत करना ।  2. दिनचर्या : – प्रातः काल अमृतवेले ( दो से चार बजे के बीच हर एक की क्षमता व इच्छा के अनुरूप ) राजयोग का अभ्यास करना , जिससे स्वयं को तथा अन्य आत्माओं को शान्ति , सुख और शक्तियों की अनुभूति हो तथा उसके पश्चात् संगठन में बैठकर ईश्वरीय ज्ञान का नियमित और नित्य श्रवण और अभ्यास करना । इस नियमित अभ्यास से कोई भी व्यक्ति दिव्य गुणों की धारणा कर सकता है और स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन कर सकता है।  – ईश्वर की याद में भोजन पकाना परोसना , खाना एवं स्वयं समस्त घरेलू कार्य करना ।  – आ.वि.वि. के सदस्यों के बीच जो सदस्य अपने जीवन को इस रुहानी सेवा के लिए समर्पित करना चाहते हैं , वे स्वेच्छा से आ.वि.वि. के सेवाकेन्द्रों पर रह सकते हैं और अपनी योग्यता अनुसार रुहानी में अपना योगदान प्रदान कर सकते हैं ।  -अन्य सदस्य रोज़ाना की आध्यात्मिक क्लास के बाद अपने 2 घरों अथवा कार्यालयों में जाते हैं । इस प्रकार कोई भी व्यक्ति दिव्य – गुणों की धारणा और सेवा कर सकता है और स्व – परिवर्तन द्वारा विश्व परिवर्तन कर सकता है ।
             इस ज्ञान को समझने के लिए इच्छुक व्यक्ति को आ.वि.वि. के किसी भी स्थानीय मिनी मधुबन या गीता पाठशाला में साप्ताहिक कोर्स करना अनिवार्य है । ईश्वरीय ज्ञान के गहन अध्ययन एवं राजयोग के अभ्यास के पश्चात् यदि उसे वर्तमान समय आध्यात्मिक माता – पिता के रूप में चल रहे निराकार परमपिता शिव के साकार पार्ट पर पूरा निश्चय बैठ जाता है तो उसे आ.वि.वि. के फर्रुखाबाद स्थित सेवाकेंद्र में सात दिन की ज्ञान – योग की भट्ठी करना अनिवार्य होता है और उक्त निश्चय का एवं आजीवन पवित्रता पालन करने की प्रतिज्ञा का शपथ पत्र आ.वि.वि. को सुपुर्द करना होता है । सम्बन्धित ईश्वरीय संविधान ( मुरली तारीख 12.03.87 ) का प्रमाणित महावाक्य इस प्रकार है ; मुख्य बात है मात – पिता का परिचय दिया । अब समझा है तो लिखो , नहीं तो गोया कुछ नहीं समझा हड्डी ( दिल से ) समझाकर फिर लिखवाना चाहिए बरोबर यह जगतअम्बा , जगतपिता हैं वह लिख दे बरोबर बाप से वर्सा मिलता है । यह लिखकर दे तब समझें तो तुमने कुछ सर्विस की है । ( मुरली तारीख 12.3.87 पृ .2 मध्यांत       सदस्यता के लिए आ.वि.वि. के द्वारा किसी से भी कोई शुल्क नहीं लिया जाता , न ही कोई सदस्यता की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया अपनाई जाती है । किसी भी जाति , धर्म , पंथ का व्यक्ति आ.वि.वि. का सदस्य बन सकता है ।         साप्ताहिक ज्ञान – योग की भट्टी के बाद भी अगर कोई सदस्य ईश्वरीय संविधान के नीति – नियमों के बरखिलाफ आचरण या बातचीत करता है तो उसकी सक्रिय सदस्यता रद्द कर दी जाती है और अगर कोई समर्पित सदस्या स्वेच्छा से आ.वि.वि. का परित्याग करना चाहती है , तो आ.वि.वि. को त्याग – पत्र देकर अपने घर जा सकती है । उक्त सदस्य आ.वि.वि. को माफीनामा देकर व दुबारा ज्ञान – योग भट्ठी कर से अपनी सदस्यता प्राप्त कर सकते हैं ।
 – खास भारत और आम सारी दुनिया को नर्क ( दुःखी दुनिया ) से स्वर्ग ( सुखी दुनिया ) बनाना , जहाँ राज्यसत्ता ( स्वधर्म रूपी अनुशासन प्रणाली ) और धर्मसत्ता ( स्वधर्म रूपी धारणा प्रणाली ) एक ही हाथों में हों और एक धर्म , एक राज्य , एक भाषा , एक कुल हो ।  – ईश्वरीय ज्ञान , सहज राजयोग , दिव्य गुणों की धारणा और आध्यात्मिक सेवा के द्वारा नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी – जैसे देवी – देवता बनने में प्रत्येक व्यक्ति का मार्गदर्शन करना उपरोक्त ‘ आध्यात्मिक शिक्षाओं के माध्यम से विश्व की प्रत्येक आत्मा के दैवी स्वरूप को निखारकर वसुधैव कुटुम्बकम् की स्थापना करना । ऐसा विश्व जहाँ धर्म , जाति , लिंग , भेदभाव , रूढ़िवादी परंपरागत अन्धश्रद्धा आदि से जनित हिंसा अर्थात् वैमनस्य का नामोनिशान न हो । सर्वधर्मों की आत्माओं को आत्मा परमात्मा और मनुष्य सृष्टि चक्र के आदि , मध्य और अंत का ज्ञान देकर प्रायः लोप हुए आदि सनातन देवी – देवता धर्म की पुनर्स्थापना करना ईश्वरीय ज्ञान एवं राजयोग के द्वारा अनेकता , अधर्म , जातिवाद , वैमनस्य , विकार , दरिद्रता , भ्रष्टाचार इत्यादि को समाप्त करना ।   – स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन ; क्योंकि परिवर्तन की जड़ें हमारे अन्दर ही हैं ।   -धर्म , जाति , देश , भाषा , रंग या आर्थिक स्थिति का भेदभाव किए बिना सभी मनुष्यों को सर्वगुण संपन्न , संपूर्ण आत्माभिमानी , संपूर्ण निर्विकारी , मर्यादा पुरुषोत्तम और ऐसा डबल अहिंसक बनाना जिससे क्रोधजनित हिंसा के साथ 2 काम – विकार रूपी हिंसा भी न हो ।  -श्रीमद्भगवतगीता के अनुसार अपने आत्मिक स्वरूप का रियलाइजेशन कराना और अपने आत्मिक स्वरूप में टिकने का अभ्यास कराना ।  दादा लेखराज ब्रहमा के मुख द्वारा बताए गए शिव परमपिता की ज्ञान मुरलियों और अव्यक्त – वाणियों में अंतर्निहित ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग के रहस्यों को सारी दुनिया में प्रचार और प्रसार करना , जिससे विश्व में परिवर्तन हो तथा सारा विश्व एक आध्यात्मिक परिवार के रूप में एक हो सके । 
आ.वि.वि. के समर्पित सदस्यों , उनके रिश्तेदारों अथवा ईश्वरीय परिवार के भाई – बहनों अर्थात् आ.वि.वि. के अन्य सदस्यों द्वारा स्वेच्छा से व अपनी क्षमता अनुसार किए गए आर्थिक सहयोग से ही आ.वि.वि. का कार्यकलाप चलता है । व्यक्तिगत रूप से इसके सदस्य अपना इनकम टैक्स भरते हैं और नियमित रूप से टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं । गीतापाठी ब्राह्मण होने के नाते ईश्व रीय सेवा के लिए जो भी धनराशि मिलती है , वह कन्याएँ – माताएँ भविष्य ईश्वरीय सेवार्थ उपयोग किए जाने के लिए अपने -2 नामों से बैंकों में निवेश करती हैं । आ.वि.वि. का अपना कोई बैंक अकाउंट नहीं है । आ.वि.वि. के सदस्य आजीविका पूर्ति हेतु अपनी -2 रीति से काम – धंधा करते हुए ईश्वरीय सेवाओं से भी जुड़े हुए हैं । आ.वि.वि. व उसके सदस्य किसी गैर – सदस्य , सरकार या गैर सरकारी निकाय / संगठन से किसी प्रकार का दान , दक्षिणा , उपहार , धन या दिखावटी सम्मान स्वीकार नहीं करते हैं । सम्बन्धित ईश्वरीय संविधान ( मुरली तारीख 14.06.68 22.05.85 ) हम अपने पैसे से अपनी राजधानी स्थापन करते हैं । हमको भीख माँगने का ( हक ) नहीं है । हम राजाई स्थापन करने लिए अपने ( भारतीय ) गवर्मेंट से ही नहीं लेते हैं तो बाहर वालों से कैसे लेंगे ? इतने ढेर बच्चे बैठे हैं । जानते हैं यह सब खलास हो जाना है । इसलिए अपना लगाते रहते हैं । हम अपने पैसे लगा सकते हैं फिर साहूकार से लेवें ही क्यों ? बाबा ( के ) पास जमा करते हैं । बाबा भी मदद करते हैं । इनकम टैक्स आदि की तो ब ही नहीं । ( रात्रि मुरली तारीख 14.6.68 पृ .1 मध्य ) बच्चों से यह प्रश्न भी पूछते हैं कि खर्चा कैसे चलता है परन्तु ऐसा कोई समाचार देते नहीं कि हम यह रेसपांड करते हैं राजाई भी श्रीमत पर हम स्थापन कर रहे हैं अपने लिए राज्य भी हम करेंगे राजयोग हम सीखते हैं तो खर्चा भी हम करेंगे । शिवबाबा तो अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देते हैं । जिससे हम राजाओं के राजा बनते हैं । बच्चे जो पढ़ेंगे वही खर्चा करेंगे ना समझाना चाहिए हम अपना खर्चा करते हैं । हम कोई भीख वा डोनेशन नहीं लेते हैं परन्तु बच्चे लिख देते हैं कि यह 2 पूछते हैं । इसलिए बाबा ने कहा था जो 2 सारे दिन में सर्विस करते हो वह शाम को सारा पोतामेल बताना चाहिए । मुरली तारीख 22.5.85 पृ .2 आदि )

आ.वि.वि. आर्थिक लाभ कमाने के उद्देश्य से कोई भी कार्य या व्यापार नहीं करता ; परंतु उनकी सेवा विश्व कल्याण के उद्देश्य के लिए है

आध्यात्मिक विश्वविद्यालय -एक अनोखा परिवार

         अतः उपरोक्त तथ्यों से आप यह समझ ही गए होंगे कि आध्यात्मिक विश्वविद्यालय कोई संस्था नहीं हैं , बल्कि एक आध्यात्मिक परिवार भी है , आध्यात्मिक विद्यालय भी है और वास्तविक सत्संग भी है । यहाँ आत्मिक रूप में सभी समान होने के नाते कोई को अध्यक्ष , मंत्री , सेक्रेटरी आदि पदभार नहीं दिया जाता है । जिस तरह किसी परिवार का रजिस्ट्रेशन नहीं होता वैसे ही आध्यात्मिक परिवार का ईश्वरीय संविधान रजिस्ट्रेशन की औपचारिकता को मान्यता नहीं देता है । जैसे मदरसे ( मुस्लिम बेसिक पाठशालाएँ एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी अनेक संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से अपना क्रियाकलाप कर रही हैं वैसे ही आध्यात्मिक विश्वविद्यालय ‘ गुरुकुल प्रणाली की तरह स्वतंत्र रहने में विश्वास रखता है । 

          ब्रहमाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय , माउण्ट आबू में छपे हुए जो प्रमाणित ईश्वरीय महावाक्य हैं , वे इस प्रकार हैं;-

  • बाप तो कहते मैं बिल्कुल साधारण हूँ । तो साहूकार कोई विरले आते हैं ।… फिर भी यह बड़ी पाण्डव गवर्मेन्ट है । यह शूद्र गवर्मेन्ट पास अपन को रजिस्टर करावे ऐसे हो नहीं सकता । बाबा कहते हैं हम तो शिव भोला भण्डारी हैं । हमको यह कंगाल गवर्मेन्ट क्या मदद करेगी । हम तो इस गवर्मेन्ट को कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं । तो ऐसे ठिक्कर गवर्मेन्ट के पास अपन को रजिस्टर कराना शोभता नहीं । कौरवों के अन्डर पाण्डव गवर्मेन्ट कैसे रह सकती । नशा रहना चाहिए । उन्हों को समझाना हम भारत की अपने ही  तन – मन – धन से सेवा करते हैं । ( मुरली तारीख 21.01.73 पृ .2 अंत ) 
  • तुमको बहुत बड़े 2 हॉल मिलेंगे सर्विस के लिए बाकी तुमको हॉल वा मकान आदि खरीद कर रजिस्टर कराने की दरकार नहीं है । मुरली तारीख 12.7.70 पृ .3 अंत 
  •  यह गवर्मेन्ट का रजिस्टर्ड स्कूल तो है नहीं । गवर्मेन्ट कहती है- रजिस्टर्ड कराओ ; परन्तु यह तो स्कूल का स्कूल है , घर का घर है , सतसंग का सतसंग है मुरली तारीख 11.06.71 पृ .2 आदि )

        इन उपरोक्त ईश्वरीय महावाक्य के विरुद्ध ब्रह्माकुमारियों ने अपनी संस्था को रजिस्टर्ड कर अपने ही छपे हुए ईश्वरीय महावाक्यों का बड़ा भारी उल्लंघन किया ; परंतु आध्यात्मिक विश्वविद्यालय ने इन महावाक्यों का पालन करते हुए आज तक भी अपने ब्राह्मण परिवार को रजिस्टर्ड नहीं कराया है । सामाजिक और सरकारी तबक्कों का अत्यंत दबाव होने के बावजूद भी आध्यात्मिक विश्वविद्यालय ने अपने परिवार को रजिस्टर्ड नहीं कराया । 

विश्व के लिए आध्यात्मिक संदेश ( For- General Public )

। ओमशांति । om Shanti ।