संगठन क्लास –25.06.2023 | VCD 1158 | मुरली ता. 25.06.2023 | आध्यात्मिक ज्ञान
- मुरली क्लास
- 24 June 2023
- No Comment
- 560
आदि सनातन देवी-देवता धर्म
प्रातः क्लास चल रहा था। 22.08. 68 का चौथे पेज के मध्य में बात चल रही थी। तुम शंकराचार्यों से सन्यासियों से भी पूछ सकते हो और बता सकते हो, कि तुम्हारा धर्म तो अलग है। वह तो बाद में आता है। शुरु-शुरु में तो जरूर एक ‘आदि सनातन देवी-देवता धर्म‘ होगा। जब ‘आदि सनातन देवी-देवता धर्म’ था। तो और सभी धर्म मुक्ति में थे। और ऐसे ही अभी भी होगा। तुम बच्चे तो मुक्ति में जाने का सहज उपाय बताते हो। और वह तो कितनी हठयोग आदि क्रियाएं आदि सिखलाते हैं। उनका तो है ही है हठयोग। तुम तो मुक्ति में जाने के लिए बहुत सहज सहज बातें बताते हो। कहते हो अपन को आत्मा समज, अपने परम पिता परमात्मा बाप को याद करो। बाप भी कहते हैं : ” मैं ही एवर पावन हूं ” जो एवर पावन है, वही सभी को पावन बनाए सकता है। एवर पावन का मतलब, उसकी ‘प्योरिटी की शक्ति’ का कितना भी कोई संग का रंग ले। उसकी पवित्रता कभी क्षीण नहीं होती है। इसके लिए शास्त्रों में 1 श्लोक भी बनाया हुआ है – पूर्णमीदम् पूर्णमद: पूर्णात पूर्णमुदच्यते। वह पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण ले लिया जाए, तो पूर्ण ही बचता है। खुटता नहीं है। अर्थात वो ‘एवर प्योर’ है और इस दुनिया के जो भी मनुष्य मात्र है। चाहे धर्मपिताएं हो। धर्मात्मा हो। महात्माएं हो। वो सब ‘संग के रंग’ में आने से, खुट जाते हैं। उनकी प्योरिटी समाप्त हो जाती है। इसीलिए जो संग के रंग में आकर के प्रभावित हो जाते हैं। नीचे गिर जाते हैं। वो औरों को पतित से पावन नहीं बनाए सकते। स्वयं पतीत होने वाला दूसरों को पावन कैसे बनावेगा? सब जन्म मरण के चक्र में आने वाले हैं। सब सुख भोगने की आकांक्षा रखने वाले हैं। जो भी पार्टधारी रंग-मंच पर आत्माएं हैं। सब भोगी है। शरीर से सुख भोगते-भोगते, ‘आत्मा की शक्ति’ की क्षीणता होती रहती है। एक ही ‘तुरियाॅं शक्ति’ है, सर्वशक्तिमान। जो इस सृष्टि पर आता भी है। पतित दुनिया में आता है। पतितसे-पतित तन में आता है। फिर भी उसकी ‘पवित्रता की पावर’ कम नहीं होती है। जो-जो आत्माएं उसके ‘संग के रंग’ में आती है। उनमे दिन दूनी-रात चौगुनी, पवित्रता बढ़ती ही जाती है। तो बोला कि, तुम बच्चे तो उस परम-पवित्र बाप को पहचानते हो। और उसे याद करने का सहज रास्ता बताते हो। वह तो कठिन कर देते हैं। निराकार बताएं देते हैं। सर्वव्यापी बताएं देते हैं। सर्वव्यापी बताने से ‘बुद्धि भटक’ जाती है। कहां-कहां बुद्धि को टिकाएंगे? अभी तो बाप ने सेहज रास्ता बताया है, कि “अपन को आत्मा समझो और इस सृष्टि पर आए हुए साकार बाप को जो मनुष्य सृष्टि का बाप है उसे पहचानो”। वह क्रिएटर है। ‘क्रिएटर और क्रिएशन’ का संबंध ‘साकार’ में होता है। उस क्रिएटर में, वह ‘निराकार परमपिता परमात्मा शिव’ प्रवेश करता है। और ‘पहचान’ देता है, कि “मुझे याद करो”। “मैं ही एव्हर पावन हूं”। जिस मुकर्रर रथ में प्रवेश करता हूं। उसको भी एव्हर पावन नहीं कहेंगे अभी। उसे भी एव्हर पावन तब कहेंगे, जब सुप्रीम सौल बाप उस आत्मा को ‘ आप-समान ‘ बनाए लेते हैं। तो मुझे ही कहते हैं पतित-पावन। पतियों को पावन बनाने वाला। बोलो, “अभी तुम सन्यासी अपने देह अभिमान को छोड़ दो”। “अपन को आत्मा समझो और बाप को याद करो”, तो तुम्हारे भी पाप भस्म हो जाएंगे। बस एक ही बात पक्की सुनाते हैं। “उस एव्हर-प्युअर बाप को याद करो, तो तुम्हारे पाप कटेंगे और तुम मुक्तिधाम चले जावेंगे”। कोई भी हो सभी को यह ‘रास्ता’ बताओ। कोई मानेगा, कोई नहीं मानेगा। माने या ना माने। किसी की बुद्धि में अगर ‘थोड़ा भी’ बैठ जावेगा। तो ‘प्रजा’ में आज आ जावेगा। नहीं बैठता है, तो समझ जाना चाहिए कि, हमारे ‘धर्म’ का है ही नहीं। ‘ दो ‘ ही अक्षर समझाने है ‘ अलफ ‘ अर्थात अल्लाह। अल्लाह उंच ते उंच को कहा जाता है। उंच और नीच की गणना इस ‘साकार सृष्टि’ पर ही होती है। निराकारी दुनिया में ‘उच्च और नीच’ की बात नहीं है। तो अलफ है उंच ते उंच और वह उंच ते उंच इस सृष्टि पर आता है तो ऊंचे ते ऊंचा बादशाह बनाता है। पिछाड़ी में फिर एक ही बात कहते हैं, ‘ मन मना भव ‘। मेरे मन के संकल्पों में समा जा। मैं ‘ निराकारी स्टेज ‘ वाला हूं। तू भी ‘ निराकारी ‘ बन जा। मैं ‘ निर्संकल्प स्टेज ‘ वाला हूं। तो मेरे को याद करते-करते, तू भी ऐसे ही बन सकता है। निराकारी बनेगा तो निर्विकारी बनेगा। फिर निरहंकारी कहां जाएगा। एक ही बात बताते हैं कि ‘ माम एकम याद करो ‘। फिर जो जितना याद करें। अपनी ‘याद का मीटर’ देखते रहो, की हमारी याद इतनी ‘सहेज’ होती जाती है। याद में बैठता हूं, तो कितनी ‘देर’ लगती है, मुझे ‘मन को एकाग्र’ करने में। ये मिटर देखो। जो मीटर वाले होते हैं, ‘पानी के मीटर’ वाले या ‘बिजली के मीटर वाले’। उनके पास भी तो ‘मीटर’ होता है ना। ‘लंबाई को नापने वालों’ के पास भी मीटर होता है। तो जितने ‘माइल्स’ का पता पड़ता जाता है। वो भी तो होता है ना। ‘ तो तुमको तो बहुत थोड़ा समझना और समझाना है ‘। तुम्हारा ‘समय’ तो बहुत ‘कीमती’ है। बाप से ‘वर्सा’ लेने के लिए, ‘बार-बार बाप को ही याद करना है’। खुद याद करना है और दूसरों का ‘कल्याण’ भी करना है। समय ‘नष्ट’ नहीं करना है। ‘ईश्वरीय सेवा‘ में, हड्डी-हड्डी ‘स्वाहा’ करनी है। इसके लिए ‘ दधीचि ऋषि ‘ का मिसाल दिया जाता है। तो मित्र, संबंधी आदि जो भी मिले। उनको बोलो कि हम तुमको सिर्फ एक ही बात सुनाते हैं, कि हम सब ‘भाई-भाई’ हैं। सब एक पिता के ‘बच्चे’ हैं। तो ‘हमारा धंधा’ सो ‘बाप का धंधा’।बापका धंधा है, ‘सबको पैगाम दो’। हम भी पैगंबर के बच्चे, ‘ पैगंबर ‘ है। और कोई ‘फालतू बातें’ नहीं करनी चाहिए। पक्का बुद्धि में बैठाना कि, सिर्फ एक बाप की याद से ही ‘पावन’ बनेंगे। ‘पावन-धाम’ ‘ दो ‘ ही हैं। एक ‘शांतिधाम’ और दूसरा ‘सुखधाम’। ये तो ‘पतित दुनिया’ है, ‘दुखधाम’। अभी फिर बाप कहते हैं कि, मुझे याद करो, तो दुखधाम को छोड़कर के, तुम सुख धाम में ‘ट्रांसफर’ हो जावेंगे। पहले शांतिधाम जावेंगे। उसको समझाना है, कि ‘ नब्ज ‘ भी देखनी पड़ती है। उन लोगों को पता ही नहीं है कि, दुनिया का ‘विनाश’ होना है। अब पहले ही मर जावेंगे। तुम्हारी बातें सुनने के लिए, उनको फुर्सत ही नहीं है। तो ‘विनाशंती’ हो जाते हैं। तुम्हारी तो ‘विजय निश्चित’ है। तुम्हारे अलावा, बाकी सब शांतिधाम में चले जावेंगे।…..
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रुहानी बाप बैठ, रुहानी बच्चों को समझाते हैं। जब भी मुरली शुरू होती है, तो अक्सर करके यह बात क्यों बोलते हैं? क्यों याद दिलाते हैं? कि, रुहानी बाप बैठ रुहानी बच्चों को समझाते हैं। इसलिए याद दिलाते हैं कि, 63 जन्म की रग पड़ी हुई है। देहधारियों के संग के रंग में आने की, देहधारियों को देखते हैं, तो देहधारियों की ही याद आती है। यहां तो दो बाप है। एक है रूहानी बाप। वह भी बेहद का है। बेहद की रुहै और उनका बाप बेहद का और वो रूहानी बाप। इन जिस्मानी आंखों से नहीं दिखाई पड़ता है। इसलिए याद दिलाते हैं कि, रूहानी बाप समझाने वाला है। और बैठ समजाते हैं। किस में बैठ समझाते हैं? जिस्मानी बाप में बैठ समझाते हैं। वो जिस्मानी बाप भी, मनुष्य सृष्टि का बेहद का बाप है। क्राइस्ट आदि धर्मपिताएं फिर भी, देढ सौ-दो सौ करोड मनुष्य सृष्टि के बाप है। उनकी तो फिर भी हद है। परंतु जिस मुकर्रर रथ में परमपिता परमात्मा रूहानी बाप आते हैं। वह तो सारी सृष्टि का बाप है। परंतु समझाने वाला वो मनुष्य सृष्टि का बाप नहीं है। वह जिस्मानी बाप है। मनुष्यों को जिस्म होती है। वो जिस्मों को पैदा करने वाला है। जो जिस्मानी मनुष्य सृष्टि है, उसका बीज बोने वाला बाप है। 500 करोड़ मनुष्य सृष्टि के, पहले पत्ते को भी जन्म देने वाला बाप है। परंतु वो समझाने वाला नहीं है। समझाने वाला रूहानी बाप है। बताते हैं कि, मुझे यह बातें समझाने में मजा आता है। किसको? रूहानी बाप को। यह रूहानी बातें समझाने में बहुत मजा आता है। और फिर तुम बच्चों को पवित्र बनाने में भी बहुत मजा आता है। अरे!! क्या? जितना-जितना, मैं तुम बच्चों के संसर्ग-संपर्क-संबंध में आता जाता हूं। और जितना-जितना तुम बच्चे मेरे को लगाव पूर्वक याद करते हो। उतना तुम पवित्र! बनते जाते हो। इसलिए ही कहते हैं कि, पतित पावन बाप को याद करो। पतितोंको पावन बनाने वाला, वो निराकार रूहानी बाप है। जब गाते हैं पतित-पावन सीता-राम। तो गाने वाले भक्तों की बुद्धि साकार की ओर चली जाती है या रुहानी बाप की ओर चली जाती है? ये बात तो झुटी हो गयी! क्या? की राम और सीता पतितोंको पावन बनाने वाले हैं!! बाप भी बार-बार समझाते है। तुम सब सिताएं हो। चाहे मेल हो और चाहे फीमेल हो। सब रावण के जेल में हो। अच्छा! उसमें प्रजापिता आ गया कि नहीं आ गया। हां? कि अलग कर दिया! वह भी आ गया! वह भी रावण के जेल में आता है कि नहीं आता है? आता है! तो वो ये समझे कि मैं तो राम हूं! ये तो झूठी बात हो गई। परमपिता परमात्मा शिव ज्योति बिंदु रूहानी बाप के सामने, वो भी क्या है? सिता है या राम है? वो भी सीता है।फिर राम कौन है? निराकार राम है!! निराकार का मतलब क्या? निराकार का मतलब! जो इन आंखों से देखने में नहीं आता है। वो निराकार बाप शिव ज्योति बिंदु, उनका नाम शिव ही है। वो नाम कभी भी बदलता नहीं है। फिर ये राम नाम कहां से आ गया!! हां? शास्त्रों में जो भी नाम है। किस आधार पर है? काम के आधार पर है। वो शिव काम करता है या अकर्ता है? वह तो अकर्ता है। बिन्दु क्या काम करेगा? बिंदु! कोई काम नहीं करता। जब वही बिंदु साकार में प्रवेश करता है। तो! तो काम करता है। क्या काम करता है? उसका मुख्य काम क्या है? पतितकों पावन बनाना। तो सब पतितकों एक साथ पावन बनाता है या नंबरवार बनाता है? जो पतित आत्माएं! पहले-पहले पावन बनती है। वह बाप से राजयोग सीखने वाली आत्माएं हैं। राजयोगी है। हटयोगी नहीं है। उन राजयोगीयों में जो उत्तम ते उत्तम है। पार्ट बजाने वाला हीरो पार्टधारी। उसमें जब मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं। तो उन योगियों को, जो परमपिता परमात्मा से राजयोग सीखते हैं। उन्हें बहुत मजा आता है। जितना बाप को पतितों को पावन बनाने में मजा आता है, उतना! उन योगियों को भी सहज राजयोग सीखते समय बहुत आनंद आता है। कोई कहते हैं, हमारा तो योग ही नहीं लगता। हमारा तो बहुत कठिनाई होती है। बहुत परेशानी होती है। हमें तो चेहरा भी याद नहीं आता। उस चेहरे में प्रवेश होने वाला वह ज्योति बिंदु! उसकी याद तो बहुत दूर की बात हो गई!! हमें तो वह आधार भी याद नहीं आता। तो इससे क्या साबित होता है? हां? इससे साबित होता है कि, उनका जो राजयोग का वो फाउंडेशन है, वही कच्चा है। फाउंडेशन पक्का ना होने के वजह से! जो भी राजयोग की बिल्डिंग है, वह कमजोर होती रहती है।- संगठन क्लास –25.06.2023 | VCD 1158 | मुरली ता. 25.06.2023 | आध्यात्मिक ज्ञान
जिसका आदि अच्छा, उसका मध्य और अंत भी अच्छा होता है।
जो आत्मा है जिस समय ज्ञान में आयी। बाप को पहचाना उसी समय, जो जितने अलर्ट हो जाती है। तो उनको बहोत आनंद आता है। जिसका आदि अच्छा, उसका मध्य और अंत भी अच्छा होता है। फिर भी कहते हैं सर्व का सद्गतिदाता एक ही बाप है। और कोई है नहीं। 500-700 करोड़ जो भी मनुष्य मात्र है। जो भी मनुष्यों की आत्मा है। उन सब की सद्गति करता है। हां! कोई की एक जन्म की सद्गति होती है। और कोई की एक्किस जन्मों की भी सद्गति होती है। यह भी तुम ही समझते हों कि अभी घर जरूर जाना है। किसको? किसको घर जाना है। मनुष्यों को घर जाना है! या ब्राह्मणों को घर जाना है! ब्राह्मणों को घर जाना है? हां? आत्माओं को घर जाना है! पुरुषार्थ जास्ती कराने के लिए बाप कहते हैं कि, यह याद की यात्रा बहुत जरूरी है। और सब्जेक्ट इतने जरूरी नहीं है। जितनी याद की यात्रा जरूरी है। याद से ही पावन बनेंगे। कोई कहते हम सेवा से पावन बन जावेंगे। ज्ञान सुनकर के और सुना कर पावन बन जावेंगे। धारना करने और कराने से पावन बन जावेंगे। नहीं! काहेसे पावन बन जावेंगे! याद से पावन बनेंगे। याद से ही क्यों कहा? इसलिए कहा, की जिसका हम संग करते हैं इंद्रियों से, चाहे वह ज्ञानेंद्रियां हो, चाहे कर्मेंद्रियां हो।मान लो किसी को आंख से देखते हैं, तो याद नहीं आवेगा! याद आवेगा। तो याद का कनेक्शन है। जितना प्रैक्टिकल जीवन में संग का रंग लगता है। इतनी याद जरूर आती है। और संग का रंग भी, अगर अटैचमेंट पूर्वक है। तो याद और ही जास्ती आवेगी। अटैचमेंट, कहीं दूसरी जगह लगा हुआ है। संग भल शरीर के साथ है। कंधे पर चढ़े हुए हो। सरेंडर ही हो गए हो। लेकिन, बुद्धि कहीं, मन-बुद्धि कहीं दुनिया में, बाहर की दुनिया में लगी हुई है। तो संग का रंग लगेगा? नहीं लगेगा! और गहरी याद आवेगी?? हां?नहीं आवेगी। इसलिए बताया की याद से ही पावन बनेंगे। और याद में भी जितनी अव्यभिचारी याद होगी। उतने जास्ती जल्दी पावन बन जावेंगे। व्यभिचारी याद होगी! तो पावन बनने में, देरी लग सकती है। तो मुख्य है ‘याद की यात्रा’। दूसरे नंबर में है, पढाई। तो बताया की पहले तो अलफ बापको याद करो। पीछे बादशाही की बात। जिसके लिए तुमको डायरेक्शन देते हैं। तुम जानते हो कि हमने 84 जन्म कैसे लिये है! इस बात पर विचार करना है। फिर तुम जान जावेंगे कि, तमोप्रधान से सतोप्रधान कैसे बनना है? जैसे ऊंची देवताई स्टेज से, नीचे उतर कर के, राक्षसी स्वभाव वाले बने। ऐसे ही, नीचे से फिर उंचे बनने के लिए, क्या करना पडेगा? हां? अरे नीचे गिरे अनेकों की याद से! अनेकों के संपर्क, संसर्ग, संबंध में जन्म जन्मांतर आते रहें। तो नीचे गिर गए। अब क्या करें? अब जो एक उंच ते उंच बाप का परिचय मिला है। जाना है। माना है। स्वीकार किया है। उस एक बाप की याद में हम टिकेंगे। टिकने का पुरुषार्थ करेंगे। तो तमोप्रधान से सतोप्रधान! जरूर बनेंगे। सतोप्रधान बनेंगे, फिर सतो प्रधान से फिर तमोप्रधान बनेंगे। ऐसे नहीं कि एक बार सीढ़ी चढ गए! तो फिर सदा काल चढ़े ही रहेंगे!! नहीं! फिर उतरना भी है।
अभी फिर से तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। अभी लक्ष्य क्या है? हां? अभी दोनों ही लक्ष्य है? या एक ही लक्ष्य है? हां? तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने का लक्ष्य है। दूसरा लक्ष्य तो नहीं है? क्या? की सतोप्रधान बनकर फिर तमोप्रधान भी बनना है। कोई-कोई ऐसे भी है! जो बार-बार बोलते हैं! भक्ति से नीचे उतरना होता है। भक्ति नहीं करेंगे! तो ज्ञान कैसे मिलेगा!! भक्ति पुरी होगी, तभी तो भगवान की पूरी पहचान होगी !!! तो बुद्धि में क्या बैठा हुआ है? नीचे उतरना है?या चढ़ना है? ये तो नीचे उतरने वाली बात हो गई!! नहीं!! अभी तो हमें पक्का-पक्का! नीचे से ऊपर चढ़ना है। चढ़ती कला में जाना है। उतरती कला की तो! बात ही नहीं। भल माया हमारा पीछा नहीं छोड़ती है। माया तो हमको नीचे गिराती है। परंतु हमारा लक्ष्य सिर्फ क्या है? पतित से पावन बनना है।क्योंकि हम बेहद के बाप के बच्चे बने हैं। जब उतरते हैं! तो बेहद के बाप का हमको ज्ञान! होता ही नहीं। और अभी!! अभी, तो हमको बेहद के बाप का ज्ञान है। इसलिए उपर ही चढने का लक्ष्य रखना है। नीचे गिरने की बात नहीं होनी चाहिए। और यह भी जानते हो कि बाप एवर पवित्र है। सतयुग है पावन दुनिया। उस पावन दुनिया में एक भी पतित नहीं होता है। सतयुग में यह पतितपने की कोई भी बाते नहीं होती है। तो मूल बात है, पावन बनने की। अब पवित्र बनो तो नई-दुनिया सतयुग में आने लायक बनो। उसके लिए प्रयास करना है। खुद भी पावन बनना है और दूसरों को भी पावन बनाना है। वहां नई दुनिया में कोई भी पतित नहीं होते। वहां सब पावन होते हैं। और यहां! पुरानी दुनिया में सब पतित है।जो अभी सतोप्रधान बनने का पुरुषार्थ करते हैं। वही सतोप्रधान दुनिया का मालिक बनेंगे। तो मूल बात यही है कि बाप को याद करके सतोप्रधान बनना है। बाप कोई जास्ती मेहनत नहीं देते हैं। सिर्फ कहते हैं कि, अपन को आत्मा समझो। बार-बार कहते हैं। तो पहले-पहले यही सबक पक्का करो की हम देह नहीं है, हम! आत्मा है। बस! जो बड़े आदमी होते हैं, जास्ती नहीं पढ़ाते। जितना बड़ा प्रोफेसर होगा, सारा दिन पढ़ाता होगा, की एक दो घंटा लेगा!! थोड़ा पढ़ाता है! दो अक्षरों में सारा समझाए देते हैं। बड़े आदमी को तकलीफ ज्यादा नहीं दी जाती है। यह भी तुम जानते हो कि, सतोप्रधान से तमोप्रधान बनने में भी कितने जन्म लग गये। हां? कौन बताएगा? कितने जन्म लग गए ? हां? हां ? तो कोई एक हाथ उठाकर बता दो कितने जन्म लग गए? हां ?63 जन्म? अच्छा ! 63 जन्मों के पहले जो एक्किस जन्म हुए, उनमें नीचे नहीं गिरे??कलायें कम नहीं हुई? हां ? तो ये कैसे कह सकते है? कि सिर्फ 63 जन्म ही लगे!! अरे! सतोप्रधान पहले जन्म में होते हैं? या त्रेता के अंतिम जन्म में भी सतोप्रधान होते हैं? सतयुग के अंत में सतोप्रधान कहे? हां ? नहीं। तो प्रश्न यह है कि सतोंप्रधान से तमोप्रधान बनने में, कितने जन्म लगे? 84 जन्म लगे हैं। 63 जन्म नहीं कहेंगे। 84 जन्म लगे हैं। सतोप्रधान से तमोप्रधान बनने में कितना टाइम लगता है? हां? वही 84 जन्म। 5000 साल। तो ये तो तुमको निश्चय हो गया कि पहले पहले हम ही सतोंप्रधान थे और दूसरे धर्म वाली, जो भी आत्माएं हैं। वो सतोप्रधान नहीं थी। हम स्वर्ग के वासी थे। कहां के वासी? स्वर्ग के वासी। स्वर्ग के वासी की पहचान क्या हुई? स्वै स्थिति में रहने वाले! स्वै स्थिति में ही जाने वाले। गमन करने वाले। तो जो स्वै स्थिति में गमन करते रहते हैं। उनको कहते हैं स्वर्गवासी। अर्थात हम स्वर्ग- सुखधाम के मालिक थे। सुखधाम था, जिसको आदि सनातन देवी-देवता धर्म कहा जाता है। थे तो तब भी मनुष्य। हाथ- पाव- आंख- नाक -कान यही सब था ना तब। की कुछ अंतर था? हां? जैसे मनुष्यों को होते हैं, हाथ- पाव-नाक-कान वैसे वहां भी इन्द्रियां थी । इन्द्रियां यहां भी है। परंतु अंतर क्या था? वहां! इंद्रियां! सतोप्रधान थी। दुख देनेवाली नहीं थी। और यहां इंद्रियां!! तमोप्रधान हो गई है। दुखदाई हो गई है। सारा शरीर ही दुखदाई हो गया। जो तमोप्रधान होता है? वो दूसरों को ही दुख देता है या अपने को भी दुख देता है? खुद भी दुखी होता है और दूसरों को भी दुख देता है। तो इस समय है, आसुरी गुणवाले मनुष्य। ये तो शास्त्रों में धुक्का मार दिया है कि, देवताओं और असुरों की लड़ाई लगी। वास्तव में जहां देवताएं होते हैं सतोप्रधान! वो कोई से लड़ाई नहीं लड़ते हैं। वहां असुर कहां से आए। असुर कहां होते हैं? जो आसुरी दुनिया होती हैं। उसमें सब असुर होते हैं और देवताई दुनिया में सब! देवता होते हैं। तो उनकी लड़ाई होने की तो संभावना है ही नहीं। हां! देवताओंअसुरों की आपस में लड़ाई तब लगी। जब देवताओं का राज्य स्थापन हुआ और असुरों का राज्य खलास हुआ। किसी की राजाई जाती है, और दूसरे को मिलती हैं। ऐसी अगर संभावना हो जाए। तो जिसका जाएगा, वह लढेगा कि नहीं लढेगा?? वह लड़ेगा। देवताएं थोड़ी लड़ाई करते हैं!! लड़ाई कौन लड़ते हैं? असुर लडाई लड़ते हैं। तो ये तो बाप समझाते हैं कि, तुम पहलेपहले ऐसे थे। बाप ने आकर के तुमको ब्राह्मण बनाया। नहीं तो पहले क्या थे? हां ? पहले शुद्र थे। शूद्र किसको कहा जाता है? हां? आज से 400-500 साल पहले तुलसीदास ने भी लिखा था : भये वर्ण संकर सबै। सब वर्ण संकर हो गये। माना कोई भी पक्का ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं रह गया। मिक्स हो गए। क्षुद्र बन गए। अभी बाप! ब्राह्मण से ‘देवता’ बनाने की ‘युक्ति’ बताते हैं। पहले क्या है? पहले शुद्र से! ब्राह्मण बनाते हैं। ये एक एक प्रयास हो गया। फिर बाद में ब्राह्मणों को देवता बनाते हैं। ब्राह्मण किसके द्वारा! ब्रह्मा द्वारा!! ब्राह्मण बनते हैं। फिर देवता किसके द्वारा बनेंगे? हां? देवताओं के द्वारा!! कौन से देवताएं है? जिनके द्वारा हम देवता बनते हैं!? हां? ब्रह्मा?! हां ? ब्रह्मा को देवता नहीं कहेंगे?? कहेंगे। दाढ़ीमूछ वाले को देवता क्यों कहेंगे!? हां? दाढ़ीमूछ वाले को देवता कहेंगे या नहीं कहेंगे? अब नहीं बोलते!!! बोला की वकील के द्वारा वकील बनता है। डॉक्टर के द्वारा! डॉक्टर बनता है। इंजीनियर के द्वारा! इंजीनियर बनता है। तो ब्रह्मा के द्वारा ब्राह्मण बनते हैं। ब्रह्मा के द्वारा देवता! नहीं बनते हैं। कोई बना क्या? हां? कोई नहीं बना।क्या ब्रह्मा बाबा देवता नहीं बने ? हां? देवता नहीं कहेंगे फरिस्ता बने।फर्श की दुनिया वालों से! उनका अब कोई रिश्ता!! नहीं रहा। तो बोला! उन देवताओं के लिए कहां जाता है : ‘अहिंसा परमो धर्म: ‘ उनका परम धर्म क्या है? उनका परम धर्म है, अहिंसा। तो वो अब भी लड़ाई थोडे ही करेंगे !!