एक संक्षिप्त परिचय -आध्यत्मिक ज्ञान (AIVV)

एक संक्षिप्त परिचय -आध्यत्मिक ज्ञान (AIVV)

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  • 9 May 2023
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने कहा है कि- 'जब 2 विश्व में धर्म की ग्लानि होती है तो दुष्टों को दण्ड देने तथा सज्जनों की रक्षा करने के लिए मैं सृष्टि पर आता हूँ।'

 

     तो सोचिए, क्या दुनिया की परिस्थिति इतनी नहीं बिगड़ी है कि भगवान को इस धरती पर आने की आवश्यकता हो ? दुनिया में चारों ओर आग ही आग दहक रही है। कहीं काम की अग्नि, तो कहीं क्रोध की अग्नि, कहीं मनुष्य प्रकृति का नाश करता आया है और कहीं प्रकृति मनुष्य का नाश कर रही है। क्या सृष्टि का इसी प्रकार पतन होता रहेगा? क्या इसका परिवर्तन सम्भव है?

       हाँ, सम्भव है, किन्तु पतित मनुष्यों द्वारा नहीं, अपितु पतित-पावन, सदा कल्याणकारी परमपिता परमात्मा शिव भगवान द्वारा, जो कि नर्क को स्वर्ग बनाने के लिए भारत भूमि पर दिव्य जन्म ले चुके हैं और सन् 1936/37 से इस विश्व परिवर्तन का कार्य एक साधारण मनुष्य तन में प्रवेश कर गुप्त रूप से सहज राजयोग और ईश्वरीय ज्ञान की शिक्षा द्वारा कर रहे हैं। जैसा कि गीता में वर्णित है कि ‘मूढमति लोग साधारण तन में आए मुझ परमपिता परमात्मा को नहीं पहचान पाते। ‘ पहचाने भी कैसे? क्योंकि 5000 वर्ष के इस विशाल सृष्टि रूपी नाटक में 84 जन्म लेते-2 सभी मनुष्य आत्माएँ पतित व विकारी जो बन चुकी हैं, मिट्टी के समान शरीर में मन-बुद्धि को लगाते – 2 पत्थर बुद्धि बन गई हैं, मूर्छित हो गई हैं।

       गीता में वर्णित है कि ‘अपने विश्व रूप का दर्शन कराने के लिए भगवान ने अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान किए।’ यह सिर्फ एक अर्जुन की बात नहीं है और न ही भगवान ने किसी रथ पर बैठकर सिर्फ अर्जुन को संस्कृत में गीता के 18 अध्याय सुनाए थे। वास्तव में निराकार परमपिता शिव किसी मनुष्य शरीर रूपी रथ में बैठकर सभी पुरुषार्थ का अर्जन करने वाले अर्जुन रूपी आत्माओं को सृष्टि के आदि, मध्य और अंत का रहस्य समझाते हैं। वे हम सब आत्माओं के पिता हैं। उनके ज्ञान व अविनाशी सुख-शान्ति के वर्से पर हम सबका हक है। यह वर्मा हमें देने के लिए वे स्वयं इस धरती पर पधार चुके हैं और साधारण मनुष्य शरीर रूपी रथ में बैठकर ईश्वरीय ज्ञान व राजयोग की शिक्षा दे रहे हैं। एक संक्षिप्त परिचय -आध्यत्मिक ज्ञान (AIVV)

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यज्ञ के आदि की कहानी

       उनका यह कार्य सन् 1936-37 में पाकिस्तान के सिंध हैदराबाद शहर से प्रारम्भ हुआ, जब उन्होंने ‘दादा लेखराज’ नामक एक विख्यात हीरों के व्यापारी को विष्णु चतुर्भुज, नर्क की पुरानी दुनिया के विनाश और स्वर्ग की नई दुनिया की स्थापना का साक्षात्कार कराया; किन्तु दादा लेखराज उन दिव्य साक्षात्कारों का अर्थ समझ न पाए। उन्होंने अपने गुरुओं से इसका अर्थ पूछा; किन्तु भगवान की लीला वे क्या समझें? उन्होंने दादा लेखराज को वाराणसी के प्रकाण्ड पण्डितों से इसका समाधान पाने की सलाह दी; किंतु उन्हें वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। वहाँ भी उन्हें साक्षात्कार होते रहे जिसकी तस्वीरें वे गंगा के घाटों पर बनी दीवारों पर बनाते रहते थे। जब कोई भी उनकी समस्या का समाधान न कर सका तो उन्हें अपने कलकत्ता निवासी भागीदार की याद आई। उसकी निष्ठा, ईमानदारी और होशियारी से प्रभावित होकर ही उन्होंने उसे अपनी कलकत्ता स्थित हीरों की दुकान की जिम्मेवारी सौंपी थी।

          अतः दादा लेखराज कलकत्ता गए किंतु सीधे उस भागीदार को अपने साक्षात्कारों का वर्णन करने के बजाय उन्होंने अपनी नज़दीकी संबंध की माता (छोटी माता) को सुनाया और छोटी माता ने दूसरी माता को सुनाया जो बोलने, सुनने-सुनाने में सिद्धहस्त थी। बाद में जब सुनने – सुनाने में सिद्धहस्त माता ने प्रजापिता ( भागीदार) को सुनाया उसी समय ज्योतिबिंदु परमपिता परमात्मा शिव ने उसी माता और प्रजापिता ( भागीदार) में साथ ही साथ प्रवेश कर लिया और इस प्रकार उस सिद्धहस्त माता द्वारा साक्षात्कारों का वर्णन सुनने-सुनाने की प्रक्रिया द्वारा भक्तिमार्ग की तथा भागीदार द्वारा ज्ञान समझने-समझाने की प्रक्रिया द्वारा ज्ञानमार्ग की नींव पड़ गई।

          कुछ समय के बाद दादा लेखराज ने भागीदार और छोटी माता के प्रैक्टिकल पार्ट और अनुभव से अपने वर्तमान जन्म के पार्ट ‘ब्रह्मा’ के स्वरूप और भविष्य सतयुग में कृष्ण के रूप में प्रथम महाराजकुमार के स्वरूप को भी पहचान लिया। इसी तरह ओमराधे नाम की कन्या ने अपने वर्तमान जन्म के ‘सरस्वती’ नामक पार्ट का और भविष्य सतयुग में राधा के रूप में प्रथम महाराजकुमारी के स्वरूप का भी निश्चय कर लिया। वास्तव में तो ये ब्रह्मा और सरस्वती दोनों टाइटिलधारी ब्रह्मा सरस्वती ही थे। जबकि मूल रूप में भागीदार ही प्रजापिता ब्रह्मा और दूसरी माता जगदम्बा (बड़ी माँ) का स्वरूप था।

           भगवान द्वारा साकार रूप में स्थापित यह परिवार कलकत्ते से सिंध हैदराबाद और फिर कराची में स्थानान्तरित हुआ, जहाँ कुछ वर्षों तक शिव का साकार माध्यम बनने के बाद भागीदार तथा उन दोनों माताओं का देहावसान हो गया और धरती पर ईश्वरीय कार्य की सारी ज़िम्मेवारी दादा लेखराज के कंधों पर आ पड़ी, जिन्होंने भगवान का परिचय पाते ही अपना तन, मन और धन उन पर न्यौछावर कर दिया था। अतः परमपिता शिव ने विश्व परिवर्तन का कार्य दादा लेखराज (जिनका कर्तव्यवाचक नाम ब्रह्मा है) के शरीर के द्वारा जारी रखा।

         

ओम मण्डली

          इस बीच यह ईश्वरीय परिवार जो पहले ‘ओम मंडली’ कहलाता था, देश के विभाजन के पश्चात् राजस्थान स्थित माउंट आबू में स्थानान्तरित होने पर ‘ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय’ कहलाने लगा। यहाँ से भगवान द्वारा सिखलाए गए ज्ञान व राजयोग की शिक्षा का देश-विदेश में प्रचार होने लगा। दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा के द्वारा परमपिता परमात्मा शिव ने आत्मा, परमात्मा व सृष्टि के आदि, मध्य व अन्त का प्रारम्भिक या बेसिक ज्ञान दिया। सर्वप्रथम यह ज्ञान दिया कि हम पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश इन पाँच तत्वों से निर्मित यह शरीर नहीं; किन्तु वास्तव में हम अति सूक्ष्म ज्योतिबिंदु आत्मा हैं। जिस प्रकार गाड़ी को चलाने के लिए ड्राइवर की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार इस शरीर रूपी गाड़ी को चलाने के लिए आत्मा रूपी ड्राइवर की आवश्यकता होती है। आत्मा में मन, बुद्धि व संस्कार होते हैं। आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है; किंतु शरीर विनाशी है। जैसे आम का बीज बोने से आम ही निकलता है, ठीक ऐसे ही मनुष्यात्मा मनुष्य के रूप में ही पुनर्जन्म लेती है; किंतु दूसरी योनियों में नहीं जाती।

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 जिस प्रकार हम एक सितारे की भाँति आत्मा हैं, उसी प्रकार हमारे अविनाशी पिता सुप्रीम सोल शिव भी एक स्टार स्वरूप आत्मा हैं; किंतु वे परम आत्मा हैं अर्थात् हर गुण व शक्ति में अनंत हैं। हम आत्माएँ कभी पति तो कभी पावन बनती हैं; किंतु वे सदा पावन हैं, इसलिए उनका असली नाम है ‘शिव’। शिव अर्थात् कल्याणकारी। सदा कल्याणकारी होने के कारण उन्हें ‘सदाशिव’ भी कहते हैं। परमपिता परमात्मा सर्वव्यापी नहीं हैं, न तो वे माँ के गर्भ से जन्म लेते हैं, न विभिन्न जन्तुओं के रूप में अवतार लेते हैं। वे तो तीन अति श्रेष्ठ मनुष्य आत्माओं के शरीरों में प्रवेश कर स्थापना, विनाश और पालना के तीन कर्तव्य करते हैं। इसलिए उन्हें ‘त्रिमूर्ति शिव’ भी कहते हैं। शास्त्रों में शिव शंकर को इकट्ठा कर दिया है; किंतु निराकार शिव अलग हैं और साकार शंकर महादेव अलग है।

          परमपिता परमात्मा शिव एवं हम आत्माएँ सूर्य, चंद्र व नक्षत्रों के इस अंतरिक्ष से पार परमधाम के रहवासी हैं, जहाँ से हम आत्माएँ इस सृष्टि-रूपी रंगमंच पर आकर यह शरीर रूपी वस्त्र धारण कर नाटक करती हैं। यह सृष्टि-रूपी नाटक 5000 वर्ष का होता है जिसमें मनुष्य आत्माएँ ज़्यादा-से-ज्यादा 84 जन्म लेती हैं। इस नाटक में चार युगों के चार सीन्स होते हैं जिनमें से प्रत्येक युग की आयु 1250 वर्ष होती है। जिनमें सतयुग और त्रेता को ‘स्वर्ग’ तथा द्वापर और कलियुग को ‘नर्क’ कहा जाता है।

         स्वर्ग, जो आज से 5000 वर्ष पूर्व स्थापन हुआ था, उसमें सभी मनुष्य आत्माएँ देवी-देवता थे, क्योंकि वहाँ हम आत्म-अभिमानी होने के कारण सर्वगुण सम्पन्न व पवित्र थे। वहाँ एक राज्य, एक भाषा, एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म ही था। | चूँकि हम पवित्र व सुखी होते हैं तो भगवान को याद करने की आवश्यकता नहीं होती है; किंतु जब द्वापरयुग से हम स्वयं को देह समझने लगते हैं तो दुःख अशान्ति की शुरुआत होती है और देवी-देवताएँ जो अब ‘हिन्दू’ कहलाते हैं, वे ही मंदिर बनाकर शिवलिंग व देवी-देवताओं की पूजा करने लगते हैं। विभिन्न धर्मपिताओं की आत्माएँ परमधाम से आकर अपना – 2 धर्म स्थापन करती हैं। द्वापरयुग में इब्राहीम द्वारा इस्लाम धर्म की स्थापना व क्राइस्ट द्वारा क्रिश्चियन धर्म की स्थापना होती है। कलियुग में अनेकानेक धर्म व मत- मतांतर स्थापित हो जाते हैं। मनुष्य बिल्कुल पतित, भ्रष्टाचारी एवं तमोप्रधान बन जाते हैं। तब कलियुग अन्त में स्वयं परमपिता परमात्मा शिव पतित आत्माओं को पावन बनाने के लिए प्रजापिता ब्रह्मा के तन में परकाया प्रवेश कर ईश्वरीय ज्ञान व राजयोग की शिक्षा देते हैं। सन् 1936 / 37 से प्रारम्भ हुए शिव अवतरण के इस समय को ‘संगमयुग’ कहा जाता है अर्थात् कलियुग के अंत एवं सतयुग के आदि का संगम। यहाँ मनुष्यात्माएँ परमपिता परमात्मा की याद से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि पाँच विकारों को भस्म कर फिर से सर्वशक्ति सम्पन्न बनती हैं।

 

       माउण्ट आबू में परमपिता शिव का यह ईश्वरीय कार्य चल ही रहा था; किंतु 18 जनवरी, सन् 1969 में अचानक दादा लेखराज उर्फ ब्रह्मा का देहावसान हो गया (जिनकी आत्मा अभी तक ब्रह्माकुमारी संस्था की गुलज़ार दादी के तन में प्रवेश कर अव्यक्त वाणी सुनाती है); किंतु भगवान का विश्व परिवर्तन का बेहद का कार्य तो रुक नहीं सकता। अतः ज्योतिबिन्दु शिव ने सन् 1969 में ही उक्त भागीदार के अगले जन्म वाले मुकर्रर शरीर रूपी रथ में प्रवेश किया, जिसकी प्रत्यक्षता सन् 1976 से दिल्ली के ब्रह्माकुमारी विद्यालय के जिज्ञासुओं के बीच हुई। बाद में (सन् 1982 से) वही ईश्वरीय कार्य उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कम्पिला गाँव से पहले गुप्त रूप से और अभी प्रत्यक्ष रूप से कलंकीधर रूप से चल रहा है।

 

        जीर्ण-शीर्ण अति प्राचीन फर्रुखाबाद जिले का कम्पिला ग्राम आज मानवता के मस्तिष्क पटल से धूमिल हो चुका है। यह ग्राम वास्तव में ऐतिहासिक व पौराणिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। महाभारत पुराण के हिसाब से यह ग्राम पांचाल देश की राजधानी थी। यहाँ ही पांचाल नरेश ‘द्रुपद’ की पुत्री ‘द्रौपदी’ का जन्म हुआ माना जाता है। जिस ज्ञान यज्ञ कुण्ड से द्रौपदी का जन्म हुआ था उसकी यादगार आज यहाँ वह द्रौपदी कुंड बना हुआ है यज्ञ कुण्ड के समीप ही टीले पर एक आश्रम है जो कपिल मुनि की तपस्या स्थली है। इस कम्पिला ग्राम में ही जैनियों के दो प्रसिद्ध तीर्थ स्थल अर्थात् तेरहवें तीर्थंकर श्री विमलनाथस्वामी का दिगम्बर जैन मंदिर तथा श्वेताम्बर जैन मंदिर भी स्थित है। इनके अलावा भी यहाँ कई पुराने मंदिर हैं, जो इसके ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व को सिद्ध करते हैं। शायद इसलिए परमपिता परमात्मा शिव ने भी विश्व परिवर्तन के अपने गुप्त कार्य के लिए इस कम्पिला ग्राम को ही चुना है।

 

         माउण्ट आबू में परमपिता शिव ने दादा लेखराज ब्रह्मा द्वारा सन् 1951 से 18 जनवरी, न  1969 तक जो ज्ञान मुरलियाँ चलाई थीं, उन्हीं के गुह्यार्थ का स्पष्टीकरण सन् 1976 से प्रत्यक्ष हुए निराकार शिव के अंतिम मनुष्य शरीर रूपी मुकर्रर रथ प्रजापिता ब्रह्मा (जिनका कर्तव्यवाचक नाम शंकर प्रसिद्ध होता है) के द्वारा अब दिया जा रहा है। परमपिता परमात्मा शिव ने दादा लेखराजब्रह्मा द्वारा जो चार चित्र तैयार किए (जिनमें सृष्टि के आदि, मध्य और अंत का सार समाया हुआ है) उनका स्पष्टीकरण भी अब इस मुकर्रर रथ के द्वारा दिया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर त्रिमूर्ति शिव के चित्र में ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के साथ ज्योतिबिन्दु शिव को भी चित्रित किया गया है। हालाँकिइस चित्र में विष्णु एवं शंकर तो वैसे ही हैं जैसा कि हिंदुओं के पौराणिक शास्त्रों में वर्णित है; किंतु ब्रह्मा के स्थान पर दादा लेखराज का चित्र लगाया गया है। इस विषय में ब्रह्माकुमारी संस्था द्वारा यह स्पष्टीकरण दिया जाता है कि परमपिता परमात्मा शिव ने दादा लेखराज के द्वारा नई दुनिया की स्थापना का कार्य प्रारम्भ किया था, इसलिए ब्रह्मा के स्थान पर उन्हें दिखाया गया है; किंतु दादा लेखराज की भाँति साकार शरीर से इस पुरानी आसुरी सृष्टि का विनाश तथा आने वाली दैवी दुनिया की पालना का कार्य किनमनुष्य आत्माओं के द्वारा कराएँगे? इस बात की
जानकारी उनको नहीं है।

 

         लेकिन निराकार शिव के मुकर्रर रथ द्वारा यह स्पष्ट हो चुका है कि निराकार परमपिता शिव किन मनुष्य आत्माओं के द्वारा स्थापना, विनाश व पालना का कार्य करा रहे हैं अर्थात् ब्रह्मा, शंकर व विष्णु की प्रैक्टिकल भूमिका कौन अदा कर रहे हैं, सारे विश्व के माता-पिता कौन हैं जिनके द्वारा परमपिता शिव सारी दुनिया को अविनाशी सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं और जो विश्व महाराजन श्री नारायण व विश्व महारानी श्री लक्ष्मी के रूप में इस सृष्टि पर राज्य करेंगे, आने वाली नई दुनिया ( पैराडाइज़ या जन्नत) कैसी होगी व उस स्वर्गीय दुनिया के पहले पत्ते अर्थात् श्रीकृष्ण व श्रीराधे कौन बनेंगे।

 

        इस प्रकार सन् 1976 से प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा दिए जा रहे ‘एडवांस ज्ञान’ में हमें यह भी बताया गया है कि किस प्रकार 5000 वर्ष के इस सृष्टि रूपी नाटक की शूटिंग या रिहर्सल इस संगमयुग में होती है, इस मनुष्य सृष्टि के बीज कौन हैं, संगमयुग में कैसे सभी धर्मों की बीजरूप व आधारमूर्त आत्माएँ परमपिता शिव से असली ज्ञान लेती हैं तथा द्वापरयुग से अपना-2 धर्म स्थापन करती हैं, मनुष्य आत्माएँ अधिक-से-अधिक 84 जन्म कैसे लेती हैं तथा इन जन्मों में उनके उत्थान व पतन की नींव संगमयुग में कैसे रखी जाती है। उस शास्त्रीय ज्ञान से भी ऊँचे राजयोग अर्थात् राजाओं का राजा बनाने की शिक्षा, शक्ति व मार्गदर्शन स्वयं परमपिता परमात्मा शिव अब सम्मुख दे रहे हैं।

 

        परमपिता परमात्मा शिव का इस धरती पर आने का मुख्य लक्ष्य ही यह है- विश्व धर्मों की सभी देव आत्माओं को एक सूत्र में बाँधकर प्रायः लोप हुए ‘आदि सनातन देवी-देवता धर्म’ की स्थापना करना अर्थात् “मनुष्य से देवता बनाना।’“नर ऐसे कर्म करे जो नर अर्जुन से नारायण बने और नारी द्रौपदी ऐसे कर्म करे जो लक्ष्मी बने।’ इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दो साधन हैं- ईश्वरीय ज्ञान व राजयोग| इस ज्ञान का निःशुल्क एडवांस प्रशिक्षण आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय के कम्पिला स्थित मिनी मधुबन द्वारा दिया जाता है तथा भारतवर्ष में फैले इसके विभिन्न अन्तर्राज्यीय आध्यात्मिक परिवारों तथा गीता पाठशालाओं द्वारा भी दिया जाता है।

 

       विज्ञान के आविर्भाव के साथ ही मनुष्य द्वारा कई दशकों से अधिक धन कमाने की लालसा में रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है। इन कृत्रिम खादों से उत्पादन तो बढ़ा; किंतु प्रकृति का, धरती का प्रदूषण दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला गया और इस प्रदूषित अन्न के सेवन से आज सारी मानवता मानसिक व शारीरिक दोनों रूप से रोगी हो गई है। अतः रासायनिक खाद रहित नैसर्गिक खेती का, ईश्वरीय स्मृति में की गई कृषि का एक अनूठा प्रयोग भगवान शिव द्वारा सृष्टि परिवर्तन की इस प्रक्रिया के एक भाग के रूप में सन् 1990 के दशक के अंतिम चरण में आध्यात्मिक ईश्वरीय विश्वविद्यालय  के सदस्यों द्वारा पंजाब-हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कम्पिला ग्राम में आरम्भ किया गया। जैसा अन्न वैसा मन के सिद्धांत को कार्यरूप देने हेतु प्रदूषणमुक्त फसल उगाने तथा विश्व में पवित्र तरंगों के प्रसार के उद्देश्य से इस ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा उक्त स्थानों पर रासायनिक खाद रहित फसल की पैदावार प्रारम्भ की गई, जिससे उत्पन्न खाद्यान्नों के सेवन से तन-मन दोनों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित किया जा सके व अपने विभिन्न आध्यात्मिक परिवारों में ईश्वरीय ज्ञान एवं सहज राजयोग का अभ्यास किया जा सके।

 

       इस प्रकार इस विद्यालय में आत्मा और प्रकृति दोनों को पवित्र बनाने का कार्य चल रहा है। एक अनूठे प्रयोग के रूप में यहाँ पर विद्यालय के सदस्य ही ईश्वर की याद में कृषि सेवा करते हैं व प्राचीन कालीन आश्रम जीवन की याद को ताजा करते हुए कर्मयोग के अभ्यास द्वारा तपस्या करते हैं। यहाँ के रहवासी ब्रह्म मुहूर्त से अपने दिन का आरम्भ करते हुए ईश्वरीय ज्ञान के श्रवण तथा राजयोग के अभ्यास के पश्चात्ईश्वर की याद में कृषि से जुड़े विभिन्न कार्य करते हैं।

 

       अतः आप भी जीवन में सच्ची सुख-शान्ति व पवित्रता की अनुभूति के लिए तथा भारत देश में चल रहे निराकार परमपिता शिव परमात्मा के गुप्त कार्य की अधिक जानकारी के लिए हमारे स्थानीय आध्यात्मिक परिवार में पधारें। 

 

ओमशांति

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