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geeta jyanti , aivv

 

परिचय (Introduction)

गीता जयंती के इस पावन अवसर पर, हम सभी श्रद्धा और भक्ति के साथ इस दिव्य ज्ञान को नमन करते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जिस गीता को हम इतना पूजते हैं, उसके गहरे रहस्यों को हम सच में जानते हैं? श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक उपदेश ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन की सभी समस्याओं का दिव्य समाधान और जीने की कला सिखाने वाला एक मार्गदर्शक है। आज, हम गीता के कुछ गहरे, अनसुने रहस्यों को उजागर करेंगे, जो हमारे जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं।

1. श्रीमद्भगवद्गीता – नाम और दाता का रहस्य

‘श्रीमद्भगवद्गीता’ नाम अपने आप में एक गहरा रहस्य समेटे हुए है। ‘गीता’ का अर्थ है ‘गीत’। और गीत गाने के लिए मुख की आवश्यकता होती है। ‘भगवद्’ शब्द और ग्रंथ में इस्तेमाल हुआ ‘भगवानुवाच’ वाक्यांश यह सिद्ध करता है कि स्वयं भगवान ने अपने कमल-मुख से इस ज्ञान-गीत को गाया है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शब्द है ‘श्रीमत्‘। यहाँ ‘श्री’ का अर्थ है ‘श्रेष्ठ’ और ‘मत्’ का अर्थ है ‘मत’ या ‘बुद्धि’। इस प्रकार ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का अर्थ है – स्वयं भगवान द्वारा पूरी मानव जाति के कल्याण के लिए दिया गया सर्वश्रेष्ठ मत। यह किसी भी मनुष्य की बुद्धि से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, और इसीलिए यह सभी शास्त्रों में शिरोमणि है।

2. गीता ज्ञान से मिलने वाली अलौकिक प्राप्तियाँ

गीता का ज्ञान मानव जीवन के हर पहलू को रूपांतरित कर सकता है। इससे मिलने वाली प्राप्तियाँ अलौकिक हैं।

1. व्यक्तिगत स्तर पर

  • स्थिर बुद्धि: सुख-दुःख में समान रहना और मोह, भय, और क्रोध से मुक्ति। यह जीवन के उतार-चढ़ाव में हमें स्थिर रखता है।
  • सच्ची मन की शांति: अभ्यास और वैराग्य से चंचल मन पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है, जिससे सच्ची शांति मिलती है।
  • आत्म-विश्वास: गीता हमें विश्वास दिलाती है कि कैसा भी पतित व्यक्ति श्रेष्ठ चरित्रवान बन सकता है।
  • नशों से मुक्ति: यह ज्ञान हमें इन्द्रियों के क्षणिक सुख (राजसी सुख), जो अंत में विष के समान होता है, को त्यागकर अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति कराता है।

2.धार्मिक स्तर पर

  • पापों का नाश: गीता के अनुसार, ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है। यह ज्ञान रूपी गंगा मन की मैल को भी धो देती है।
  • कर्मकांड से मुक्ति: ईश्वर को केवल ज्ञान से ही जाना और पाया जा सकता है, न कि कर्मकांड, तप, या दान से।
  • जीवन-मुक्ति (मोक्ष): गीता द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर मनुष्य कर्मों के बंधन से मुक्त होकर संसार सागर से पार जा सकता है।

3. सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर

गीता हमें सिखाती है कि हम सभी के प्रति एक समान भाव रखें, जिससे सामाजिक भेदभाव और लड़ाई-झगड़े समाप्त हों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ (पूरी दुनिया एक परिवार है) की भावना पर आधारित एक सुखी समाज का निर्माण हो। यह राज करने की श्रेष्ठ कला भी सिखाती है, जिससे ‘राम-राज्य‘ की स्थापना होती है, जहाँ किसी को कोई दुःख नहीं होता। इस प्रकार, गीता शासन के लिए एक उत्कृष्ट राष्ट्रीय संविधान है।

3. इतनी महान गीता के होते हुए भी आज हमारी दुर्दशा क्यों?

इतनी सारी प्राप्तियों के बावजूद, सदियों से गीता को पढ़ने, पूजने और यज्ञ करने के बाद भी, क्या आज समाज में वह दिव्य प्रभाव दिखाई देता है? आज नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है, आपसी लड़ाई-झगड़े और असमानता बढ़ रही है। ऐसा क्यों है?

इसका केवल एक ही कारण है: दुनिया को गीता ज्ञान के दाता की सच्ची पहचान नहीं है। यह गीता का सबसे बड़ा रहस्य है, जिसे अब हम उजागर करेंगे।

4. गीता का पहला और अंतिम पाठ

भगवान ने अपना परिचय देने से पहले अर्जुन को पहला पाठ दिया – आत्मा का ज्ञान। ऐसा क्यों? क्योंकि अर्जुन का दुःख शरीर-अभिमान और रिश्तेदारों के प्रति मोह के कारण था। पहला पाठ उसे यह एहसास दिलाना था कि, “तुम एक अविनाशी आत्मा हो, यह नश्वर शरीर नहीं।”

और गीता का अंतिम पाठ है इस आत्म-ज्ञान से मिलने वाली प्राप्ति: ‘जितात्मा‘ बनना, यानी मोह पर जीत पाना और स्वयं (आत्मा) और पिता (परमात्मा) के प्रति जागरूक होना।

5. आध्यात्मिक शक्ति – आज की सबसे बड़ी ज़रूरत

आज मनुष्य के पास शारीरिक शक्ति, धन और प्रभाव सब कुछ है, फिर भी वह अशांत और दुःखी है। इसका कारण है आध्यात्मिक शक्ति, यानी मन की शक्ति का अभाव। भटकते हुए मन ने हमारी इच्छा-शक्ति को कमज़ोर कर दिया है।

भगवान आत्मा-अभिमानी स्थिति में स्थिर होने की सहज विधि सिखाते हैं। इससे आंतरिक शक्ति का निर्माण होता है, जो हमें निरंतर शांति, आत्मविश्वास और किसी भी परिस्थिति का सामना करने की शक्ति प्रदान करती है।

6. गीता के भगवान की सच्ची पहचान – सबसे बड़ा रहस्य

यह इस ज्ञान का सबसे गहरा रहस्य है। आइए इसे चरण-दर-चरण समझते हैं।

1. प्रचलित मान्यता और एक गहरा प्रश्न

प्रचलित मान्यता यह है कि श्री कृष्ण गीता के भगवान हैं। लेकिन क्या गीता में भगवान के बारे में दिए गए वर्णन श्री कृष्ण पर सिद्ध होते हैं?

2. गीता के अनुसार भगवान का स्वरूप

गीता में भगवान के स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है:

  1. निराकार ज्योति-बिंदु: उन्हें ‘अणोरणीयान्’ यानी अणु से भी सूक्ष्म कहा गया है।
  2. अजन्मा: वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हैं।
  3. महाकाल: वह काल के भी काल हैं, यानी मृत्यु की भी मृत्यु।
  4. शिव: उनका गुणात्मक नाम शिव है, जिसका अर्थ है ‘कल्याणकारी’।

3. तो फिर कौन हैं गीता के भगवान?

आइए हम गीता में दिए गए प्रमाणों के आधार पर इस रहस्य को उजागर करें।

गीता कहती है कि भगवान अजन्मा हैं और महाकाल (काल के भी काल) हैं। अब श्री कृष्ण पर विचार करें। शास्त्रों में उनके भौतिक जन्म का स्पष्ट वर्णन है और उनकी मृत्यु का भी उल्लेख है। जो स्वयं जन्म-मृत्यु के चक्र में हो, वह अजन्मा या महाकाल कैसे हो सकता है? यह एक सीधा विरोधाभास है।

इसके अलावा, गीता में भगवान को आदिदेव, महाकाल और रुद्र जैसी उपाधियों से संबोधित किया गया है। वेदों में भी ‘ओम नमो भगवते रुद्राय’ का उल्लेख है। अब विचार करें कि इन नामों से जुड़े मंदिर किसके हैं? उज्जैन में महाकालेश्वर, जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ, चेन्नई में आदिश्वर—ये सभी मंदिर महादेव शंकर को समर्पित हैं, श्री कृष्ण को नहीं।

निराकार भगवान शिव को ज्ञान देने के लिए एक शरीर की आवश्यकता होती है। इसलिए, वह एक साधारण मनुष्य के तन का आधार लेते हैं।

इन सभी प्रमाणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि गीता के सच्चे ज्ञान दाता निराकार शिव और उनके साकार माध्यम शंकर का संयुक्त रूप हैं। यह संयुक्त स्वरूप, ‘शिव शंकर बाप‘, ही गीता का भगवान है।

7. काल, स्थान और रथ का अनकहा सत्य

गीता के ज्ञान दिए जाने के समय, स्थान और माध्यम को लेकर भी कई भ्रांतियां हैं।

  • काल (Time): यह ज्ञान द्वापर युग में नहीं दिया गया था। स्वयं विचार करें: यदि भगवान ने द्वापर युग में ही अधर्म का विनाश कर दिया होता, तो उसके बाद स्वर्ण युग के बजाय घोर कलियुग क्यों आया? गीता में भगवान कहते हैं कि वे कल्प के अंत में आते हैं, और कल्प का अंत कलियुग का अंत ही होता है। अतः यह ज्ञान अभी, कलियुग के अंत में दिया जा रहा है।
  • स्थान (Place): ‘कुरुक्षेत्र’ कोई सीमित युद्ध-भूमि नहीं है। ‘कुरु’ का अर्थ है ‘कर्म’ और ‘क्षेत्र’ का अर्थ है ‘स्थान’। इस प्रकार, कुरुक्षेत्र का अर्थ है ‘कर्म-क्षेत्र’, जो कि संपूर्ण भारत भूमि है। यह धर्म-क्षेत्र भी है जहाँ आज धर्म के नाम पर अनेक लड़ाइयाँ हो रही हैं।
  • रथ (Chariot): यह कोई भौतिक रथ नहीं, बल्कि मनुष्य का शरीर है। जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है, “यह शरीर ही रथ है”, जिस पर आत्मा रूपी सवार विराजमान है। भगवान शिव, शंकर के रथ-समान शरीर में प्रवेश कर यह ज्ञान दे रहे हैं।

8. गीता के नाम पर फैली अन्य भ्रांतियाँ

गीता के नाम पर कुछ और भी गलत धारणाएँ प्रचलित हैं, जिनकी सच्चाई जानना आवश्यक है।

  • क्या भगवान सर्वव्यापी हैं? नहीं। गीता में स्पष्ट कहा गया है: “सब जीव मुझमें हैं, लेकिन मैं सब में नहीं हूँ।” जैसे सभी पत्ते-टहनियाँ बीज में समाये हैं, पर बीज सब में नहीं है। सर्वव्यापकता की मान्यता मन को भटकाती है, जबकि यह समझना कि भगवान एक ही रूप में उपस्थित हैं, मन को एकाग्र कर सच्ची शांति प्रदान करता है।
  • क्या आत्मा सो परमात्मा? यह भी गलत है। परमात्मा केवल एक है, जबकि आत्माएं अनेक हैं। हम आत्माओं के लिए ‘पापी आत्मा’ या ‘पुण्यात्मा’ जैसे शब्द प्रयोग करते हैं, लेकिन ‘पापी परमात्मा’ कभी नहीं कहते। इससे सिद्ध होता है कि दोनों अलग हैं।
  • क्या मनुष्य आत्मा 84 लाख योनियों में जाती है? गीता में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है। मनुष्य आत्मा केवल मनुष्य योनि में ही जन्म लेती है। जैसा बीज, वैसा फल। आम का बीज आम का ही पेड़ उगाएगा। उसी प्रकार, मनुष्य आत्मा केवल मनुष्य जन्म ही लेती है।

9. वर्तमान समय के लिए गीता का दिव्य संदेश और निष्कर्ष

हम सभी के लिए शुभ सन्देश यह है कि गीता के ज्ञान दाता, शिव शंकर बाप, इस धरती पर पहले ही अवतरित हो चुके हैं और एक बार फिर गीता का सच्चा ज्ञान देकर मनुष्यों को देवता बनाने के लिए ‘रुद्र ज्ञान यज्ञ’ की स्थापना कर रहे हैं।

आइए आज के ज्ञान के मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में जानें:

  1. हम यह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि एक अविनाशी आत्मा हैं।
  2. निराकार शिव और साकार शंकर का संयुक्त रूप ‘शिव शंकर बाप’ ही गीता का भगवान है, और वह इस धरती पर अवतरित हो चुके हैं।
  3. गीता का ज्ञान द्वापर युग में नहीं, बल्कि अभी कलियुग के अंत में, भारत की कर्म-भूमि पर दिया जा रहा है।
  4. भगवान सर्वव्यापी नहीं हैं, आत्मा परमात्मा नहीं है, और मनुष्य आत्मा 84 लाख योनियों में नहीं जाती।
  5. शिव शंकर बाप द्वारा 1936 में स्थापित ‘रुद्र ज्ञान यज्ञ’ आज भी चल रहा है, जो मनुष्य से देवता बनाने का कार्य कर रहा है।

दुःखमय कलियुग अब समाप्त होने वाला है और सुखमय सतयुग आने वाला है। पिता सभी को ज्ञान और प्रेम के एक सूत्र में बांधने के लिए आए हैं। यह ज्ञान सहज, नि:शुल्क है और इसे अपने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी धारण किया जा सकता है।

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