कहते हैं समाज ने तरक्की की, पर बँट गईं जातियाँ। कहते हैं आस्था ने तरक्की की, पर हो गया धर्मों का बँटवारा। विज्ञान आगे बढ़ा तो बनी विस्फोटक शक्ति, और शिक्षा प्रणाली उन्नत हुई तो बढ़ गई बेरोजगारी। सुरक्षा के लिए पुलिस बनी तो अपराध बढ़ गए, और महिलाओं को समान दर्जा मिला तो उनका शोषण भी बढ़ गया। चिकित्सा पद्धति में क्रांति आई तो दवाइयों के दुष्प्रभावों की एक लंबी सूची तैयार हो गई। यह सब देखकर मन में एक गहरा सवाल उठता है: यह तरक्की है या गिरावट? उत्थान है या पतन?
इसी गिरावट को रोकने के लिए जब आध्यात्मिकता के आधार पर आध्यात्मिक विश्व विद्यालय (AIVV) ने कदम आगे बढ़ाया, तो उन कदमों को जकड़ने के लिए सरकारी नियमों रूपी बेड़ियाँ लेकर कानून के हाथ भी आगे बढ़े। आज यह विद्यालय दुनियाभर में चर्चा का विषय बन चुका है और लोग इसकी सच्चाई जानना चाहते हैं। कुछ प्रमुख प्रश्न इस प्रकार हैं:
चलिए, आज दुनियाभर के लोगों के अनुभवों से जानते हैं कि हकीकत क्या है।
आध्यात्मिक विश्व विद्यालय खुद को एक संस्था नहीं, बल्कि एक अनोखा परिवार मानता है। जैसा कि श्रीमती मीता दूधरेजिया बताती हैं, इसका लक्ष्य है “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्” अर्थात सभी सुखी रहें, सभी निरोगी रहें, सबका कल्याण हो और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
यहाँ का जीवन एक परिवार की तरह ही चलता है। सभी मिल-जुलकर एक शिवबाबा की मुरली के आधार पर कार्य करते हैं। डॉ. इंदुमती भुते के अनुसार, यहाँ कोई अलग से मैनेजमेंट करने वाला नहीं है; जिस कन्या में जो कला होती है, वह दूसरों को सिखा देती है। अलग-अलग जाति, धर्म और स्थानों से आई कन्याएँ बिना किसी भेदभाव के रहती हैं। श्रीमती स्वाति तोमर और फ्रांस की श्रीमती मैरी जोएल फोले बताती हैं कि सभी का खाना एक ही रसोई में बनता है और सब एक परिवार की तरह साथ में खाते हैं। यहाँ का रहन-सहन और पहनावा भी भारतीय संस्कृति पर आधारित है। जैसा कि श्रीमती फोले कहती हैं, “जगन्नाथ भण्डारे की पूर्वी सभ्यता जो सादा जीवन उंच विचार को मान्यता देती है उसी पर ये विद्यालय चलता है।“
यह विद्यालय भारत की प्राचीन ‘गुरुकुल व्यवस्था’ की याद दिलाता है। श्री बनिब्रत मिश्रा के अनुसार, जैसे गुरुकुल में गुरु निःशुल्क शिक्षा देते थे, वैसे ही यहाँ भी ईश्वरीय ज्ञान निःशुल्क दिया जाता है। यहाँ मुख्य रूप से भगवद्गीता का ज्ञान दिया जाता है, जिसे, श्रीमती सिंह के अनुसार, सभी धर्मों ने माना है।
इस ज्ञान को केवल भारत तक सीमित न रखकर पूरे विश्व तक पहुँचाने का लक्ष्य है। इसीलिए, जैसा कि श्रीमती सोनी सिंघल और रूस की श्रीमती एलेना बताती हैं, गीता का ज्ञान हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में सिखाया जाता है। यह शिक्षा प्रणाली आधुनिक शिक्षा से बिल्कुल अलग है। श्री संतोष गर्ग एक तीखा सवाल पूछते हैं, “आज गांव के साधारण व्यक्ति में ज्यादा विनय देखने में आता है या किसी बड़ी डिग्री प्राप्त कर बड़ी पोस्ट पर बैठे व्यक्ति में?” आज की शिक्षा जहाँ अहंकार को जन्म देती है, वहीं यह विद्यालय, जैसा कि श्रीमती रिचा रंगत अनुभव करती हैं, विनय और अच्छे संस्कार देने पर केंद्रित है। वे बताती हैं कि यहाँ बच्चों में संस्कार भरने के लिए धार्मिक कथाओं का अध्ययन कराया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे जीजा बाई ने शिवाजी को और जयवंता बाई ने महाराणा प्रताप को शास्त्रों का ज्ञान सुनाकर गढ़ा था।
विडंबना यह है कि जिस गिरावट को यह विद्यालय सुधारने का प्रयास कर रहा है, उसी सांसारिक व्यवस्था के नियम इसे अपनी सीमाओं में बाँधना चाहते हैं। सरकार द्वारा इस विद्यालय पर रजिस्ट्रेशन के लिए लगातार दबाव डाला जा रहा है। विद्यालय का पक्ष सांसारिक कानूनों के विरोध में नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक समझ पर आधारित है, जिसके अनुसार कुछ चीजें मानवीय पंजीकरण की सीमाओं से परे हैं:
यहाँ आत्मनिर्भरता केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक साधना है। धरती माँ के गर्भ से उपजा केमिकल-रहित शुद्ध अन्न और अपनी ही गौशाला का सात्विक दूध, तन और मन दोनों को पवित्र करने का माध्यम बनता है। श्री जसपाल के अनुसार, यह विद्यालय अपनी ऑर्गेनिक खेती करके सभी को शुद्ध अनाज खिलाता है। श्रीमती राधिका बताती हैं कि यहाँ अपनी ही गायों का शुद्ध दूध पिलाया जाता है और सभी को पौष्टिक आहार मिलता है।
यहाँ का भंडार गृह भी सभी के सहयोग से सुचारु रूप से चलता है, जिसमें यहाँ रहने वाली बहनें और आने वाले जिज्ञासु भी अपनी क्षमता अनुसार सहयोग देते हैं। इन सभी सांसारिक कार्यों को करते हुए भी वे अपने आध्यात्मिक लक्ष्य से नहीं भटकते। डॉ. चल्ला सत्य वर प्रसाद के अनुसार, सभी सदस्य ब्रह्म मुहूर्त में जागकर सारे विश्व में सुख और शांति के वाइब्रेशन फैलाने का कार्य करते हैं।
संक्षेप में, आध्यात्मिक विश्व विद्यालय एक ऐसी जगह है जहाँ जाति, धर्म और देश की सीमाओं से परे “वसुधैव कुटुम्बकम्” का नारा हकीकत में जिया जा रहा है। जैसा कि श्री शंकरन कहते हैं, जहाँ दुनिया शांति के लिए केवल सम्मेलन कर रही है, वहीं यह विद्यालय शांति से रहकर विश्व शांति लाने का एक व्यावहारिक प्रयास कर रहा है। लेकिन विडंबना देखिए, “जो शांति से एकजुट हो मिल-जुलकर विश्व में शांति लाने का प्रयास कर रहे हैं, उनकी शांति भंग करने के लिए सरकार के नुमाइंदे और मीडिया उतारू हैं।” यह अनुभव हमें एक गहरे चिंतन के लिए प्रेरित करता है।
क्या आज की भागदौड़ भरी और विभाजित दुनिया को ऐसे और शांतिपूर्ण आध्यात्मिक परिवारों की आवश्यकता नहीं है?
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