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Toggleधर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाः च एव किम् अकुर्वत संजय ।।
श्रीमद्भगवद्गीता का पहला श्लोक, “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे…”, हममें से बहुतों ने सुना है, कईयों को तो यह कंठस्थ भी होगा। यह श्लोक हमें तुरंत एक प्राचीन युद्धभूमि की याद दिलाता है, जहाँ दो विशाल सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार खड़ी थीं। यह एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन लगता है, जो सदियों पहले घटित हुई थी।
पर क्या आपने कभी यह सोचा है कि यह युद्धक्षेत्र कोई बीता हुआ इतिहास नहीं, बल्कि आज की हमारी दुनिया और हमारे अपने मन के अंदर का संघर्ष है? यह व्याख्या हमें चौंका देती है क्योंकि यह एक प्राचीन कहानी को हमारे समय की सीधी टिप्पणी बना देती है। आइये, हम साथ मिलकर इस श्लोक के उस गहरे, प्रतीकात्मक रहस्य को समझें जो हमारे आधुनिक जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
जब हम “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे” सुनते हैं, तो हम एक भौगोलिक स्थान की कल्पना करते हैं। पर यहाँ गीता हमें एक गहरा रहस्य समझाती है। यह व्याख्या आज के तमोगुणी तांत्रिक कलयुग के अंत समय के संदर्भ में है, जिसमें हम सब जी रहे हैं।
धर्मक्षेत्रे का अर्थ है “धर्मों का युद्ध क्षेत्र”। यह आज के संसार का प्रतीक है, जहाँ अनगिनत धर्म, मार्ग, पंथ और संप्रदाय एक-दूसरे के साथ वैचारिक संघर्ष कर रहे हैं। हर कोई अपनी मान्यताओं को ही श्रेष्ठ साबित करने में लगा है।
और इसी वैचारिक युद्ध का प्रकटीकरण है कुरुक्षेत्रे, यानी “कर्मकांडों का कर्मक्षेत्र”। जब अलग-अलग विचारधाराओं में टकराव होता है, तो उसका असर उनके कर्मों में दिखता है। विभिन्न धर्मों के आडंबर युक्त कर्मकांडों और बाहरी दिखावे के कारण ही दुनिया में असली संघर्ष और लड़ाई-झगड़े होते हैं। इस प्रकार, गीता का युद्धक्षेत्र कोई ऐतिहासिक मैदान नहीं, बल्कि वैचारिक और धार्मिक संघर्षों से भरी आज की दुनिया ही है।
श्लोक की शुरुआत धृतराष्ट्र के प्रश्न से होती है। वे केवल एक नेत्रहीन राजा नहीं, बल्कि आज के उन “पूंजीवादी राजाओं” या सत्ताधारियों का प्रतीक हैं जो धन, मान-मर्तबा और जनबल के अहंकार में पूरी तरह से अज्ञान अंधकार में डूब चुके हैं।
यह अंधापन शारीरिक नहीं, बल्कि विवेक का है। यह उस सत्ता का प्रतीक है जो अन्याय से एकत्रित हुए धन पर आधारित है और इसीलिए अवैध है। वे सत्य और धर्म के मार्ग को देख ही नहीं पाते। स्रोत इस अन्याय को आज के संदर्भ में इस तरह समझाता है:
पांडवों की राज्य संपत्ति को नोटों से वोटों वाली प्रजातंत्र सरकार द्वारा हड़प लिया है।
इस दृष्टि से, धृतराष्ट्र कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि हर वह व्यवस्था बन जाते हैं जो अन्याय से सत्ता पर काबिज है। हम अपने आस-पास ऐसी कितनी ही सत्ताएं देखते हैं, जो धन और पद के अहंकार में सत्य से मुँह मोड़ लेती हैं।
यह युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच नहीं, बल्कि आज दुनिया में मौजूद दो अलग-अलग मानसिकताओं के बीच है। यह एक शक्तिशाली, अधर्मी बहुमत और एक धर्मपरायण अल्पसंख्यक के बीच का संघर्ष है।
एक तरफ धृतराष्ट्र के पुत्र (मामकाः) हैं, यानी कौरव। वे उस मानसिकता के प्रतीक हैं जिसका मूल कारण देह अधर्मा है—अर्थात् ‘मैं यह शरीर हूँ’ का झूठा विश्वास और उससे उत्पन्न होने वाले अधर्मी कर्म। इसी गहरी पकड़ के कारण वे स्वभाव से हठी (जिद्दी) हो जाते हैं। जब कोई उनकी बात नहीं मानता, तो उनकी बुद्धि तामसी (अंधकारपूर्ण) हो जाती है और वे क्रोधी बनकर अपनी बात मनवाने के लिए बाहुबल की हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।
वहीं दूसरी ओर पांडव (पाण्डवाः) हैं। वे उस अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतीक हैं जो धर्म के सच्चे, परमात्म-मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, पर उनकी rightful “राज्य सत्ता” इस अधर्मी बहुमत द्वारा छीन ली गई है। यह व्याख्या युद्ध को हमारे समाज और हमारे भीतर ले आती है, जहाँ धर्म और अधर्म का संघर्ष हर पल चल रहा है।
भगवद्गीता अपने पहले श्लोक से ही यह स्पष्ट कर देती है कि यह केवल एक ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक दर्पण है, जो हमें हमारे समाज और हमारे अपने मन का सच दिखाता है। यह हमें सिखाती है कि असली कुरुक्षेत्र बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर और हमारे समाज में मौजूद है, जहाँ सही और गलत की लड़ाई हर दिन लड़ी जाती है।
इस नई समझ की रोशनी में, क्या आप अपने जीवन के ‘कुरुक्षेत्र’ को और उसमें अपनी भूमिका को पहचान पा रहे हैं?
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{आध्यात्मिक ज्ञान }
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