मनुष्य हमेशा से अपनी नियति, दुनिया के अंत और भविष्य के रहस्यों को जानने के लिए उत्सुक रहा है। लेकिन क्या हो अगर भविष्य कोई अनसुलझी पहेली न हो, बल्कि एक पूर्वनिर्धारित पटकथा हो? प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान इसी चौंकाने वाले सत्य का अनावरण करता है। यह बताता है कि ब्रह्मांड एक दिव्य नाटक का मंचन कर रहा है, जिसकी पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी है और अब हम सब इसके अंतिम चरण के साक्षी बन रहे हैं।
यह कोई साधारण भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक प्रवचन से निकले निष्कर्ष हैं। आइए, उन पाँच महत्वपूर्ण रहस्यों को जानें जो इस महापरिवर्तन की निर्धारित कहानी को उजागर करते हैं।
आमतौर पर यह माना जाता है कि ईश्वर या मोक्ष का मार्ग सदा के लिए खुला रहता है। परन्तु, आध्यात्मिक ज्ञान एक कठोर सत्य प्रस्तुत करता है: हर महान आध्यात्मिक अवसर की एक अंतिम तिथि होती है, जिसके बाद “टू लेट” का बोर्ड लग जाता है।
उदाहरण के लिए, वर्ष 1976 को ‘नर से नारायण’ और ‘नारी से लक्ष्मी’ बनने के अवसर की अंतिम तिथि के रूप में निर्धारित किया गया था। ठीक इसी तरह, 2018 के बाद आठ सर्वोच्च आत्माओं (आठ की माला) के मुख्य समूह में शामिल होने का अवसर भी समाप्त हो चुका है। इसका गहरा अर्थ यह है कि आध्यात्मिक प्रगति के अवसर अनंत नहीं हैं, बल्कि वे एक सख्त ब्रह्मांडीय समय-सारिणी से बंधे हैं। यह धारणा कर्म और कृपा के प्रचलित सिद्धांतों को चुनौती देती है, यह सुझाव देते हुए कि ब्रह्मांडीय समय सारिणी व्यक्तिगत इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण है।
“…अब ये फाइनल पेपर फिर होने वाला है 18 के बाद से डिक्लेअ होगा जो माला रूपी संगठन में आने वाले होंगे आठ वो आ जाएंगे उसके बाद टू लेट का बोर्ड कोई कितना भी पुरुषार्थ करे लेकिन आठ की माला में फिर नहीं आ सकेगा।”
जब एक युग समाप्त होता है और दूसरे की शुरुआत होती है, तो उस परिवर्तन की नींव कौन रखता है? आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार, यह कार्य लाखों-करोड़ों लोग नहीं, बल्कि केवल नौ “बीज रूप आत्माएं” करती हैं। ये आत्माएं ‘संगम युग’ (युगों के परिवर्तन का वर्तमान समय) के दौरान नई दिव्य दुनिया की नींव बनती हैं।
इन्हीं नौ आत्माओं की पूजा नौ ग्रहों या अष्ट देव और उनके मुखिया के रूप में की जाती है। इन आत्माओं को अपनी संपूर्णता तक पहुंचने के लिए 1976 से लगभग 40-50 वर्षों का समय दिया गया। यह विचार आधुनिक लोकतांत्रिक और सामूहिक आंदोलनों की धारणा के बिल्कुल विपरीत है। यह बताता है कि ब्रह्मांडीय परिवर्तन जन-समूह द्वारा नहीं, बल्कि कुछ चुनी हुई, बीज-रूपी आत्माओं द्वारा संचालित होता है, जिनकी भूमिका पहले से ही तय है।
यह ईश्वरीय राज्य इन नौ बीज आत्माओं (जिनमें 8 देव और 1 मुखिया शामिल हैं) से शुरू होता है, जो पहले 108 आत्माओं की एक ‘राजधानी’ का निर्माण करते हैं, और अंततः 16,108 आत्माओं के एक पूर्ण राज-परिवार के रूप में विस्तारित होते हैं।
इस आने वाले आध्यात्मिक राज्य की शक्ति की तुलना आज के अमेरिका से की गई है। जैसे आज दुनिया अमेरिका को एक ऐसी महाशक्ति मानती है जिससे कोई टकराने से डरता है, वैसे ही यह ईश्वरीय राज्य दुनिया के सामने एक निर्विवाद आध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में घोषित हो जाएगा। इसके बाद, दुनिया की मौजूदा धर्म सत्ताएं और राज्य सत्ताएं इसका विरोध करेंगी, लेकिन वे सभी अंततः हार जाएंगी। इस संघर्ष में उनकी जीत निश्चित है क्योंकि, जैसा कि आध्यात्मिक ज्ञान बताता है, संसार रूपी जंगल में केवल ‘शेर’ (शंकर का प्रतीक) ही सत्य है, और उसकी ‘ज्ञान की दहाड़’ के सामने कोई नहीं टिक सकता।
“जैसे आज दुनिया वालों को पता लग गया कि सारी दुनिया के बीच कौन सा देश है जो महाशक्ति के रूप में माना जाता है सब उससे टकराने में डरते हैं कौन है अमेरिका ऐसे ही 10 वर्षों में माना 40 से लेकर 50 वर्ष पूरे होते पूरी राजधानी 108 बच्चों की स्थापन हो जावेगी।”
पुरानी दुनिया के विनाश में जगत पिता (शंकर) की मुख्य सहयोगी शक्ति जगत माता (जगदंबा) हैं, जो अपना तामसी रूप, यानी महाकाली का रूप धारण करती हैं। यहाँ एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है, जिसे एक शक्तिशाली रूपक के माध्यम से समझाया गया है।
महाकाली की तुलना एक काली गाय (काली गौ) से की गई है, जो सर्वोत्तम दूध (कामनाएं पूरी करने वाली) देती है, लेकिन साथ ही लात भी मारती है। जगत पिता शंकर उसकी “लातें” चुपचाप सहन करते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि वे जानते हैं कि वह उनकी सहयोगी शक्ति है और उनकी दिव्य योजना में विनाश की अपनी आवश्यक भूमिका निभा रही है। यह रूपक हमें सिखाता है कि जो प्रक्रियाएं सतह पर विनाशकारी या दर्दनाक दिखती हैं, वे अक्सर एक बड़े दिव्य उद्देश्य को पूरा कर रही होती हैं।
“दूध देने वाली गाय अगर लात भी मारती है तो सहन कर लेना चाहिए या गोली से मार देना चाहिए हैं सहन कर लेना चाहिए तो शंकर जी क्या करते हैं ये जगत पिता क्या करते हैं वो काली गौ लात मारती है और चुपचाप आप पड़े रहते हैं क्यों ऐसी क्या गरज पड़ गई वो जानते हैं कि मेरा जो काम है वो मेरी सहयोगिनी शक्ति कर रही है।”
एक अंतिम विचार
ये रहस्य उजागर करते हैं कि हमारी आंखों के सामने एक भव्य और छिपा हुआ ब्रह्मांडीय नाटक अपनी पूर्वनिर्धारित पटकथा के अनुसार चल रहा है। यह महापरिवर्तन कुछ चुनी हुई आत्माओं के नेतृत्व में हो रहा है और अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है। अवसर सीमित हैं, भूमिकाएं तय हैं, और सृजन एवं विनाश की प्रक्रियाएं साथ-साथ चल रही हैं।
यह सब जानने के बाद एक ही प्रश्न बचता है: अगर यह ब्रह्मांडीय रिहर्सल इसी समय हो रही है, तो इस महानाटक में आपकी भूमिका क्या है?
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