दीपावली [ Diwali ] का पर्व आते ही चेतना में अनगिनत दीयों की झिलमिलाती रोशनी, उत्सव का उल्लास और आनंद की लहरें उठने लगती हैं। यह हमारे बाहरी संसार को प्रकाश से भर देने का एक पवित्र अवसर है। पर क्या हमने कभी इस परंपरा की सतह के नीचे झाँका है? क्या हो अगर यह प्रकाश का महान उत्सव, वास्तव में हमारे भीतर मनाए जाने के लिए एक गुप्त निमंत्रण हो? क्या हो अगर बाहर जलता हर दीया केवल एक प्रतीक हो, जो हमें अपने अंदर छिपी एक गहरी, शाश्वत ज्योति को खोजने और प्रज्वलित करने की याद दिलाता हो?
प्राचीन आध्यात्मिक ज्ञान के रहस्य इसी ओर इशारा करते हैं। वे दीपावली के बाहरी समारोहों के भीतर छिपे एक गहन अर्थ को उजागर करते हैं—एक आंतरिक रूपांतरण का पर्व, आत्म-बोध का उत्सव, और एक ऐसी चेतना को जगाने का संकल्प जो किसी भी अंधकार से प्रभावित नहीं हो सकती।
यह लेख आपको पांच ऐसे शक्तिशाली आध्यात्मिक सत्यों से परिचित कराएगा जो इन्हीं गहन शिक्षाओं के गर्भ में छिपे हैं। ये सत्य इस दीपावली [ Diwali ] आपके भीतर एक ऐसी अखंड ज्योति जलाने की कुंजी बन सकते हैं, जो फिर कभी नहीं बुझती।
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आध्यात्मिक यात्रा का सबसे पहला और गहरा सत्य यह स्वीकार करना है कि हमारी वास्तविक पहचान यह पांच तत्वों का शरीर नहीं है। हम एक आत्मा हैं—एक चैतन्य, अविनाशी ज्योति। कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे दीपक हैं जिसकी लौ कभी बुझ नहीं सकती। आपका बाहरी शरीर, आपकी परिस्थितियाँ, आपकी उम्र, यह सब बदल सकता है, लेकिन आपके भीतर जल रही वह चेतना की ज्योति शाश्वत और अखंड है।
यह विचार केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि असीम रूप से सशक्त है। इसका अर्थ है कि हमारा मूल स्वरूप शुद्ध, शांत और शक्तिशाली है, चाहे बाहरी दुनिया में कोई भी उथल-पुथल क्यों न हो। असफलता, हानि, या मृत्यु का भय केवल शरीर के स्तर पर अनुभव होता है। जब हम अपनी पहचान इस अविनाशी ज्योति से जोड़ लेते हैं, तो हम इन अस्थायी अनुभवों के साक्षी बन जाते हैं, उनसे प्रभावित हुए बिना। यह ज्ञान हमें हर परिस्थिति में निर्भय और स्थिर रहने की शक्ति देता है, क्योंकि जो हमारा सार है, उसे कोई नष्ट नहीं कर सकता।
“आप के जड़ चित्रों के आगे भी ‘अखन्ड ज्योति’ जगाते हैं~ चैतन्य अखन्ड ज्योति का ही वह यादगार है तो चैतन्य दीपक बुझ सकते हैं? क्या बुझी हुई ज्योति अच्छी लगती है?”
और इस शाश्वत दीपक को और भी प्रज्वलित करने का तरीका है अपने पुराने संस्कारों की आहुति देना…
दीपावली [ Diwali ] पर हम अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए आतिशबाजी करते हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे बड़ी और सच्ची आतिशबाजी हमारे भीतर घटित होती है। असली उत्सव अपने पुराने और नकारात्मक स्वभाव, आदतों और विचारों (पुराने संस्कार और स्वभाव) को ज्ञान और ईश्वरीय स्मृति की दिव्य अग्नि में ‘स्वाहा’ कर देना है। यह एक गहरा आध्यात्मिक यज्ञ है, एक पवित्र आहुति।
इस प्रक्रिया को ‘मरजीवा’ बनना कहा गया है—अर्थात् पुरानी दुनिया और पुराने ‘मैं’ के लिए मर जाना, जिसे आधुनिक भाषा में “अहंकार-मृत्यु” (ego-death) भी कहते हैं, ताकि एक नई, दिव्य चेतना में हमारा पुनर्जन्म हो सके। यह कुछ छोड़ने या त्यागने का कार्य नहीं, बल्कि अपने भीतर कुछ उच्च, शुद्ध और दिव्य के लिए स्थान बनाने का उत्सव है। यह केवल व्यक्तिगत शुद्धि का कार्य नहीं है; यह एक संगठित, सामूहिक प्रयास है जो विश्व-परिवर्तन के महान कार्य में हमारा योगदान बनता है। जब हम अपने भीतर के अंधकार को मिटाते हैं, तो हम ब्रह्मांडीय प्रकाश को बढ़ाने में सहयोग करते हैं।
“यज्ञ में सर्व ब्राह्मणों के संगठित रूप में “स्वाहा” के दृढ़ संकल्प की आहुति पड़े तब यज्ञ समाप्त होना है अर्थात् विश्व-परिवर्तन का कार्य समाप्त होना है~”
जब यह आंतरिक यज्ञ संपन्न होता है, तब समस्याएं हमें कैसे प्रभावित कर सकती हैं?
जीवन की समस्याओं और बाधाओं को लेकर आध्यात्मिक ग्रंथ एक बहुत ही अनोखी और शक्तिशाली उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि जीवन की समस्याएं ठीक दीपावली [ Diwali ] के दौरान निकलने वाले कीड़ों-मकोड़ों की तरह हैं—वे अचानक प्रकट होते हैं, बहुत शोर मचाते हैं, और फिर उतनी ही जल्दी समाप्त भी हो जाते हैं।
इस उपमा का गहरा अर्थ यह है कि हमारी चुनौतियाँ हमारी लंबी आध्यात्मिक यात्रा में केवल एक अस्थायी चरण हैं। वे उस क्षण में बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण लग सकती हैं, लेकिन उनका अंत निश्चित है। लेकिन यहाँ एक और भी गहरा रहस्य छिपा है। हमारी असलियत उस विशाल, अनंत सागर की तरह है, और हमारी समस्याएं छोटे-छोटे तालाबों के समान हैं। अंततः हर तालाब को सागर में ही विलीन हो जाना है। यह दृष्टिकोण हमें समस्याओं के दृष्टा के रूप में स्थापित करता है। हम वो नहीं हैं जिसे समस्याएं हैं; हम वह चेतना का सागर हैं जिसमें समस्याएं क्षणिक तालाबों की तरह विलीन हो जाती हैं।
“जैसे दीपावली [ Diwali ] के मच्छर निकलते हैं और समाप्त हो जाते हैं ना~ आप सागर के बच्चे सागर हो, सारे विश्व को सच्चा आर्य बनाने वाले हो ö तो कोई कर ही क्या सकता है~ तालाब सागर में समाकर समाप्त हो जायेंगे~”
इस साक्षी भाव को पाने के लिए हमें अपनी कथनी और करनी को एक करना होगा…
आध्यात्मिक शक्ति और शांति का एक महान रहस्य कथनी (जो हम कहते हैं) और करनी (जो हम करते हैं) के बीच पूर्ण सामंजस्य में निहित है। जब यह दोनों एक हो जाते हैं, तो रहनी (हमारा प्रामाणिक स्वरूप) स्वतः प्रकट होती है। सच्चा आध्यात्मिक व्यक्ति केवल ज्ञान की बातें नहीं करता, बल्कि उस ज्ञान को अपने जीवन के हर कर्म में जीता है।
उदाहरण के लिए, यदि हम कहते हैं कि “हम सर्वशक्तिमान की संतान हैं,” लेकिन व्यवहार में छोटी-छोटी बातों से कमजोर हो जाते हैं या भयभीत हो जाते हैं, तो हमारी कथनी और करनी में गहरा अंतर आ जाता है। यह आंतरिक संघर्ष हमारी शक्ति को क्षीण कर देता है। जब हमारे विचार, शब्द और कर्म एक सीध में होते हैं, तो एक प्रामाणिक और शक्तिशाली चरित्र का निर्माण होता है। इसी को आज की भाषा में “आध्यात्मिक अखंडता” (spiritual integrity) कहते हैं। ऐसा व्यक्ति दुनिया को केवल उपदेश देकर नहीं, बल्कि अपने होने के तरीके से, एक जीवंत उदाहरण बनकर प्रभावित करता है। यही वास्तविक उत्सव है।
“जो कहते हैं वो करना है~ कहना अर्थात् करना~ कहने और करने में अन्तर नहीं हो~ यही आपके कोर्स का सार है~”
और इस अखंडता को साधने के लिए अब समय की मांग विशेष है…
आध्यात्मिक ग्रंथ वर्तमान समय के लिए एक बहुत ही शक्तिशाली और तत्काल संदेश देते हैं। वे पुरुषार्थ (आध्यात्मिक प्रयास) में दो स्तरों का भेद करते हैं: साधारण पुरुषार्थ और विशेष या तीव्र पुरुषार्थ। संदेश स्पष्ट है: अब साधारण, धीमे या आरामदायक प्रयास करने का समय बीत चुका है।
ग्रंथों के अनुसार, आने वाले समय की परीक्षाएं (परीक्षाएं) बहुत कड़ी होंगी, और उनका सामना करने के लिए उतनी ही तीव्र आध्यात्मिक तैयारी की आवश्यकता होगी। इसे चेतावनी के रूप में नहीं, बल्कि एक महान निमंत्रण के रूप में देखें। ब्रह्मांड हमें एक अंतिम परीक्षा के लिए प्रस्तुत कर रहा है, और यह हमारी सर्वोच्च क्षमता को प्रकट करने का एक अवसर है। यह एक शक्तिशाली आह्वान है कि हम अपने आंतरिक कार्य को कल पर न टालें और अपनी आध्यात्मिक यात्रा के प्रति पूरी तरह से समर्पित और तत्काल हो जाएं, क्योंकि समय की मांग यही है।
“साधारण पुरुषार्थ करने के दिन अभी बीत रहे हैं~ … परीक्षाएं कड़ी आने वाली हैं~ उसका सामना करने के लिए पुरुषार्थ भी कड़ा चाहिए~ अगर पुरुषार्थ साधारण, परीक्षा कड़ी तो रिजल्ट क्या होगी?”
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दीपावली [ Diwali ] का सच्चा सार बाहरी रोशनी में नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण में छिपा है। यह एक स्थिर दीपक बनने, नकारात्मकता का स्वाहा करने, समस्याओं को सागर में विलीन होते देखने, अपनी कथनी और करनी को एक करने, और अपने आध्यात्मिक प्रयासों को तीव्र करने का पर्व है। यह अपने भीतर उस प्रकाश को खोजने का अवसर है जो बाहरी दुनिया के किसी भी अंधकार से कभी प्रभावित नहीं होता।
इस दीपावली [ Diwali ], जब आप बाहर एक दीया जलाएं, तो स्वयं से पूछें: मैं अपने भीतर की ज्योति बनकर जीने का चुनाव कर रहा/रही हूँ, या केवल एक और दीया जलाने वाला?
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