रक्षाबंधन: वास्तविक अर्थ और पवित्रता का बंधन
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- 25 July 2025
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बिलकुल, नीचे दिए गए लेख को एक प्रभावशाली और सुव्यवस्थित पोस्ट के रूप में तैयार किया गया है, बिना किसी अतिरिक्त शब्द या विचार को जोड़े हुए। केवल प्रस्तुति और अनुच्छेदों का क्रम बेहतर बनाया गया है ताकि पाठक को पढ़ने में आसानी हो और विषय की गहराई स्पष्ट हो:
रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ:
भारत एक ऐसा देश है जहाँ शायद विदेशों की तुलना में अधिक त्योहार मनाए जाते हैं। हालांकि, यह आश्चर्य की बात है कि आज भारतवासी त्योहारों के सही अर्थ को भूल गए हैं और अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार त्योहार मनाने लगे हैं — जैसे कि परंपरा के रूप में, आस्था के रूप में, या केवल मनोरंजन के रूप में। रक्षाबंधन के त्योहार के साथ भी ऐसा ही हुआ है; इसका वास्तविक अर्थ आज बहुत से लोग नहीं जानते हैं।
रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ और उसकी गलत धारणाएं
रक्षाबंधन का अर्थ है ‘रक्षा’ अर्थात सुरक्षा और ‘बंधन’ अर्थात बांधना। पहले यह त्योहार सामूहिक रूप से मनाए जाते थे और रक्षा के वचन को विभिन्न रिश्तों के अंतर्गत निभाया जाता था।
उदाहरण:
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स ने देव और दानव युद्ध में अपने पति धर्म की रक्षा के लिए इंद्र को राखी बांधी थी।
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मेवाड़ की रानी कर्मावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर बहादुरशाह के आक्रमण से रक्षा की याचना की थी।
समय के साथ यह त्योहार केवल भाई-बहन के रिश्ते तक ही सीमित रह गया है। आज बहनें भाई को राखी बांधती हैं और बदले में भाई उपहार या पैसे देता है। स्रोत यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या यही रक्षाबंधन का सही अर्थ है? उनका कहना है कि रक्षाबंधन का अर्थ केवल राखी बांधना नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करना है।
वर्तमान स्थिति और सुरक्षा का अभाव
स्रोत यह प्रश्न करते हैं कि क्या आज बहन की रक्षा हो रही है? यदि होती, तो टीवी और अखबारों में बहनों के साथ बलात्कार, आत्महत्या जैसी घटनाएं दिन-प्रतिदिन न बढ़ रही होतीं।
कड़वी सच्चाई यह है कि शायद बहन की रक्षा करने वाले ही ‘भक्षक’ बन गए हैं।
कोई भी व्यक्ति — माता-पिता, भाई या पति — हर पल, हर परिस्थिति में, पूरी ज़िंदगी भर रक्षा की गारंटी नहीं ले सकता। कन्या खड़ी होती है, तो माता-पिता को उसकी शादी की चिंता होने लगती है, और वे उसे ज्यादा दिन अपने घर में नहीं रखना चाहते।
एकमात्र सच्चा रखवाला: भगवान
संसार में एकमात्र भगवान ही रखवाला हैं, दूसरा कोई नहीं। उदाहरण:
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सीता की रक्षा के लिए राम थे, लेकिन हरण के समय कोई नहीं था।
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द्रौपदी के पाँच पति थे, लेकिन चीर हरण के समय केवल भगवान ने रक्षा की।
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दशरथ के चार पुत्र थे, परंतु प्राण त्यागते समय कोई साथ नहीं था।
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रावण शक्तिशाली था, लेकिन अंत समय अकेला था।
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अभिमन्यु चक्रव्यूह में अकेला था।
“सबका रखवाला ऊपर वाला” — यही सत्य है।
द्रौपदी ने जब कृष्ण की कटी उंगली पर साड़ी का पल्लू बांधा, तो भगवान ने पूरी उम्र उसकी रक्षा का वचन निभाया।
हर नारी द्रौपदी समान है
स्रोत कहते हैं कि आज हर नारी द्रौपदी के समान है। जब सभी द्रौपदियां मिलकर भगवान को पुकारती हैं, तो भगवान साधारण रूप में आकर सभी को पवित्र रक्षा के बंधन में बांधते हैं।
पवित्रता का अर्थ केवल गंगा स्नान नहीं, बल्कि मनसा, वाचा, कर्मणा, दृष्टि और वृत्ति से पवित्र रहना है। यही पवित्रता सच्चा रक्षा बंधन बनती है, जो केवल भगवान सिखाते हैं।
विनाश की कगार पर खड़ी दुनिया
संसार इस समय विनाश की विभीषिका के सामने खड़ा है। परमाणु बमों का जखीरा तैयार है और दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है।
माया के प्रभाव ने मनुष्यों की बुद्धि को अज्ञान के अंधेरे में ढँक दिया है — ठीक वैसे जैसे कबूतर बिल्ली को देखकर आँखें बंद कर लेता है।
इस समय हमें भगवान को पहचानना है और उनके द्वारा दिखाए गए रक्षा के बंधन में बंधना है।
रक्षा का सच्चा अर्थ: अभेद्य सुरक्षा
सच्चे मायने में रक्षा का अर्थ यही है कि कोई बाल भी बाँका ना कर सके।
यह सुरक्षा केवल भगवान के साथ मन, वचन, कर्म, दृष्टि और वृत्ति की पवित्रता के बंधन में बंधने से ही संभव है।
जैसे एक अभेद्य किला अपने भीतर रहने वालों को हर बाहरी खतरे से बचाता है, वैसे ही भगवान का पवित्रता का बंधन हर संकट से हमारी रक्षा करता है।
निष्कर्ष: पवित्रता ही सच्चा रक्षाबंधन है
रक्षाबंधन आज केवल भाई-बहन के बीच राखी और उपहार तक सीमित हो गया है। लेकिन वास्तविक अर्थ है — ईश्वर के साथ आत्मा का पवित्रता में बंधना।
शरीर की नहीं, आत्मा की शुद्धता — मन, वचन, कर्म, दृष्टि, वृत्ति की पवित्रता — यही सच्चा रक्षा कवच है। यही बंधन हर परिस्थिति में, हर समय भगवान के द्वारा दी गई पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
“तुम स्वामी, सखा, तुम्ही सहारे हो — जिनके कछु और आधार नहीं, तुम ही उनके रखवाले हो।”