नगाड़ा नं.-2 | बापदादा का वण्डरफुल नया पार्ट | शिवबाबा अभी कहाँ पार्ट बजा रहे हैं? -आध्यात्मिक ज्ञान

नगाड़ा नं.-2 | बापदादा का वण्डरफुल नया पार्ट | शिवबाबा अभी कहाँ पार्ट बजा रहे हैं? -आध्यात्मिक ज्ञान

बापदादा का वण्डरफुल नया पार्ट - धर्मराज शंकर प्रलयंकर

 1- दिल्ली में शिवबाबा का वण्डरफुल नया पार्ट-

दिल्ली में शिवबाबा का वण्डरफुल नया पार्ट- adhyatmikgyan.in
     1969 में ब्रहमा बाबा के शरीर छोड़ने के बाद हम ब्रह्मा वत्सों ने यह समार लिया कि अब परमपिता शिव वापस परमधाम चले गये हैं तथा ब्रहमा बाबा सूक्ष्मवतन चले गये हैं; लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। शिवबाबा ने बच्चों से किये गये वादे को पूरा करने के लिए सिर्फ अपना मनुष्य शरीर रूपी रथ और सेवास्थान बदला है। शिवचाचा के साकार पार्ट परिवर्तन करने तथा सेवास्थान बदलने के सम्बंध में अव्यक्त बापदादा द्वारा 18 जनवरी 78 की अ. वाणी में स्पष्ट घोषणा की गई थी-
  •  “बापदादा कब प्रत्यक्ष दिखाई देते, कब पर्दे के अंदर छिपा हुआ दिखाई देते; लेकिन बाप-दादा सदा (ज्ञानी तू आत्मा) बच्चों के आगे प्रत्यक्ष हैं।.. ‘बाबा चला गया’ यह कह अविनाशी सम्बंधों को विनाशी क्यों बनाते हो। सिर्फ (ब्रहमा से शंकर रूप में) पार्ट परिवर्तन हुआ है। जैसे आप लोग भी सेवा स्यान चेंज करते हो ना। तो ब्रह्मा+बाप ने भी सेवा स्थान (मधुबन से दिल्ली राजधानी बनाने के लिए) चेंज किया है।” (अ.वा.18.1.78 पृ.34 अंत, 35 आदि)
  •  “संगमयुग पर तक़दीर की रेखा परिवर्तन करने वाला बाप सम्मुख पार्ट बजा रहे हैं।” (अ.वा. 9.9.75 पृ.99 मध्य) 
  • (नं.वार एक-2 करके बाप के सहयोगी बनने वाली) हज़ार भुजा वाले ब्रह्मा के रूप का वर्तमान समय पार्ट चल रहा है। तब तो साकार सृष्टि में इस (प्रैक्टिकल) रूप का गायन और याद‌गार है। भुजाएँ (रूपी बच्चे) बाप के बिना कर्तव्य नहीं कर सकतीं। भुजाएँ बाप को प्रत्यक्ष करा रही हैं। कराने वाला (साकार बाप) है तब तो कर रहे हैं।…. .. (दूसरे) बच्चे जुदाई का पर्दा डाल देखते रहते हैं। फिर ढूंढने में समय गंवाते हैं। हाज़िर हजूर को भी छिपा देते।……. बहलाने की बातें नहीं सुना रहे हैं। और हो सेवा की स्पीड़ को अति तीव्र गति देने के लिए सिर्फ स्थान परिवर्तन किया है। (कहाँ? दिल्ली की ओर) (अ.वा. ता.18.1.78 पृ.35 मध्य, 36 आदि)

     शिवबाबा ने मुरलियों में कहा है कि वे तीन मूर्तियों द्वारा पार्ट बजाते हैं- ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा विनाश और विष्णु द्वारा पालना। जब ब्रह्मा का पार्ट समाप्त होता है तो शंकर का पार्ट प्रारम्भ हो जाता है। शंकर के पार्ट के लिए शिवबाबा ने साकार मुरलियों और अव्यक्त वाणियों में कई इशारे दिये हैं। ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में शंकर का पार्ट तो सन् 1969 से ही आरम्भ हो चुका था; किन्तु शंकर के पार्ट की प्रत्यक्षता सन् 1976 से दिल्ली में हुई। इस वर्ष को बाबा ने प्रत्यक्षता वर्ष के रूप में पहले ही घोषित कर दिया था। साथ ही 1976 को ब्रह्मा बावा समेत सभी ब्रहमाकुमार- कुमारियों ने दस वर्ष पहले अर्थात् 1966 से ही दुनिया के विनाश का वर्ष भी घोषित कर दिया था, जबकि यह सारे दुनिया के स्थूल विनाश के लिए नहीं अपितु ब्राह्मणों की दुनिया में ज्ञान सूर्य के रूप में प्रत्यक्ष होने वाले पार्टघारी के मन-बुद्धि से विकारों और भ्रष्टाचार के अंत होने के प्रति इशारा था। बेहद का बाप बेहद के बच्चों से बेहद की बातें करते हैं। उन बातों को हद की दुनिया में बुद्धि लगाने वाले बच्चे नहीं समझ सकते। वैसे भी दुनिया का हर कार्य सूक्ष्म में पूरा होने के बाद ही स्थूल में पूरा होता है। जैसे मकान बनाने या बिगाड़ने की सूक्ष्म रूप-रेखा पहले बुद्धि और फिर काग़ज़ में बनाते हैं और फिर प्रैक्टिकल में करते हैं। तो यह सन् 76 से सम्पन्न होने वाली घोषणा भी ब्राहमणों की ही सूक्ष्म संगमयुगी दुनिया की स्थापना और विनाश की घोषणा थी जो सन् 76 से प्रैक्टिकल में पूरी हो रही है।

     ब्र‌ह्माकुमार-कुमारियों ने सन् 1976 को धूमधाम से बाप के प्रत्यक्षता वर्ष के रूप में मनाया; किंतु न तो सारी दुनिया की आत्माओं के बीच बाप की प्रत्यक्षता हो सकी और न उनकी आशाओं के अनुरूप दुनिया का विनाश हुआ। अतः जब अधिकतर ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ 1976 में विनाश न होने पर निश्चय-अनिश्चय के संकल्पों से जूझ रहे थे और उनके मन में हाहाकार मचा हुआ था, ठीक उन्हीं दिनों दिल्ली में यमुना के कण्ठे पर यानी यमुना के किनारे के (शाहदरा-कृष्णानगर-चांदनी चौक- नोवेल्टी-साउथ-ग्रीनपार्क-महरौली आदि) सेवाकेंद्रों के भाई-बहनों के बुद्धिरुपी क्षेत्र में सत्यज्ञान अर्थात् सच्चखण्ड की स्थापना हो रही थी और उनकी बुद्धि जयजयकार के नारे भी लगा रही थी; क्योंकि उन्होंने पाण्डवपति भगवान के साकार पार्ट को ज्ञान के तीसरे नेत्र से पहचान लिया था। बाबा ने ता. 14.5.70 पृ.2 के आदि की मुरली में कहा भी है- “शंकर क्या करते हैं? उनका पार्ट ऐसा वण्डरफुल है जो तुम विश्वास कर न सको।” अपने नये सेवास्थान दिल्ली के सम्बंध में बाबा ने कई मुरलियों और अव्यक्त वाणियों में इशारे दिये हैं-

  • “बाबा ने बताया था दिल्ली में बिरला मंदिर में एक पत्थर लगा हुआ है जिसमें लिखा हुआ है भारत कब्रिस्तान (अर्थात् अज्ञानी) था। उनको धर्मराज ने परिस्तान (ज्ञानपरियों का स्थान) बनाया।” (मु.16.12.71 पृ.2 आदि)
  • “बाबा ने बताया था कि बिड़ला मंदिर में भी लिखा हुआ है (धर्मराज ने) दिल्ली को परिस्तान बनाया था।” (मु.27.7.73 पृ.1 मध्य) वास्तव में यह कल्पपूर्व के वर्तमानकालीन धर्मराज के पार्ट की यादगार है।
  • ‘देहली पर (यादव-कौरव-पाण्डव) सबको चढ़ाई करनी है। देहली की धरणी को प्रणाम ज़रूर करना है।…… देहली के तरफ़ सभी की नज़र है। (साकार) बाप की भी नज़र है तो सर्व की भी नज़र है।….. देहली से सेवा की प्रेरणा मिलनी चाहिए। जैसे सेंट्रल गवर्मेंट है तो सेंटर द्वारा सर्व स्टेशन को डायरैक्शन मिलते हैं वैसे सेवा के प्लैन्स वा सेवा को नवीनता में लाने के लिए पार्लियामेंट होनी चाहिए।…… तो जैसे (राजधानी) स्थापना में नं. वन देहली रही वैसे विशेषताओं के गुलदस्ते में भी नम्बरवन बनना है।…… जैसे मधुबन चरित्र भूमि है, मिलन भूमि है, बाप को साकार रूप में अनुभव कराने वाली भूमि है वैसे देहली की धरणी सेवा को प्रत्यक्ष रूप देने के निमित्त है तब देहली से आवाज़ निकलेगा। अभी सबकी बुद्धियों में यह संकल्प तक उत्पन्न हुआ है कि जो कुछ (यह मेले-मलाखड़े आदि) कर रहे हैं, जो चल रहा है उससे कुछ होना नहीं है, अभी सब सहारे टूटने लगे हैं; इसलिए ऐसे समय पर यथार्थ (साकार बाप का) सहारा अभी जल्दी ढूँढ़ेंगे। माँग करेंगे- ऐसी नई बात कोई सुनावे और आख़िरीन में चारों तरफ़ भटकने के बाद (दिल्ली में) बाप के सहारे के आगे सब माथा झुकावेंगे। समझे अब देहली वालों को क्या करना है।” (अ.वा. ता.26.12.78 पृ.155,156,157)

2 -ब्रह्माकुमारी गुलज़ार मोहिनी में सिर्फ ब्रह्मा बाबा प्रवेश करते हैं; शिवबाबा नहीं-

ब्रह्माकुमारी गुलज़ार मोहिनी में सिर्फ ब्रह्मा बाबा प्रवेश करते हैं; शिवबाबा नहीं-

     18 जनवरी, 1969 को ब्र‌ह्मा बाबा के शरीर छोड़ने के पश्चात 21 जनवरी, 1969 से ब्र.कु. गुलज़ार मोहिनी के शरीर के द्वारा अव्यक्त वाणियाँ सुनाने का पार्ट आरम्भ हुआ। अव्यक्त वाणियों में ‘बापदादा’ शब्द के प्रयोग को ध्यान में रखते हुये ब्रह्माकुमार-कुमारियों ने समझ लिया कि गुलज़ार दादी के तन में परमपिता शिव और ब्रह्मा बाबा की आत्मा, दोनों ही प्रवेश करते हैं; लेकिन वास्तव में 1969 से पहले चली साकार मुरलियों तथा 1969 के बाद चली अव्यक्त वाणियों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि ब्रह्माकुमारी गुलज़ार मोहिनी के तन में शिवबाबा नहीं आते, सिर्फ ब्रहमा बाबा की आकारी अर्थात् सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा ही उनमें प्रवेश करती है।

  • (i) अ.बापदादा ने कई बार कहा है कि बाप तो वानप्रस्थी अर्थात् वाणी से परे हो गया। जो वाणी से परे हो गया वह फिर वाणी में कैसे आवेगा? 
  • (iii) शिवबाबा का दिव्य जन्म अर्थात् दिव्य प्रवेश होता है अर्थात् जिसके शरीर में प्रवेश करते हैं उस व्यक्ति को अपनी स्मृति रहती है। जैसे ब्रह्मा बाबा की आत्मा शिवबाबा की प्रवेशता के समय स्वयं भी मुरली सुनती थी। जबकि ब्र.कु.गुलज़ार को प्रवेशता के समय अपनी स्मृति नहीं रहती। उन्हें दुबारा अ. वाणी पढ़नी पड़ती है; क्योंकि उस समय उनकी अपनी आत्मा ब्रहमा बाबा के सूक्ष्म शरीर के दबाव के कारण गुम हो जाती है। ता. 12.7.73 पृ.3 की साकार मुरली के मध्य में बाबा ने कहा भी है- “घोस्ट भी आकर प्रवेश करते हैं। तो वह आत्मा हुई न। (परमात्मा नहीं हुई; क्योंकि) घोस्ट अपना कर्तव्य करते हैं तो उनका फिर पार्ट बन्द हो जाता।” परंतु ज्ञानी होने के कारण ब्रह्मा की सोल घोस्ट अर्थात् भूत-प्रेतात्माओं की तरह ईविल पार्ट नहीं बजाती।
  • (iv) शिवबाबा पतित तन में आते हैं। ब्र.कु. गुलज़ार तो आजन्म कुमारी रही है। कुमारी के पवित्र शरीर में ईश्वरीय नियमानुसार शिवबाबा की प्रवेशता सिद्ध नहीं होती। बाबा ने ता.15.10.69 पृ.2 की मु. के मध्य में कहा भी है- “(शिवबाबा) पवित्र कन्या के तन में आयें; परंतु कायदा नहीं है। बाप सो फिर कुमारी पर कैसे सवारी करेंगे?” “एकदम (कामी) काँटों को बैठ शिक्षा देते हैं। प्रवेश भी कॉटे में किया है। नं.वन काँटे में मैं आकर उनको नं. वन फूल बनाता हूँ।” (मु.26.2.74 पृ.2 अंत) (भला बताइये सन् 69 से नं. वन काँटा कौन है?)
  • (v) शिवबाबा ने अपना मुकर्रर रथ प्रजापिता ब्रह्मा को बताया है। ता.8.1.75 पृ.2 अंत की मुरली में कहा है “मैं इस तन में प्रवेश करता है। यह मुकर्रर तन है।दूसरे कोई में (प्रत्यक्ष या व्यक्त रूप से कब आते ही नहीं कब बाबा (बिंदु रूप स्टेज में) आ सकते हैं मदद करने (के) लिए।”
  • (vi) ब्रह्मा बाबा में शिव की प्रवेशता के समय किसी को पता नहीं था। जबकि मधुबन में सूक्ष्म शरीरधारी ब्रह‌मा बाबा की प्रवेशता था। है, क्योंकि उनकी बैठक, नैन-चैन और मुख की आमा में परिवर्तन आ जाता है। बाप जब आते हैं तो कोई को पता पड़ता है क्या? बाबा को हा पड़ता है क्या?…… नहीं, पता भी नहीं पड़ता। (रात्रि क्लास 5.3.73 मध्य
     
         स्पष्ट है कि ब्र.कु. गुलज़ार मोहिनी द्वारा शिवबाबा धर्मराज बाप का पर्छ नहीं बजाते। हो, आर-प्यार और मार की तीन नीतियों में से जो बड़ी माँ के रूप में पार्ट बजाने वाले ब्रह्मा के प्यार से नहीं सुधर सके उन्हें इस आर अर्थात् अई लगाने पाले अव्यक्त बापदादा के पार्ट की भी ज़रूरत थी; परंतु जैसे मोटी चमड़ी के जानवर अर्थ की परवाह नहीं करते वैसे मोटी बुद्धि वालों को भी पता नहीं चलता कि उन्हें अरई लगाई जा रही है। उनके ऊपर फिर उबलते हुये (ज्ञान) जल की धाराएँ डालकर धर्मराज बाप के (ज्ञान) डंडों की पिटाई द्वारा खाल ही उधेड़ दी जाती है। इसलिए 22.10.70 7.310 के अंत की अ.वाणी में बाबा ने हम बच्चों को सावधान भी किया था- “अभी थोर समय के अंदर धर्मराज का रूप प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे; क्योंकि अब अंतिम समय है।” 
    • बाबा ने मुरली में कहा है- “सजाएँ भी (सभी को ) यहाँ ही (इसी दुनियाँ में) खानी होंगी।” (मु.16.9.68 पृ.4 अन्त)
     

3 -राम की आत्मा ही यज्ञ के आदि और अंत में प्रजापिता तथा मध्य में शंकर का पार्ट बजाती है-

राम की आत्मा ही यज्ञ के आदि और अंत में प्रजापिता तथा मध्य में शंकर का पार्ट बजाती है-आध्यात्मिक विश्वविद्यालय

     शिवबाबा ही प्रजापिता और ब्रह्मा की सोल द्वारा क्रमशः ज्ञानसूर्य बाप और ज्ञान चंद्रमा ब्रह्मा अर्थात् बड़ी माँ के रूप से प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए उस ज्योतिबिंदु को “त्वमेव माता च पिता” कहा जाता है। जन्म-मरण के चक्र में आने वाली छ:/ सातसौ करोड़ मनुष्यात्माओं के बीच सबसे पावरफुल अर्थात् परम मनुष्यात्मा को ही प्रजापिता कहा जाता है। उस प्रजापिता (दादा लेखराज के भागीदार) में सबसे पहले प्रवेश करके परमपिता शिव ने ब्रह्मा बाबा को हुये साक्षात्कारों के रहस्य को खोला था। उस प्रजापिता के साथ आदि में यज्ञ माता का पार्ट बजाने वाली कोई दूसरी थी। साथ ही दादा लेखराज के साथ-2 एक और माता ने भी साक्षात्कारों का रहस्य मुना था। ओम राधे सरस्वती (मम्मा), जिन्हें हम जगदम्बा के रूप में जानते और मानते हैं, बाद में यज्ञ में आई थी। इस तरह बड़ी माता-ब्रह्मा के भी बुद्धि रूपी पेट में ज्ञान का बीज डालने वाला व्यक्ति परमपिता का मुकर्रर साकार रव या सारी मनुष्य-वृष्टि का प्रजापिता, जगतपिता, विश्वपिता या सव आत्माओं में परम पार्ट बजाने वाला परम+आत्मा (परमात्मा) साबित हो जाता है। ‘परम’ शब्द का अर्थ ही है सबसे बड़ा।

इसलिए 8.2. 78 पृ.1 की मुरली आदि में कहा है- बेहद के भी दो बाप हैं। (एक शिवबाप, दूसरा प्रजापिता) तो माँ भीजरूर दो होंगी, एक जगदम्बा माँ, दूसरी यह (ब्रह्मा) भी माता ठहरी। (एक तो ब्रह्मा, दूसरी सरस्वती)”

बेहद का साकार बाप प्रजापिता ब्रह्मा बिगर कोई होता नहीं। बेहद 500 /700करोड़ को कहा जाता है। इतनी सब मनुष्यात्माएँ ब्रह्मा को बाप नहीं मानतीं । अतःबड़ी माता ब्रह्मा  अर्थात् जगदम्बा के स्वरूप  को सिर्फ भारतवासी ही मानते हैं। सारे जगत या दूसरे धर्म के लोग नहीं मानते। यह ज्ञान-चंद्रमा ब्रहमा ही 100 वर्ष कीआयु पूरी होते -2 सम्पूर्ण बनकर संगमयुग के अंतकाल में दूसरा जन्म लेने वाले उसी प्रजापिता की सोल ‘शंकर’ में प्रवेश करता है। इसलिए आज भी शंकर के माथे पर चंद्रमा दिखाया जाता है और उनका कोई साकार बाप या जन्म स्थान भी नहीं दिखाया  जाता; क्योंकि  उस निराकारी स्टेज में स्थिर होने वाले के साकार शरीर द्वारा ही सब बापों (धर्मपिताओं) का बाप शिवबाबा संसार में प्रत्यक्ष होता है।

ता. 10.5.74 पृ.2 के अंत और 28 मई, सन् 1974 पृ.2 के अंत की मुरली के अनुसार यज्ञ के शुरू में मम्मा-बाबा को भी साकार में कन्द्रोल करने वाली,डायरैक्शन देने वाली, रूहानी ड्रिल कराने वाली, टीचर हो बैठने वाली आत्मा ही प्रजापिता थी; क्योंकि बाप ही माँ को कन्द्रोल करने का अधिकारी है, बच्चे नहीं। ‘जो आदि में हुआ सो अंत में होना है’ के नियमान्सार वह छूपा रुस्तम प्रजापिता की सोल बाद में बच्चों के सामने खुलकर विश्व की बादशाही का वर्सा दिलाने के लिए प्रैक्टिकल में प्रत्यक्ष हो जाती है। इसलिए 1.1.3.76 पृ.3 मध्य की मुरली में बाबा ने स्पष्ट  कहा था कि “शिवबाबा प्रजापिता ब्रह्म द्वारा ब्र.कु.कुमारियों को वर्सा देते हैं।ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा ब्राह्मण कुल की रचना रचते हैं।” आदि में बीज बोने और अंत में वर्सा देने का पार्ट बाप का होता है। जबकि मध्य मैं जन्म देने, पालना करने और प्यार देने का पार्ट माता का होता है। माता का पार्ट मम्मा-बाबा द्वारा बखूबी निभाया गया; परंतु अभी अंत में फिर उसी निराकार बाप से प्रीतबुद्धि बच्चों को नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार वैजयंती माला में पिरोने, संगमयूगी विश्व की बादशाही का अविना्शी वर्सा देने का महान् कार्य शिवबाप को उसी प्रजापिता की सोल द्वारा इस जन्म में शंकर के नाम-रुप से सम्पन्न कराना है। जैसे सतयुगी राधा-कृष्ण की आत्माएँ अपने संगमयुगी 84वें जन्म में ब्रह्मा-सरस्वती के नाम- रूप से बेहद की माताओं का प्यार का पार्ट बजाती हैं।ठीक वैसे ही राम -सीता की आत्माएँ अपने अंतिम 84 वें संगमयुगी जन्म में महाकाल और महाकाली या शंकर-पार्वती के नाम-रूप से तांडव नृत्य करने का पार्ट बजाती है। ताड़’ धातू  का अर्थ ही है- पिटाई करना। ज्ञनीजन ज्ञान डंडे का प्रयोग करेंगे और देहाभिमानी असूरों का काम है- बाहुवल का प्रयोग करना। जिसके पास जो प्रॉपर्टी होती है उसे उसका नशा रहता है। ज्ञान – योगबल वाले विश्व की बादशाही पा लेते हैं जबकि बाहुबल बाले गंवाते हैं। इसी आधार पर देव और असुर, कौरव और पांडव अथवा राम या रावण सम्प्रदाय के अलग-2 पार्ट भी खुल जाते हैं।

राम और राम सम्प्रदाय की आत्माओं के बुद्धि रूपी तरकस में ज्ञान के नुकीले बाण भरे होंगे। प्रजापिता का पार्ट बजाने वाली यह राम की आत्मा ही यज्ञ के अंदर पूर्वजन्म में फेल हुई थी अर्थात् शुरू में ड्रमा का ज्ञान न होने के कारण सबसे पहले शिवपिता से बिछुड़ गई थी। अतः बाप के उस सिकीलों, सबसे बड़े और अनन्य बच्चे को पूर्वजन्म की प्रारब्ध से इस दूसरी बार मिले ब्राह्मण जन्म में ऑटोमैटिक ज्ञान के तौर और पुरुषार्थ की कमान मिल जाती है। यह कोई त्रेतायुग में धनुष-वाण लेकर जन्म लेने की बात नहीं है। संगमयुगी प्रैक्टिकल पार्ट का गायन है। इसलिए वह आत्मा लास्ट में आने पर भी पूर्वजन्म की प्रारब्ध से फास्ट जाने के कारण अकेले योगबल से ही विश्व की बादशाही लेने की हाईजम्प लगाने में सफल हो जाती है। चूंकि राम के इस संगमयुगी दूसरे जन्म के शरीर में प्रवेश करके ही बिंदु रूप निराकार राम (शिव) और फर्स्टक्लास सीता (ब्रह्मा) अर्थात् बापदादा प्रैक्टिकल में स्वर्ग की स्थापना कर दिखाते हैं। अतः सतयुग को रामपुरी या रामराज्य कहा जाता है। (संदर्भ-मुरली 6.3.75 व 24.5.71) ‘पतित-पावन सीताराम’ या ‘सर्व का सद्गति दाता राम’ आदि गायन भी शंकर-पार्वती के नाम-रूप से पार्ट बजाने वाले इसी अंतिम 84वें जन्म के संगमयुगी शरीरों का ही गायन है। चौदह कला वाले त्रेतायुगी राम-सीता का नहीं।

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