ओम मंडली की स्थापना ये अभी हीरे समान...
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Toggleये अभी हीरे समान पुरुषोत्तम संगमयुग चल रहा है। 5000 वर्ष के ड्रामा का यही सबसे विशेष संधिकाल है जो पुराने कल्प के अंत का समय है और नए कल्प का आदि भी है। और युगों के संधिकाल को विशेष नहीं बताया गया है, वो सामान्य संगम है और ये विशेष हीरे तुल्य संगमयुग है; क्योंकि इस समय ही सदाशिव ज्योति जो सदा परमपाम निवासी है, वो इस सृष्टि पर आता है और किसी साकार तन का आधार लेकर ही नए कन्प का आवर्तन करता है। निमित्त तो ये तीनों मूर्तियाँ बनती हैं; परन्तु शिवबाप का मुकर्रर रथ एक ही बनता है। मुरली में बोला है-
जैसे बीज को देखने से उसका वृक्ष कैसा होगा ज्ञात हो जाता है; ऐसे ही उस एक को जानने से उसके द्वारा इस समस्त सृष्टि के आदि-मध्य-अंत का ज्ञान जाना जा सकता है, उस साकार के द्वारा ही राजस्व अश्वमेघ अविनाशी रुद्र गीता-ज्ञान-यज्ञ की स्थापना हुई।
दादा लेखराज साक्षात्कारों का अर्थ जानने के लिए भटकते रहे। बनारस गए, वहाँ पर दीवारों में लीकें खींचते रहते थे; परन्तु समझ में नहीं आता था। मु.ता.26.7.88 पृ.2 के आदि में यह बात आई है कि.. “बाबा अनुभव अपना बतलाते हैं, शुरू में बनारस गए तो दीवारों पर गोले आदि निकालते रहते थे। समझ में कुछ भी नहीं आता था यह क्या है; क्योंकि यह तो जैसे बेबी बन गए।”
वे उन साक्षात्कारों का अर्थ जानने के लिए बनारस होते हुए कलकत्ते अपने भागीदार के पास आए, जिनका लौकिक नाम ‘सेवकराम’ था। “खास विश्वसनीय व्यक्ति सेवकराम भी थे, जिनके साथ बाबा ने साझेदारी (पार्टनरशिप) में ‘लखीराज-सेवकराम एंड संस’ नाम से हीरों आदि का व्यापार शुरू किया। जो दादा लेखराज के साथ एक ही बिल्डिंग में अपने परिवार के साथ रहते थे।” (किताब-थ्री इन वन) जो 10 वर्ष से उनके साथ था, वह पहले साधारण-सा नौकर था, बाद में दादा लेखराज कृपलानी ने उनकी ईमानदारी और बुद्धिमत्ता को देखकर उन्हें अपना भागीदार बना लिया था। मु.ता.10.11.88 पृ.1 के अंत में बताया है कि…
दादा लेखराज को साक्षात्कार हुए इस कारण राजस्व अश्वमेध अविनाशी रुद्र गीता-ज्ञान-यज्ञ की स्थापना सन् 1936/37 में सिंध-हैदराबाद में हुई, ऐसा माना जाता है; परन्तु देखा जाए तो ज्ञान-बीज का फाउण्डेशन सन् 1936/37 में बंगाल कलकत्ते में पड़ा। जब दादा लेखराज कृपलानी के साक्षात्कारों का अर्थ बताने के लिए सदाशिव ज्योति ने भागीदार (मुकर्रर रथ) में प्रवेश किया। मु.ता. 27.7.88 पृ.2 मध्यांत में कहा है कि “बाबा तो अनुभवी है। कहते भी हैं कि कि में मैं वृद्ध तन में आता हूँ, कृष्ण का तो वृद्ध तन नहीं है।” दादा लेखराज को जब साक्षात्कार हुए, तब उनकी आयु 50 वर्ष ही थी और वह तो साक्षात्कारों का अर्थ भी नहीं समझ पाए; क्योंकि वो तो बेबी बुद्धि हो गए थे; इसलिए दादा लेखराज जो भविष्य में कृष्ण बनने वाले हैं, कृष्ण को मंदिरों में ज़्यादातर बच्चे के रूप में दिखाते हैं और 60 वर्ष आयु न होने के कारण उनका वृद्ध तन नहीं कहेंगे; क्योंकि वृद्ध अनुभवी तन 60 वर्ष को कहा जाता है। भागीदार दादा लेखराज से ज़्यादा अनुभवी थे; इसलिए दादा लेखराज अपने भागीदार के पास कलकत्ता आते हैं, जो सदाशिव ज्योति का मुकर्रर रथ था।
जिसके प्रमाण मुरलियों और अव्यक्त-वाणियों में दिए हैं-
(यह नहीं कहा सिंघ- हैदराबाद से) अ.वा.ता.2.2.08 पृ.3 के अंत में बोला है कि-
इन महावाक्यों से ये स्पष्ट होता है कि जहाँ कल्प पूर्व सदाशिव ज्योति का अवतरण हुआ था, उसी स्थान (कलकत्ता) में फिर से होता है और वही मुकर्रर रथ की जन्मस्थली पूर्वी बंगाल कलकत्ता ही थी और वो वहीं का रहवासी था। जिन त्रिमूर्ति के सामने बैठने से ही ध्यान में चले जाते थे, ये छोटे रूप में ज्ञान यज्ञ का फाउण्डेशन कलकत्ता में पड़ा। जबकि दादा लेखराज कृपलानी का जन्म सिंध प्रान्त में हुआ था। बाद में कुछ समय के लिए वो कलकत्ते में व्यापार करने के लिए रहने लगे; परन्तु मूल निवासी नहीं थे और जब साक्षात्कार हुआ तब वे सिंध में ही थे। साक्षात्कार करने को प्रवेशता होना नहीं कहेंगे; इसलिए दादा लेखराज को शिवबाप का मुकर्रर रथ नहीं कह सकते हैं। सदाशिव ज्योति के प्रथम अवतरण के समय ही कलकत्ते में वे त्रिमूर्ति कही जाने वाली तीनों मूर्तियाँ मौजूद थीं, जिनमें एक मुकर्रर रथधारी मूर्ति 60 वर्षीय वानप्रस्थी की भी थी।
सृष्टि प्रक्रिया हद में हो या बेहद में, मात-पिता दोनों ही सक्रिय रहते हैं, ऐसे ही शिवबाप की प्रवेशता भी भागीदार (जगतपिता) और जगदम्बा माता में साथ-साथ होती है। माता और पिता के बिगर सृष्टि की रचना हो नहीं सकती। यह तो बिल्कुल साधारण समझने की बात है। एक है बेहद के मात-पिता, दूसरे हैं हद के। यह भारत है पारलौकिक बेहद के बाप का बर्थ प्लेस। ज़रूर माता और पिता दोनों ही चाहिए। (मु.ता. 15.11.73 पृ.1 आदि) शिव की प्रवेशता के कारण वह जगदम्बा ही आदि माता ब्रह्मा हुई और उसी ब्रह्मा-मुख से शिवबाप की वाणी सुनकर मुखवंशावली प्रजापिता (जगत्पिता) चोटी का पहला ब्राह्मण बना, जिसने साक्षात्कारों को सुनने के साथ उनको समझा भी। ये दोनों क्रियाएँ साथ-साथ होती हैं; इसलिए किसी एक में प्रवेशता पहले हुई ऐसा नहीं कहा जा सकता है। उन साक्षात्कारों का अर्थ समझाने के लिए परमपिता शिवबाप ने सबसे पहले प्रजापिता में प्रवेश करके ज्ञान का बीज डाला; इसलिए प्रजापिता ही सबसे पहली और बड़ी माता परमब्रह्म हो गई ।
प्रजापिता द्वारा ही उन साक्षात्कारों का अर्थ तीन मूर्तियों में दो मालाओं को समझाया जाता है। एक बड़बोली माता सिर्फ सुनती है पर समझती नहीं है; परन्तु दूसरी माता सुनने के साथ-साथ समझकर धारण भी करती है। बाद में ज्ञान-बीज का फाउण्डेशन धारणामूर्त माता के द्वारा दादा लेखराज में पड़ता है और विधान तब पका हो जाता है। जिस माता ने ज्ञान-बीज धारण किया, उस माता से ओम राधे के साथ दादा लेखराज प्रक्षा चुनते हैं। बीज प्रजापिता से पड़ता है औरविश्वास माता के द्वारा होता है।
दादा लेखराज और राधे की सतयुग में राधा-कृष्ण युगल बच्चों के रूप में साथ-साथ जन्म लेने की शूटिंग यहाँ हो जाती है। प्रजापिता (आदिनारायण) और धारणावान माता (आदिलक्ष्मी) से सतयुग से जन्म लेने वाले 16 कला सम्पूर्ण (कृष्ण और राधे) दादा लेखराज ब्रह्मा और ॐ राधे मम्मा की आत्माएँ हैं। साक्षात्कार दादा लेखराज को हुए थे और उनका अर्थ भी भागीदार (प्रजापिता) के द्वारा मिल गया। इसलिए निश्चय के नशे के साथ-2 स्थूल धन-संपत्ति से भी वैराग्य उत्पन्न होने लगता है।
इन महावाक्यों से ये स्पष्ट होता है कि पहला अल्फाज अल्फ कोई निराकार नहीं है, ज़रूर कोई साकार व्यक्तित्व है, सतयुग की बादशाही लेने के लिए दादा लेखराज ने जिसके हवाले सारा कारोबार भी उसे हस्तगत किया था। अल्लाह अर्थात् ऊँचे-ते-ऊँच और वो खुदा आता है अल्फ में और जिस अल्फ (भागीदार) ने बताया- अगर विष्णु जैसा देवता बनना है तो ये स्थूल रत्न पत्थर हैं, इनका कारोबार छोड़कर ज्ञान रत्नों का व्यापार करना है। उत्ती अल्फ अर्थात् भागीदार को दादा लेखराज अपना सारा कारोबार सौंपकर सिंघ में आकर सत्संग की शुरुआत करते हैं।
कुछ समय बाद नज़दीकी लौकिक सम्बन्धी भागीदार (प्रजापिता) और दो माताएँ भी सिंघ में आकर दादा लेखराज कृपलानी को हिसाब-किताब दे देते हैं और दोनों मिलकर सत्संग चलाते हैं।
प्रजापिता और दो माताओं के द्वारा ही यज्ञ का संचालन होता था। मु.ता. 25.7.67 पृ.2 के अन्त में बाबा ने स्पष्ट भी किया है- (31.)
10 वर्ष से दादा लेखराज के साथ भागीदार और माताएँ थीं, जिनमें शिव की प्रवेशता होती थी, जो मम्मा-बाबा को भी ड्रिल अर्थात् याद की प्रक्रिया सिखाते थे। उस समय प्रजापिता के द्वारा जो वाणी चलती थी, उसको पिऊ की वाणी कहा जाता था। पिऊ सिन्धी भाषा में पिता को कहा जाता है; लेकिन वो बहुत स्ट्रिक्ट वाणी थी। इसलिए आज भी दीदी-दादियों पिऊ का नाम सुनने से डर जाती हैं। उनका आदि में रौद्र रूप था, जिसके आधार पर इस यज्ञ का नाम ‘रुद्र गीता-ज्ञान-यज्ञ’ पड़ा।
भागीदार रुद्र स्वभावी थे और उनमें शिव की भी प्रवेशता थी; इसलिए बोला-भगवान को रुद्र कहा जाता है, कृष्ण को नहीं; क्योंकि दादा लेखराज उर्फ कलाबद्ध कृष्ण मीठे स्वभाव के व्यापारी थे, उनको तो रुद्र नहीं कहा जा सकता तो भगवान भी नहीं कहा जा सकता है और शिव की प्रवेशता भी उनमें नहीं थी।
इन महावाक्यों के अनुसार बड़े-ते-बड़े पिता दो ही हैं- निराकार और साकार, तीसरा कोई और नहीं हो सकता है। निराकार तो सभी आत्माओं का बाप है और सारी साकार मनुष्य-सृष्टि का पिता आदिदेव/आदम/एडम अर्थात् पिऊ प्रजापिता ब्रह्मा हैं, जो कि दादा लेखराज नहीं हैं, जिसके प्रमाण मुरलियों में स्पष्ट रूप से बताए हैं-
ये महावाक्य दादा लेखराज कृपलानी के लिए बोले हैं, जो हीरों के जवाहरी थे, जिनका लास्ट जन्म में नाम लेखराज था और वो प्रजापिता ही नहीं बन सकते तो पिऊ भी नहीं हो सकते अर्थात् दादा लेखराज को साकार मनुष्य-सृष्टि का साकार पिता नहीं कह सकते हैं। प्रजापिता जो साकार पिता है, उनके प्रमाण भी मुरलियों में दिए हैं-
इन सभी महावाक्यों के अनुसार बाप प्रजापिता ब्रह्मा ही है, जो शिवबाप का मुकर्रर रथ है, जिसको शिवबाबा कहें, वह भागीदार अर्थात् प्रजापिता ब्रह्मा ही राम वाली आत्मा है। सन् 1942 में कुछ ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसके कारण यज्ञ (ॐ मंडली) में विघटन हो गया। मु.ता.14.9.87 पृ.1 के अंत में बाबा ने बोला है-
यज्ञ के अंदर दो प्रकार के ब्राह्मण उत्पन्न हो गए। एक विश्वामित्र, वशिष्ठ जैसे दैवी संस्कारों वाले ब्राह्मण तथा दूसरे रावण, कुम्भकर्ण जैसे आसुरी स्वभाव, संस्कारों वाले (विधर्मी और विदेशीयता से प्रभावित) ब्राह्मण। बुद्धिवादी प्रजापिता ने तो उन विपरीत बुद्धि ब्राह्मणों का सामना किया।
परन्तु माता ने उन बच्चों का साथ दिया, जिसके कारण मात-पिता के बीच में मतभेद हो गया। माता सहित समस्त परिवार एक ओर और दूसरी तरफ राम बाप एक ओर हो गए।
यज्ञ के अंदर ॐ मंडली (Om Mandali) की बात है, जब बाहर सिंध निवासियों में अंदर की बात बाहर फैलने लगी तो कन्या-माताओं को सत्संग में आने से रोका जाने लगा। पवित्रता की बात न समझने के कारण कन्या-माताओं पर अत्याचार होने लगे। मुरली में बोला है-
झगड़ा बढ़ता गया और दादा लेखराज कृपलानी झगड़े का सामना नहीं कर सके। बिना किसी को बताए यज्ञपिता अर्थात् पिऊ राम बाप का साथ छोड़कर कराची भाग गए।
और कुछ समय बाद सन् 1942 में यज्ञपिता रामबाप का कारणे-अकारणे प्राणांत हुआ। दोनों माताएँ सिंघ से कराची दादा लेखराज के पास चली गई थीं।
फर्स्ट क्लास में जाने वाली (महागौरी और सहाकाली) माताएँ सामान्य माताएँ नहीं हो सकती हैं। उसके बाद दोनों माताओं के द्वारा यज्ञ का संचालन होता था।
यहाँ जो अच्छी-अच्छी बच्चियों बोला है, वो कोई सामान्य बच्चियों के लिए नहीं है; क्योंकि मम्मा-बाबा को ड्रिल कोई सामान्य आत्मा नहीं करा सकती है। ड्रिल वही करा सकती है, जो उनसे भी पुरुषार्थ में आगे हो। जिन मालाओं में शिवबाप की प्रवेशता होती थी, जो मम्मा-बाबा को भी पढ़ाई पढ़ाती थीं; लेकिन बाद में वो भी शरीर छोड़ दी। लेकिन जब तक ये दोनों मालाएँ थीं, तब तक दादा लेखराज में सुप्रीम सोल शिव की प्रवेशता नहीं हुई; क्योंकि मु. ता. 26.5.78 पृ.1 के मध्यांत में बोला है-
“कराची से लेकर मुरली निकलती आई है। कराची से लेकर पहले बाबा मुरली नहीं चलाते थे। रात को दो बजे उठकर 10-15 पेज लिखते थे। बाप (माताओं द्वारा) लिखवाते थे। फिर उसकी कॉपियाँ निकालते थे।” और ता.25.2.68 पृ.1 आदि रात्रि की मुरली में बाचा ने कहा है कि
मुरलियों से ही साबित होता है कि पहले कराची में दादा लेखराज में शिवबाप की प्रवेशता नहीं हुई थी। माताओं में प्रवेश कर शिवबाप दादा लेखराज के द्वारा लिखवाते थे। सन् 1947 तक दोनों माताएँ भी शरीर छोड़ देती हैं।
| क्रम | पहले लोग क्या समझते थे (Negative Sentiment) | अब सच्चाई जानकर क्या समझते हैं (Positive Sentiment) |
|---|---|---|
| 1️⃣ | दादा लेखराज ही प्रजापिता ब्रह्मा हैं | प्रजापिता ब्रह्मा वह रथ हैं जिसमें शिव की ज्योति प्रवेश करती है |
| 2️⃣ | भगवान श्रीकृष्ण ने गीता बोली थी | गीता का ज्ञान स्वयं शिव ने प्रजापिता के माध्यम से दिया |
| 3️⃣ | ओम मंडली एक सामान्य सत्संग संस्था है | ओम मंडली वास्तव में रुद्र गीता ज्ञान यज्ञ की नींव है |
| 4️⃣ | दादा लेखराज ही परमात्मा हैं | दादा लेखराज माध्यम हैं — परमात्मा शिव उनके द्वारा कार्य करते हैं |
| 5️⃣ | रुद्र रूप का अर्थ क्रोध या विनाशक है | रुद्र रूप ज्ञान की अग्नि और आत्मशुद्धि का प्रतीक है |
| 6️⃣ | ओम मंडली में झगड़ा और मतभेद कमजोरी थी | वही संघर्ष सत्य की परीक्षा और सच्चाई की नींव बना |
| 7️⃣ | माता-पिता के बीच मतभेद विभाजन थे | वह मतभेद ज्ञान की गहराई को उजागर करने वाले थे |
| 8️⃣ | दादा लेखराज के साक्षात्कार कल्पना थे | वे साक्षात्कार युग परिवर्तन की शुरुआत का संकेत थे |
| 9️⃣ | ब्रह्मा बाबा ही भगवान हैं | ब्रह्मा माध्यम हैं, भगवान निराकार शिव हैं |
| 🔟 | ओम मंडली का विरोध करने वाले सही थे | विरोध से ही सच्चा ज्ञान और स्पष्ट रूप में सामने आया |
ओम मंडली की स्थापना ये अभी हीरे समान...
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